कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
रमैनी । ( ७३ )
कहे हरि अमकट भये तिनके बिना जाने जगत्के धन्धेमें जीव सब अपनो
मन लगायराख्यो ॥ २ ॥
गहनी बंधन बांधनसूझा । थाकिपरेतबकछूनबूझा ॥ ३ ॥
गहनी बंधन जो मायासबलित ब्रह्म जौन बांधिकै संसारमें डारि देनवारों
ऐसो जो ब्रह्म ताको बांधजीवनको न सूझिपरचो कौन बांध कि जो कोई
मोहीमेंलगैहै तौमैं बांधिकै संसारमें डारिदेउँ हैं या मायासबलित ब्रह्मको
बांध न सूझि परचो जों कहो काहेते बांधबांध्यो है तो जगत्की उत्पत्ति वही
ब्रह्मते होय है वा ब्रह्म जगत्को रहिबोई चहैहै याही ते जो कोई वामें लगै है
ताको साहबको ज्ञान भुलायकै संसारहीमें राखैहै सो कबीरजी कहैं हैं कि
जब वही संसार में थकिपरे तब कछु न बूझत भये अर्थात् अनेक मतनकों
बिचारैहै पै सिद्धांत न पावतभये साहबको ज्ञान भूलिगये ॥ ३ ॥
भूलिपरे तब अधिक डेराइ ।
( ७४ ) बीजक कबीरदास ।
देख्यो तबतक तो उजियारी जब ज्योतिमें लीनह्वैगयो तब सुषुप्ति ऐसेमें
पर्यो रह्यो यही भयावनि रैनिहै भयावनिको हेतु यह है कि प्राणके उतरिबेकी
अवधि बनीहै ॥ ४ । ५ ॥ ६ ॥
साखी ॥ सभैलोगजहँडाइया, औ अन्धासभैभुलान ॥
कहाकोइनहिमानही, सबएकैमाहँसमान ॥ ७ ॥
और जे मायाते सभयरहे डेराते रहे ते लोग जहँडाइया कहे बहेकिकै औ-
रई और मतनमें लगिगये औ जेअज्ञान आंधेररहें ते संसारहीमें परे संसार
छूटिबेको उपौवैना किये भूलिही गये सो कबीरजी कहैंहैं कि मेरो कहा कोई
नहीं मानैहै सब जे जीव हैं ते एक जो मायाब्रह्म ताहीमें सब समाते भये
इत्यर्थ औ साहबको बिनाजाने ब्रह्महूमें लीनहै संसारहीमें आवैहै वाको प्रमाण
पीछे लिखिआये हैं ॥ ७ ॥
इति सोलहवीं रमैनी समाप्तम् ।
अथ सत्रहवीं रमैनी ।
चौपाई ।
जसजिवआपिमिलैअसकोई। बहुतधर्मसुखहृदयाहोई ॥१॥
जासों बातरामकी कही । प्रीति न काहूसोंनिर्वही ॥ २ ॥
एकैभाव सकलजगदेखी । बाहेरपरैसोहोयविवेकी ॥ ३ ॥
विषयमोहकेफंदछोड़ाई । जहांजायतहँकाटुकसाई ॥ ४ ॥
आय कसाई छूरी हाथा । कैसहु आवै काटौंमाथा ॥ ५ ॥
मानुष बड़े बड़े ह्वैआये । एकै पण्डित सबै पढ़ाये ॥ ६ ॥
पढ़नापढ़हुधरहुजिनगोई । नहिंतोनिश्चयजाहुविगोई॥७॥
साखी ॥ सुमिरन करहु सुरामको, औ छांड़हु दुखकी आस॥
तरऊपर धरि चापिहैं जसकोल्हूकोटिपचास ॥८॥
रमैनी । ( ७५ )
जसजिवआपुमिलैअसकोई । वहुतधर्मसुखहृदयाहोई॥१॥
जासोंबात रामकीकही । प्रीति न काहूसों निर्वही ॥ २ ॥
जैसो आपु होई तैसो जबताको मिलै तबहीं धर्मबढै है औ हृदयमें बड़ो
सुखहोयहै तामें प्रमाण गोसाईंजीको ॥ दोहा ॥ इष्टमिलै अरु मन मिलै, मिलै
भजनरसरीति ॥ तुलसिदास तासों मिलै, हठिकै उपजै प्रीति १ सो औरी-
भांति सुखनहींहोयहै १ काहे ते कि जासों कहे जौने जीवनसों रामकी बात मैं
कहौं हौं कि तैं रामचन्द्रकोहै तिनको अपनो साहब मानु नाना ईश्वर जो तैंने
माने हैं सो येसब मायाके जालमें परेंहैं तोको कहा उबारेंगे सो कबीरजी कहैंहैं
कि या मेरी बातपै काहू जीवनकी प्रीति न निबहतभई अर्थात् जो मेरीबात
प्रीतिते सुनै साहब को जानै जपने अपने मतमें आरूढ़है वादसोकरैहै वस्तुनहीं
ग्रहणकरै है ॥ २ ॥
एकैभाव सकलजगदेखी । बाहेरपरै सोहोय विवेकी ॥ ३ ॥
विषयमोहकेफंदछोड़ाई । जहां जाय तहँकाटकसाई॥ ४ ॥
एकैभाव सकल जगदेखी कहे जे एक ब्रह्मभाव जगत्को देखै हैं तेहिते बा-
हेर अपनेको दासमानि सब में चिद्रूपको जो जानै है । सोई विवेकी होयहैं
सो ऐसे विवेकिकनके पासतो नहीं जायहै २ नाना विषयके मोहके फंद छोड़ायकै
अर्थात् संसारते वैराग्य करिकै अधिकारिह्वैकै जहांजहांजायहैं तहांतहां कसाई जे
गुरुवा लोग ते गलाकोटैहैं अर्थात् साहबको ज्ञानकाटि धोखा ब्रह्ममें लगाय देयँ
