कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी। ( १५५ )
अथ छयासठवीं रमना।
चौपाई।
सोई हितू बंधु मोहिं भावै। जात कुमारग मारग लावै ॥१॥
सो सयान मारग रहिजाई। करै खोज कबहूं न भुलाई॥२॥
सो झूठा जो सुतकै तजई। गुरुकी दया रामको भजई॥ ३ ॥
किंचितहैयाहिजगतभुलाना। धनसुतदेखिभयाअभिमाना ४
साखी ॥ जिय जो नेक पयान किये, मंदिर भया उजार ॥
मरे जे जियते मरिगये, बाँचे वाँचन हार ॥ ॥५॥
सोई हितु वा बंधु मोको भावैहै जो कुमारगमें जात जे जीव हैं तिनको सुमा-
रगमें लैआवै कहे साहबको बतावै अथवा कुमारग में जात जो जीवहैं ताको साह-
बके सुमार्गमें लगावै॥१॥अरुसो ई जीव सयानहै जो सुमार्गमें आयकै रहिजायहै
कहे स्थिर ह्वैजाय है अरु और और मतनको खोज करिकै सबको सिद्धांत साहब
हीमें लगाइदेइ सो कवहूं न भुलाइ है ॥ २ ॥ ऐसो गुरुवा झूठा है जो सुतकै
कहैं, मूड़ मूड़िकै अपना चेला बनाइके तजिदेइ है साहब को नहीं बतावै है
औरे औरे देवनको सौंपिदेइ है औ जाकीदया ते अर्थात् जाकें उपदेशते यह
जीव श्रीरामचन्द्र को भजन करै है सोई सांचो गुरु है। भाव यह है कि बिना
परमपुरुष श्रीरामचन्द्रजी के जाने यह जीव को शोक नहीं छूटै है जे गुरु साह
बको बताइकै संसारते नहीं छुड़ावै हैं औरे औरे मतन में लगाइकै संसारमेंडा-
रिदेईहैं ते अज्ञान दूरि करनवारे नहीं हैं वे नरक देन वारे हैं औ आप नरक
जानवारे हैं तामें प्रमाण ॥ ( शिष धनहरै शोकनहिं हरई । सो गुरु घोरनरकमें
परई॥ औकबीरहूजी लिखि आये हैं ॥(छोड़िदेहु नरझेलिकझेला । बूड़ें दोउगु-
रुअरुचेला ॥ ) हे जीवतू तो अणु हैं एकजो ब्रह्म औजगद्रूप जो है माया तामें
भुलाइरह्यो है याही ते तैं जगत्में उत्पन्न भयो है आपने को मालिकमानिधन
सुतादिको तोको अभिमान होइ है ॥ ३ । ४ ॥ हे जीव जो नेकहुपयान ते किये