सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 766 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 203

रमैनी । ( १५३ )
साखी ॥ अंधभया सबडोलई, कोइ नाहिं करै विचार ॥
हरिकि भक्ति जाने बिना, भव बूडिमुआ संसार १ १
अपने गुणके औगुण कहहू। यहै अभाग जो तुन न विचारहू ॥१॥
तुम जियराव बहुतै दुख पाया। जल विन मीन कवन सचु पाया २॥
चातृक जलहलहल भरे जोपासा । मेघनबरसै चले उदासा ॥३॥
स्वांग धरयो भवसागर आसा। चातृक जल हल आशै पासा ४॥
स्वतःसिद्ध तुम साहबके दासहौ या जो आपनो गुण ताको अवगुण कहौहै। कि
हम ब्रह्महैं सो यां नहीं बिचारौहै। कि हम ब्रह्महैं कि दासहैं याही तुम्हारी अभा-
गहै दासभूतमेतमान ॥(दासभूताःस्वतःसर्वेह्यात्मानःपरमात्मनः)॥ परमात्ममें बहुत
दुःख पायो है जो छाया पाठ होय तौ बहुत दुखमें आयो सो जब बिना कौनौ
सचु पायेहौ? नहीं पायो। ऐसे बिना साहबके जाने सचु न पावोगे?॥१॥२॥ जैसे जब
मेघ स्वातीको जल नहीं बरषैहै तब चातृक उदासै रहैहै कहै पियासै रहैहै जो नजीक
समुद्रौ भरोहोय तौ कहा होइ ऐसे स्वामी मेघसम रामोपासक पूरा गुरु तुमनहीं
पायो जो साहबको बताइदेइ ताते तुम उदासई गयो और और में लगावन वारे
गुरुवालोग जो उपदेशऊ कियो पै जनन मरण न छूट्यो ॥ ३ ॥ भवसागर ते
पारहोबे की आशाकरि स्वांगजो धोखा ब्रह्म तौनेको तुम धरचो कि अहं ब्रह्मास्मि
मानिसंसारते छूटिजाइँगे सो तुम्हारी आशा चातृककी भई कि स्वातीतौ पायो
नहीं जो बहुत जलहै पै बिना स्वाती चातृककी आशा फांसही हैगई अथवा स्वांग
धोखा ब्रह्म को जो तुमधरयो है सो साहबकी आशा कहै दिशानहीं है भवसागर-
हीकी आशाकहे दिशा है ॥ ४ ॥
रामैनाम अहै निजसारू । औसब झूठ सकल संसारू ॥ ५॥
किंचितहै सपने निधि पाई। हियनमाहँ कहँ धरै छिपाई ॥ ६ ॥
हरि उतंग तुम जानि पतंगा । यमघर कियो जीवको संगा॥७॥
हियन समाय छोड़ नहिं पारा। झूठ लोभ तैं कछु न विचारा॥ ८ ॥