हैं । सो याको गलाकाट्यो गलाकाटे फेरिजन्महोयहै याते गुरुवालोगनको कसाई
कह्यो । ऐसे याहूको जनन मरण होय है । ब्यंग्य यहहै कि जे जीव साहब
को त्यागि और औरमें लगे हैं ते पशुहैं उनको ऐसही गलाकाट्यो जायहै ॥४ ॥
कसाई तो शरीरको गलाकाटैहैं और—
आय कसाई छूरी हाथा । कैसेहु आवै काटों माथा ॥ ५ ॥
१ स्वार्थी गुरुवालोग जिनको संसारी सुख और क्षणिक मान बड़ाईके अतिरिक्त
सत्यका ज्ञानही नहीं है । २ गुरुवालोगोंके नानाप्रकारसे जीवोंको ठगनेके उपाय ।
( ७६ ) बीजक कबीरदास ।
मानुष बड़े बड़े ह्वै आये । एकै पण्डित सबै पढ़ाये ॥ ६ ॥
कसाई जे गुरुवालोग तिनकी बनाई पोथी सोई छुरीहाथमें लीन्हे यह
ताके हैं कि कैसेहुकै कौन्यो मतको आवै तौ ठगिकै अपनेमतमें कैकेइँ माथ काटिलै
कहेमूंड़िडारै चेलाकरिलैं । सो साहबको छोड़ाइ औरे आरम लगाबनवारो हैं
सो गुरू कसाई है । यहौ द्वैत ज्ञानवाले गुरुवालोग जीवनको गलाकाटें हैं जो
संसारमें रहतो तो कबहूं दैवयोगते साधु सङ्गमभयो उद्धारहू होतो सो तौने
धोखा ब्रह्ममें लगायदियो जहांते उद्धार नहीं है वहां काहेको कोई साहबको
बतावेंगे ॥ ५ ॥ मनुष्य जे बड़ेबड़े ज्ञानीलोग हैं ते यही पढ़ावतभये कि एक
वही ब्रह्महै जीवनहींहै और कोई या पढ़ाया कि एकजीवही सांच है और सब
असांचहै ॥ ६ ॥
पढ़नापढ़हुधरहुजनिगोई।नाहींतौनिश्चय जाउविगोई ॥७॥
जौनपढ़ना तुम गुरुवालोगनतेपढ़योह
रमैनी। ( ७७ )
अथ अठारहवींरमैनी।
चौपाई।
अद्भुत पंथ वरणिनहिं जाई । भूले रामभूलिदुनियाई॥१॥
जो चेतौतौ चेतुरे भाई । नहिंतो जिय जरि मूलै जाई॥२॥
शब्द न मानै कथै विज्ञाना । तातेयम दीन्ह्यो है थाना॥३॥
संशय साउज बसै शरीरा।ते खायल अनवेधल हीरा॥४॥
साखी ॥ संशय सारज देह में, संगहि खेल जुआरि ॥
ऐसा घायल वापुरा, जीवन मारै झारि ॥ ५ ॥
अद्भुत पंथ वरणि नहिं जाई।भूलेराम भूलिदुनियाई ॥१॥
जो चेतौ तौ चेतुरे भाई । नहिंतो जियजरिमूलैजाई ॥ २॥
अद्भुत पंथ जो ब्रह्म ताको वर्णतकोईने अंतनहींपायो राम जो साहबहैं तिनके
भूलेकहे बिना जानेते सब दुनिया धोखा ब्रह्म मायामेंभूलिगई १ हे भाइउ
चेतौतौ चेतौ नहीं तौ मायाब्रह्मकी आगिमें जरिकै मूलतेजाउगे । यह कबीर-
जीकहै हैं । नहीं तौ यम जीव लैजाइ जो यहपाठहोयतौ यहअर्थहै कि चेतौतौ
चेतौ नहीं तौ यम लैजायके नरकमें डारिदैँगे ॥ २ ॥
शब्द न मानैकथै विज्ञाना । तातेयमदीन्ह्योहैथाना॥ ३ ॥
संशय साउज बसै शरीरा । तेखायलअनवेधलहीरा ॥४॥
बिज्ञानहूको सार जाते सबशब्द निकसे हैं ऐसो जोरामनाम ताको तौ मानै-
नहीं है और और मतिमें लगिकै विज्ञान कथै है ताते यमराज जो जैसो
कर्मकरैहै ताको तैसो नरक स्वर्गकोथान देयहैं ३ संशयरूपी साउज जो
मन सो शरीररूपी बनमें बसिके अनबेधलकहे जाकोयश रामनाममें नहींहै ऐसो
जो हीराजीव ताको खायगयो कौनीरीतिते खायो सो आगे कहै हैं ॥ ४ ॥
( ७८ ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ संशयसाउजदेहमें, संगहिखेलैजुआरि ॥
ऐसाघायलवापुरा, जीवनमारैझारि ॥ ५ ॥
जैसे शिकारी बाघको मारैहै जो बाघ घायलभयो तौ शिकारीको धरिडारैहै
तैसे संशयसाउज जो व्याघ्ररूप मन सो देहरूपी बनमें बसैहै ताके संग जीव
जुआं खेलै है जब मनोबासनाछैकी उपाय कियो तब वही वाको घायल ह्वैबोहै
सो व्याघ्ररूप जो मन है सो घायलह्वैकै बापुरे जे सबजीव हैं तिनको झारदेकै
मारैहै अर्थात् सबको वहीं माया धोखा ब्रह्ममें लगायदियो औ जोयह पाठहोय कि
( ऐसा घायल बापुरा सब जीवनमारै झारि) तो यह अर्थहै कि ऐसा घायलकहे
घाती जो मन सो बापुरेजीवनकोझारादैंकैमारैहै जननमरणदेईहै ॥ ५ ॥
इति अठारहवींरमैनीसमाप्तम् ।
अथ उन्नीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
अनहदअनुभवकीकरिआशा। देखौ यहविपरीततमाशा॥१॥
यहै तमाशा देखहु भाई । जहँहैशून्यतहां चलिजाइ ॥ २ ॥
शून्यहिवांछा शून्यहि गयऊ। हाथाछोड़ि बेहाथाभयऊ॥३॥
संशय साउज सब संसारा । कालअहेरी सांझसकारा ॥४॥
साखी ॥ सुमिरन करहु सो रामको, काल गहैहै केश ॥
नाजानौं कब मारि है, क्याघर क्यापरदेश॥५॥
अनहदअनुभवकीकरिआशा। देखौयह विपरीततमाशा १
अनहद शब्द सुनतसुनत जौने ब्रह्मको अनुभव होईहै ताको तू विचारैहै
कि ब्रह्म मैंहीहौं या नहीं जानैहै कि अनहद मेरे शरीरहीकोहै वह ब्रह्म मेरही
अनुभवहै यह बड़ो तमाशाहैताही की आशाकरै है यह बड़ी बिपरीत है ॥ १ ॥
रमैनी। (७९)
यहैतमाशादेखहुभाई । जहँहैशून्यतहांचलिजाइ ॥ २ ॥
शून्यहिवांछाशून्यहिगयऊ । हाथाछोड़िवेहाथाभयऊ ॥ ३ ॥
सो हे भाइयो! हे जीवो ! यह तमाशा तुमहूं अनेकन जन्मते देखतैआयेहौ
परन्तु जहां शून्यहै तहां जाइकै मुक्ति हैवो चाहौहौ तुम या नहीं बिचारौहौ
कि शून्य जो धोखा ब्रह्म तामें जो हम जायँगे तौ हमारी मुक्तिकी बांछहु शून्य
ह्वैजायगी अर्थात् मुक्ति न होयगी सो या बड़ो आश्चर्यहै अपनेते झूठेमें बांधिकै
साहब को हाथ छोड़िकै बेहाथ भयऊ कहे धोखा ब्रह्मके हाथमें ह्वैजाउ हौ
अथवा कबीरजी झूटे जीवनते कहैहैं हे भाइयो ! देखौ तो तमाशा ये जीव
जहां शून्यहै धोखाहै तहां सब चलेजाँयहैं जौने ज्ञानमें साहब भरेपूरे हैं तहां
नहीं जायँहैं २ । ३ ॥
संशयसाउजसबसंसारा । कालअहेरीसांझसकारा ॥ ४ ॥
' संशय कहै मनरूप जो साउज ताहीको सकलकहे सुरति यासंसार है रह्यो
है अर्थात् मनरूप जीव है रह्यो है संकल्प विकल्प सबैकैरहेहैं संशय सब जीव
को लग रही है । सो अहेरी जोकाल शिकारी सो सांझ सकारकहे काहू को
जन्मतमें मारैहै काहू का मध्य अवस्था में और काहूको आयुर्दायके अंतमें
मारैहै ॥ ४ ॥
साखी ॥ सुमिरनकरहुसोरामको, कालगहेहै केश ॥
नाजानौंकबमारिहै, क्याघरक्यापरदेश ॥ ५ ॥
सो कबीरजी कहैहैं कि परमपुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनको सुमिरण करहु
शिकारी जो कालहै सो केश करमें गहेहै या नहीं जानौहौ धौं कब मारै या
घरमें या परदेशमें अर्थात् साहबकेबिना स्मरण घरमेंरहोगे तौ न बचोगे जोँ
बनमें जाउगे तोहू न बचौगे ॥ ५ ॥
इति उन्नीसवींरमैनी समाप्तम् ।
( ८० ) बीजक कबीरदास ।
अथ बीसवीं रमनी ।
चौपाई ।
अबकहुरामनामअविनासी।हरितजिजियराकतहुँनजासी १
जहांजाहु तहँ होहुपतंगा। अवजनिजरहुसमुझिविषसंगा २
रामनामलौलायसोलीन्हा। भृङ्गीकीट समुझि मनदीन्हा ३
भोअतिगरुवा दुखकै भारी। करुजिययतनसोदेखुबिचारी४
मनकीवातहैलहरिबिकारा। त्वहिंनहिं सूझै वार न पारा ५
साखी ॥ इच्छाको भवसागरै, वोहित राम अधार ॥
कहैकबिरहरिशरणगहु, गोवच्छखुरविस्तार ॥६॥
अबकहुरामनामअविनासी।हरितजिजियराकतहुंनजासी १
अविनाशी जो रामनाम ताको अबहूं कहु । हरिकहे भक्तन के आरति हार-
णहारे जे साहब हैं तिनको छोड़ि हे जीव औरमतनमें कतहुंन जा अर्थातचित-
चित्ते विग्रहकरि सर्वत्रसाहिबैकोदेखु ॥ १ ॥
जहांजाहुतहँहोहुपतंगा । अवजनिजरहुसमुझिविषसंगा २
जौनेन मतमें जाहुहौ तहां पतंगहीसे जरिजाउहौ। सो ते गुरुवन को संगजो
बिषाग्नि ताको समुझि अबजनि जरहु अर्थात् जो इनको संगकरहुगे तौ मन इन्द्रिया-
दिकन को बिषय जो सिद्धांत कीन्हेहै ताही में तुम्हहूँको लगाइ देयँगे तौ
संसारही में परेरहोगे ताते इनको संगत्यागि गमनाम जपौ जो कहौ कौनीरीति-
ते जपै रामनामतौ मन वचनके पेरैहै सो आगे कहैंहैं ॥ २ ॥
रामनामलौलायसोलीन्हा । भृंगीकीटसमुझि मनदीन्हा ३
रामनाममें सो लौ लगाय लीन्हेहै कौनजौन भृङ्गी औ कीट की ऐसीगति
समुझिकै अपने मनदीन्हेहै अर्थात् जैसे कीटभृङ्गी को देखत देखत वाको शब्द
रमैनी । (८१)
सुनत सुनत वाको डेरात डेरात तदाकारहै भृङ्गीहीरूप ह्वै जाय है तैसे रामनाम
जपतजाइहै, वाको सुनतजाइहै, जगत्मुख अर्थते डेरातजायहै; औ साहबमुख
अर्थमें साहबकी रूप औ अपनो हंसस्वरूप बिचारत निज हंसस्वरूप में तदाकार
ह्वैजायहै, मनादिक मिंटिजायहै शुद्ध रहिजाय है सो अपनेरूप पायजायहै । तब
मन वचनके परे जो रामनाम सो आपनेते अस्फूर्त्तिहोइ है तामें लौलगायकै
जैसे कीटभृङ्गी बनिकै औरे कीटको भृङ्गी बनावैहै तैसे यहौ जीव उपदेश करिकै
औरेहूको हंसरूप बनावै है । सो जो भृङ्गीको शब्द कीट न ग्रहणकरै तौ कीट-
ही रहिजाय ऐसे जो रामनामको जीव ना ग्रहणकरै तौ असारही रहिजायहै
तामें प्रमाण अनुरागसागरको॥ ( ज्यों भृङ्गीगै कीट के पासा । कीटहिगहि गुरग
मि परगासा ॥ बिरला कीट होय सुखदाई । प्रथम अवाज गहै चितलाई॥ कोइ
दूजे कोई तीजे मांनै । तन मन रहित शब्दहित जानै ॥ तबलगै भृङ्गी निजगे-
हा । स्वाती दैकर निज समदेहा ) ॥ ३ ॥
भोअतिगरुवादुखकैभारी । करुजियतनजोदेखुविचारी४
मनकीबातहैलहरिविकारा। त्वहिंनहिंसूर्झैवारनपारा ॥ ५॥
यह संसार भारी दुःखक.रिकै अति गरुवा बोझाहै जीव तू बिचारि देखु जौ
तोको बोझालगै तौ रामनामको यतन करु ॥४॥ मनकी बातकहै मनते गुरुवन
को धोखा ब्रह्म तेहिते उठी जो काररूप लहरि माया ताको कौनो मन कहिकै
तोको वारपार नहीं सूझै है ॥ ५ ॥
साखी ॥ इच्छाकेभवसागरै, वोहितरामअधार ॥
कहैकबीरहरिशरणगहु, गोबछखुरविस्तार ॥६॥
यह जो समष्टि जीवको इच्छारूप भवसागर तामें वोहित जो नौका रामना-
म सोई आधार है और नहीं है सो कबीरजी कहैं हैं हरि जे साहेबहैं तिनकी
शरणगहु यह भवसागर गऊके बछवाके खुरके सम उतरि जायगो यामें
संदेह नहीं है ॥ ६ ॥
इति बीसवीं रमैनी समाप्त ।
६
( ८२ ) बीजक कबीरदास ।
अथ इक्कीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
बहुतदुखै है दुखकी खानी । तबवचिहौजवरामहिजानी १
रामहि जानियुक्ति जोचलई । युक्तिहिते फंदा नहिं परई २
युक्तिहि युक्ति चलत संसारा । निश्चयकहा न मानुहमारा ३
कनक कामिनी घोरपटोरा । संपत्ति बहुत रहे दिनथोरा ४
थोरेहि संपतिगो बौराई । धरमरायकी खबरि न पाई ५
देखित्रासमुखगोकुम्हिलाई । अमृत धोखे गो विष खाई ६
साखी ॥ मैं सिरजों मैं मारहूँ, मैं जारों मैं खाउँ ॥
जलथलमैंहींरमरह्यों, मोरनिरंजननाउँ ॥ ७ ॥
बहुतदुखै हैदुखकीखानी । तबबचिहौजवरामहिजानी ॥१॥
रामहिजानियुक्तिजोचलई । युक्तिहितेफंदानहिपरई ॥ २ ॥
युक्तिहियुक्तिचलतसंसारा । निश्चयकहानमानुहमारा॥३॥
यह दुःखकी खानि जो संसारसो बहुतदुःखैहै अर्थात् बहुतदुःख देइहै तुम तबहीं
यातेबचोगे जब सबकेमालिक रक्षक जे श्रीरामचन्द्रतिनकोजानौगे आनउपाय न
बचौगे ॥१॥ काहेते जे श्रीरामचंद्र को जानिकै युक्ति सहित चलैहै तेई वही यु-
क्तिहीते संसारके फंदामें नहीं परैहैं सो कबीरजी कहैहैं सो युक्ति आगे लिखैंगे॥२॥
यासंसार केवल अपनी अपनी युक्तिहीते चलै है कबीरजी कहैहैं मैं जो निश्चय
बात कहौहौं कि, रामनामहीते तेरो उद्धार होयगो याकी युक्ति कोई नहीं मानैहै
अपनेही मनकी युक्ति चलैहै ॥ ३ ॥
कनककामिनी घोरपटोरा । संपतिबहुत रहेदिनथोरा ॥४॥
थोरेहि संपति गो बौराई । धर्मराजकी खबरि न पाई ॥ ५ ॥
कनक जेहै कामिनी जेहै घोड़े जैहैं हाथी जैहैं पटंबर जैहैं ये संपति तो
बहुतहै परंतु इनके भोग करिबेको दिनतो थोरही है अर्थात् आयुर्दाय थोरी है
सोतौ भोगमें बितावै है साहबको कब जानैगो ॥ ४ ॥ सो तै तो थोगी
संपत्तिमें बौराय गयो धर्मराज की खबरि तै नहीं पाई कि, जब मोको ६
जाइँगे तब सारी संपत्ति दियई परीरहि जायगी तब कौन भोगकरैगो
बिचारि साहब को जानो ॥ ५ ॥
देखित्रासमुखगोकुम्हिलाई । अमृतधोखेगोबिषखाई ॥६॥
औ दैवयोगजो कदाचित् तुम्हे धर्मराजको त्रासदेखिकै मुख जब कुम्हिलां-
यगयो कहे संसारते बैराग्यभई तब गुरुवालोगनके निकटजाइ अपनो स्वरूप
समुझौ कि, मैं अमृतहौं मन मायादिक ते भिन्नहौं सो बाततो तू सांचिबिचारी
ऐसहीहै परंतु भगवत् अंशत्व तेरे स्वरूपमें है सो गुरुवालोग नहीं बतायो और-
हीमें लगाय दियो सो अपनो स्वरूप समुझबो जो अमृत ताही के धोखे ते
[L
( ८४ ) बीजक कबीरदास ।
धंधा बँधा कीन्ह व्यवहारा । कर्म विवर्जित बसै निनारा ॥३॥
षटआश्रमषटदरशनकीन्हा । षटरसवस्तुखोटसबचीन्हा ॥४॥
चारि वृक्ष छाशाख बखानै । विद्याअगणितगनै न जानै॥५॥
औरौ आगम करै विचारा। तेहिनहिंसूकै वार न पारा ॥६॥
जप तीरथ व्रत पूजे भूता । दान पुण्य औ किये बहूता॥७॥
साखी ॥ मंदिर तो है नेहको,मति कोइ पैठे धाइ ॥
जोकोइपैठे धाइकै, बिन शिर सेंतीजाइ ॥ ८ ॥
अलखनिरंजनलखैनकोई । जेहिकेबँधे बँधासवकोई ॥ १ ॥
जेहिझूठो सो बँधो अयाना । झूठीवातसांचकैमाना ॥ २ ॥
धंधाबँधाकीन्ह व्यवहारा । कर्मविवर्जितबसैनिनारा ॥ ३ ॥
कबीरजी कहैहैं कि, हे जीव! तूतो अपनेको निरंजन मान्यो सो निरंजन तों
अलखहै वाको कोईनहीं लखैहै जाके बँधतेकहे मायामें सब कोई बँधे हैं ॥ १ ॥
हे अजानौ ! जौने झूठे सो तुम बँधे हौ सो झूठही है तुम सांच मानौहौ सो न
मानौ ॥ २ ॥ धन्धा जो साहबकीसेवा ताको बँधाकहे बांधनवारे तौनेको व्यव-
हार तुम कीन अर्थात् व्यवहार मानि कर्मते वर्जित ब्रह्म सबते
न्यारही रहै है या परमार्थ तुमलोग कहौहौ औ वाहीमें आरूढ़ होतहौ साह-
बको नहीं जानौहौ ॥ ३ ॥
षटआश्रमषटदरशनकीन्हा । षटरसवस्तुखोटसबचीन्हा ॥४॥
चारिवृक्षछाशाखबखानै । विद्याअगणितगनैनजानै ॥ ५ ॥
षटरसनको खोटमानि त्यागन करिकै औ षटआश्रम करिकै षट दर्शन
करिकै वही धोखा ब्रह्मही को सिद्धांत मानते भये ॥ ४ ॥ पुनि चारि वेद
छवोशास्त्र अगणित विद्या वाच्यार्थ करिकै धोखा ब्रह्मको कहैहैं ताको तो तुम
ग्रहणकियो तात्पर्य वृत्ति ते जो साहबको कहैहै सो तुम न जानत भये ॥ ५ ॥
रमैनी । ( ८५ )
औरो आगम करेविचारा । त्यहिनहिंसूझैवारनपारा॥ ६ ॥
जप तीरथ ब्रत पूजेभूता । दान पुण्य औ कियेबहूता ॥ ७ ॥
अरु औरौ आगम जेहैं ज्योतिष यंत्र मंत्र आदिदैकै तेऊ तात्पर्य वृत्तितें
जौने साहबको कहैहैं ताको वारपार तो तुमको न सूझिपर्यो वाच्यार्थ प्रतिपाद्य
जो धोखा ब्रह्म और और देवता ताही में लागत भये॥६॥सो यहिप्रकार नाना
मतन करिकै मानते भये कोई नाना देवतन के जपकिये कोई तीर्थ किये कोई
ब्रत किये कोई भूतनकी पूजाकिये कोई दानकिये कोई पुण्य जो यज्ञादिक कर्म
ते किये ॥ ७ ॥
साखी ॥ मंदिरतोहै नेहको, मतिकोइ पैठेधाई ॥
जोकोइपैठेधाइके, बिनुशिरसेंती जाई ॥ ८ ॥
सो यह सब मतमा एक नानोदेवता धोखा ब्रह्म इनमें जो प्रीति है सो
नेहको मंदिरहै तामें तू धायकै मतिपैठै जो इनमें धायकै पैठैगो तौ बिनु
शिरकहे सबकेशिरे जे साहब तिनके बिना सेंतिही जाईगो कछुहाथ न लगैगो
तेरेसाधन मुक्तिदेनवाले न होवेंगे संसारही देनवाले होइँगे अथवा तुम्हारोमाथा
काटो जायगो वृथा मारेजाउगे ॥ ८ ॥
इति बाईसवीं रमैनी समाप्त ।
अथ तेईसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
अल्पसौख्यदुखआदिहुअंता । मन भुलानमैगर मैमंता॥१॥
सुख विसराय मुक्तिकहँपावै। परिहरिसांचझूंठनिजधावै॥२॥
अनल ज्योति डाहै यकसंगा।नयन नेह जसजरै पतंगा॥३॥
करु बिचारज्यहिसबदुखजाई।परिहरिझूठा केरि सगाई॥४॥
लालच लागे जन्म सिराई।जरामरणनियरायलआई॥५॥
( ८६ ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ भ्रमको बांधल ई जगत, यहिविधि आवैजाई ॥
मानुष जन्महि पाइनर, काहे को जहँडाइ ॥ ६ ॥
अल्पसौख्यदुखआदिहुअंता। मनभुलानमैगरमैमंता ॥ १ ॥
सुखबिसरायमुक्तिकहँपावै।परिहरिसांचझूठनिजधावै ॥ २॥
अनलज्योति दाहै यकसंगा।नयननेह जसजरैपतंगा॥३॥
जौने संसारमें अल्प तो सुखहै औ आदिहूमें अंतहूमें दुःखहै ऐसे संसारमें
मैगर मैमंताकहे मतवारो हाथी जो मन सोभुलाईकै मैमंताकहे मेंहीं ब्रह्महौं या
मानिलियो अथवा मैंहीं देहहौं या मानिलियो॥१॥सुखरूप जे साहब हैं तिनकों
बिसराइ कै कबीरजी कहैहैं कि मुक्ति कहां पावै सांचको छोड़िकै झूठ जो
धोखा ब्रह्महै तामें तो धावैहै यह जीव कैसे सुखपावै ॥ २ ॥ अनलज्योतिजो
ब्रह्महै सो एकसंग सब ज्ञानिनको दाहैहै अग्नि ब्रह्मको नाम है 'अज्ञातवह्निनामा
सौ' ॥ कैसेदाहैहै जैसे नयननेह कहे देखनके लालचलगे दीपककर्ज्योतिमें पतं-
गजरैहैं ॥ ३ ॥
करुविचारज्याहिसबदुखजाई।परिहरिझूठाकेरिसगाई॥ ४ ॥
लालचलागेजन्मसिराई।जरामरण नियरायलआई॥ ५ ॥
झूठ जो या धोखा ब्रह्महै औ अपनो कलेवर तौनें की सगाई त्यागिकै
परमपुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनको बिचारकरु जाते तेरे सब दुःख जाइँ ॥४॥
धोखा ब्रह्मके लालच में लगे कि, हमारी मुक्ति होयगी हमको विषयही तें
सुख होयगो याहीमें लगेलगे जन्मसिरायगयो जरा जो बुढ़ाई औ मरण सों
नियराय आयो ॥ ५ ॥
साखी ॥ भ्रमको बांधल ई जगत, यहि बिधिआवैजाय ॥
मानुषजन्महि पायनर, काहेकोजहँडाय ॥ ६ ॥
यही रीतिते भ्रमको बांधा या जगत है वही ब्रह्मते आवै है कहे उत्पन्न
होइहै औ जाइहै कहे लीन होइ है 'मानुष जन्महि पायनर काहेको जहँडाय'
रमैनी । (८७)
कहे काहे जड़वत् होयहै मनुष्य जन्म याते कह्यो अथवा जहँडाय कहे काहें
भूले जाते हैं कि, मनुष्य के मनुष्यै होय हैं हाथीके हाथी होय हैं कछू हाथी
के मनुष्य नहीं होयहैं ऐसे जो तैं निराकार ब्रह्मको हो तो तोहूं निराकार
होतो सो तैं मनुष्य है ताते मनुष्यरूपजे श्रीरामचन्द्रहैं तिनही को है ॥ ६ ॥
इति तेईसवीं रमैनी समाप्त ।
अथ चौबीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
चंद्रचकोर कसिवातजनाई । मानुषबुद्धिदीन पलटाई॥१॥
चारि अवस्था सपनो कहई । झूठे फुरे जानत रहई ॥२॥
मिथ्यावात न जानै कोई।यहिविधि सिगरे गये विगोई॥३॥
आगेदैदै सबन गँवावा । मानुष बुद्धि न सपनेहु पावा॥४॥
चौंतिस अक्षरसौं निकलै जोई।पापपुण्य जानैगा सोई॥५॥
साखी । सोइकहते सोइ होउगे,निकलि न बाहेरआउ ॥
होहुजूरठाढ़ो कहौं, धोखे न जन्म गँवाउ ॥ ६ ॥
चन्द्रचकोरकसिवातजनाई । मानुषबुद्धिदीनपलटाई॥१॥
साहब कहैहैं कि,हे जीवो ! तुमको गुरुवालोग चन्द्रचकोर कैसो दृष्टांत जना-
यकै नानाईश्वरमें लगायदियो कैसे जैसे चन्द्रमा को ताकत ताकत चकोर
चन्द्ररूपहै या बुद्धिमान्है तब चकोरको अग्निकी गरमी नहीं लगहै अग्नि खाय-
जायहै तैसेअपनोस्वरूप जो ब्रह्म ताको जबजानिलेहुगे तबतुमको दुःखसुख न
जानिपैरैगो कोई यह कहैहैं कि,जैसे चन्द्रमा चकोरमें नेहकरैहै ऐसे तुम ईश्वर-
नमें प्रीतिकरौगे तौ दुःखसुख न जानिपैरैगो यह जो तुम्हारी मनुष्यबुद्धि कि, मैं
हंसस्वरूपहौं द्विभुजहौं द्विभुजई को होऊँगो सो पलटायकै ब्रह्ममें लगायदियें
नानादेवतनमें लगायदिये ॥ १ ॥
(८८) बीजक कबीरदास ।
चारि अवस्था सपनो कहई । झूठैफूरे जानत रहई ॥ २ ॥
मिथ्यावातनजानैकोई । यहिविधिसिगरेगयेविगोई ॥ ३ ॥
चारिअवस्थाजेहैं जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तुरिया ते सपनकहाती हैं तो झूठी
फुरि जानत रहै हैं॥२॥वह कैवल्य जो है पाँचईं अवस्था तद्रूप है जाइबो कि,
मैंहीं ब्रह्महौं सोमिथ्याहै यहबात कोई नहीं जानै है यहीविधि सिगरे जीव
बिगरिगये कहे बिगोइगये ॥ ३ ॥
आगे दैदै सबन गँवावा । मानुषबुद्धि न सपनेहुपावा॥ ४ ॥
चौंतिसअक्षरसौंनिक लैजोई । पापपुण्य जानैगासोई॥५॥
वहीधोखा ब्रह्मके आगे और कुछ नहीं रह्यो आदिकी उत्पत्ति वहीतेहै यही
बात आगे दैदै कहे विचारि कै सिगरे जे ऋषिमुनि हैं ते आजअपने स्वस्वरू-
पको गँवावतभये मनुष्यरूपजो मैं तिन के जाननेवाली बुद्धि सपन्यो न पावत-
भये ॥ ४ ॥ चौंतिसअक्षरके जो निकरैगा सोई पापपुण्यजानैगा मैं साहबको हौं
और मैं लागौंहौं सो पापै करौंहौं या बातमेरो अनिर्वचनीय निर्वाण जो नाम
है ताको जपिकै जानैगो और अपने स्वस्वरूप जानैगो ॥ ५ ॥
साखी ॥ सोइकहते सोइ होउगे, निकलि न बाहेरआउ ॥
हो हुजूरठाढ़ो कहौं, धोखे न जन्म गँवाउ ॥ ६ ॥
जोपदार्थ देखोगे जो सुनौगे जो कहैगे जो स्मरण करौगे संसारमें सोई
होउगे वही धोखामें लागिकै पुनिसंसारी होउगे वा में ते निकरिकै बाहर न
होउगे काहेते कि, वहतो अकर्त्ताहै तुम्हारी रक्षाकौन करैगो सो साहब कहै हैं
कि, सर्वत्र पूर्णहौं तेरे हुजूर ठाढ़ कहतई हौं कि, तैं मेरो है तू काहे धोखा ब्रह्म
में ईश्वरनमें जगतके नाना पदार्थमें लागिकै जन्मगँवाये देतहै ॥ ६ ॥
इति चौबीसवीं रमैनी समाप्त ।
रमैनी । ( ८९ )
अथ पचीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
चौंतिस अक्षरकोयहैबिशेखा । सहसौ नामयहैमें देखा १
भूलिभटकि नर फिरिघरआवैं । होतज्ञान सोसवन गवाँवैं २
खोजहिंब्रह्माविष्णु शिवशक्ती । अनंतलोगखोजहिंबहुभक्ती ३
खोजहिंगणगँधर्वमुनिदेवा । अनंतलोकखोजहिंबहुसेवा ४
साखी ॥ यतीसती सबखोजहीं, मनै न मानै हारि ॥
बड़ेबड़े बीरवाचें नहीं, कहहिं कबीरपुकारि ॥ ५॥
चौंतिसअक्षरकोयहैबिशेखा । सहसौनामयहैमेंदेखा ॥ १॥
भूलिभटकिनरफिरिघरआवै । होतज्ञानसोसवनगवाँवै ॥ २॥
चौतिस अक्षर को विशेष धोखई है काहेते हजारनाम यही चौतिस अक्षरैमें
देखेहैं अर्थात जे भरि वचनमें आवै है ते माया ब्रह्मरूप धोखईहै मिथ्याही सो
चौतिसै अक्षरके भीतर सबहै अनिर्वचनीयपदार्थ तोको कैसे मिले ॥ १ ॥ चौतिस
अक्षरको बिस्तार जो निगम अगम तामें साहब को ज्ञानभूलि भटकिकै जब-
पार नहीं पावै है तब फिरि थकिकै आपने घटमें आय या कहै है कि एकये-
डूनहीं है वेदहू तौ नेतिनेतिकहैं तब अपनो स्वरूपमें आयो सो साहबके ज्ञान
होतही गुरुवा लोग भटकाइकै अज्ञानमें डारि दिये जौन यह बिचारकियो कि ये
सब अनिर्वचनीय नहीं हैं सो गँवायंदियो अनिर्वचनीय धोखाब्रह्महीको
मानतभये ॥ २ ॥
खोजहिंब्रह्माविष्णुशिवशक्ती । अनंतलोगखोजहिंबहुभक्ती ३
खोजहिंगणगँधर्वमुनिदेवा । अनंतलोकखोजहिंबहुसेवा ४
( ९० ) बीजक कबीरदास ।
अनंत जे लोकहैं तिनमें अनंत जे ब्रह्मा बिष्णु महेश शक्ति तिनकी भक्ति
करिकै वही ब्रह्माण्डमें अनिर्वचनीय को खोजन लगे अरु वही को अनंत
लोकमें बहुत सेवाकरि गंधर्ब मुनि देबता खोजनलगे ॥ ३ ॥ ४ ॥
साखी ॥ यती सती सबखोजहीं, मनै न मानैहारि ॥
बड़े बड़े वीरवाचैनहीं, कहाहिकवीरपुकारि ॥ ५॥
औ यती सती सब मनमें हारि ना मानिकै वही अनिर्वचनीय जो मायाब्रह्म
ताहीको खोजैहै सो कबीरजी कहै हैं कि, मैं पुकारिकै कहौंहीं या माया ब्रह्मके
धोखाते बड़े बड़े बीर नहीं बाचे है जे कोई बिरले संत साहबको जानै हैं तेई
बाचे हैं तामें प्रमाण कबीरजीको ॥ (रसना रामगुणर मिरमि पीजै । गुणातीत
निर्मूलक लीजै । निरगुण ब्रह्मजपौ रे भाई । जेहि सुमिरत सुधिबुधि सब पाई॥
विषतजिराम न जपसि अभागे । काबूडैलालचकेलागे ॥ ते सब तरे रामरस
स्वादी । कह कबीर बूड़े बकवादी ) ॥ ५ ॥
इति पचीसवीं रमैनी समाप्तम् ।
अथ छब्बीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
आपुहि करता भे करतारा । बहुविधि वासनगढ़ै कुम्हारा १
बिधनासबैकीनयक ठाऊं । अनेक यतनकै बनकवनाऊं२
जठरअग्निमहँदियरजाली । तामें आपुभये प्रतिपाली ३
बहुत यतनकै बाहर आया । तब शिवशक्ती नामधराया ४
घरको सुत जो होय अयाना । ताके संग न जायसयाना५
सांचीवात कहौं मैं अपनी । भया देवाना और कि सपनी६
गुप्त प्रगट है एकै मुद्रा । काको कहिये ब्राह्मण शुद्रा ॥ ७॥
झूठ गर्व भूलै मति कोई । हिन्दू तुरुक झूठ कुल दोई ॥८॥
रमैनी । ( ९१ )
साखी ॥ जिनयह चित्र बनाइया, सांचा सूत्रधारि ॥
कहही कबीरते जन भले, चित्रवंतहिंलेहिविचारि॥६॥
आपुहिकरताभेकरतारा । बहुविधिबासनगढ़ैकुम्हारा ॥१॥
विधनासवैकीनयकठाऊं । अनेकयतनकैकनकवनाऊं ॥२॥
बिधि जे ब्रह्मःहैं ते अपनेको कर्त्ता मानि सब साजुजोरि अनेक यतन
कै जगत् बनावतभये जैसे कुम्हार दण्ड चक्र सब साज जोरिकै बासन
गढ़ै है सो करतार जो अपनेको कर्त्ता मान्यो सो वाकी अज्ञानताहै
काहेते कबीरजी कहै हैं कि सबसाजु आगेही उत्पन्न हैरही है कौन
नईसाज बनाइ करतार अपनेको कर्त्तामानै साजुतो सब आगेकी उत्पन्न भई है
सो कहै हैं ॥ १ ॥ २ ॥
जठरअग्निमहँदियपरजाली । तामेंआपुभयेप्रतिपाली॥३॥
बहुतयतनकैवाहरआया । तबशिवशक्तीनामधराया ॥४॥
जब महाप्रलय होइ जाइहै तबजौनकालरहिजायहै सोकाल सदा शिवरूपहै
ताके जठरमें कहे पेटमें अग्नि जो लोकप्रकाश ब्रह्म तामें समष्टि जीवपर
जालिदिये पराशक्ति को जाल लगाइ दिये अर्थात् अग्नि जो लोकप्रकाश ब्रह्म
सो महीं हौ यह मानि माया सबलित होतभयो तामें तौने माया के प्रति-
पाली आप ही होतभये अर्थात् जीवनके मानेमात्र मायाहै ॥ ३ ॥ सो माया
सबलित जो ब्रह्म समष्टि जीवरूप सो अनेक यत्न कहे रामनामको संसारमुख अर्थ
करि पांचौ ब्रह्म आदि सब बस्तु उत्पन्नकै समष्टितै ब्यष्टिद्वैकै जगत् उत्पन्न
कियो ताको शिव शक्त्यात्मक नाम धरावतभये ॥ ४ ॥
घरकोसुतजोहोयअयाना । ताकेसंग न जाहिसयाना ॥५॥
सोकबीरजी कहैहैं कि, हे जीवो! येब्रह्मादिकतुम्हारही सुत हैं तुम्हीं समष्टि
तै ब्यष्टि भयेहौ कि, जो घरकोपूत अयान होइ है ताकेसंग सयान नहीं जायहै
( ९२ ) बीजक कबीरदास ।
ऐसेही ब्रह्मादिक जे अनेकमत करिकै आपनेको कर्त्तामानि लिये हैं तिनकें संग
तुम न लागौ अर्थात् अनेक मतनमें तुम न परौ तुम साहब को जानो ॥ ५ ॥
साँचीबातकहौंमैंअपनी । भयादेवानाऔरकिसपनी ॥ ६ ॥
सो कबीरजी कहै हैं कि, सांचीबात मैं अपनी कहौंहौं अपनी कौनकी मैं
नाना मतनको छांड़ि साहबको जान्यो है सोतुम नहीं बूझौहै। और की सपनी
कहे स्वप्नवत् झूठी नानामतनकी वाणीमें देवाना कहे बिकल ह्वै रहेहौ हैं
जीवो ! सो नातामत त्यागि साहबको जानो कहे और की पुनि जो या पाठहोय
ताको अर्थ या है साँचोबात अपनी मैं कहताहूं जोमेरे मतमें साहबको जानता
है सोई साँचहै यासुनि पुनि और का जा भया सोई दिवाना ॥ ६ ॥
गुप्त प्रगट है एकै मुद्रा । काकोकहिये ब्राह्मणशूद्रा ॥ ७ ॥
झूठगर्व भूलै मतिकोई । हिंदू तुरुक झूठ कुल दोई ॥ ८ ॥
सो हेजीवौ! गुप्तकहे जब समष्टिमें रहे हौ तबहूं औ जबप्रगट कहे व्यष्टिमें रहेहौ
तबहूं एकही मुद्रारहेहौ अर्थात् साहिबै के रहे हौ तुम ने नाना मतनमें परि
नाना साहब मानि ब्राह्मण शूद्रकहतेहौ सो झूठेहौ जीवत्व तो एकही है ॥ ७॥
मैं हिंदूहौं मैं तुरुकहौं यह झूठो गर्वकरिकै मति कोई भूलौ विचारिकै देखौ
तौ हिंदू तुरुक कुल ये दोऊ झूठे हैं तुमतौ साहबके हौ ॥ ८ ॥
साखी ॥ जिन यह चित्र बनाइया, साचा सो सूत्रधार ॥
कहहिकविरतेइजनभले,चित्रवंतहिलेहिविचार ॥६॥
जिन यह नाना चित्र बनाइया कहे जिन यह जीवको मन नाना शरीर जगत्में
बनायो है तौनै को सूत्रधारी साहब साँचो है जोन सबको सुरतिदियो है सो
कबीरजी कहहै चित्रवंत जो या मन नानादेह देनेवालो याको जो कोई बिचा-
रिलियो कि या मिथ्याहै औ साँच साहब को जानिलियो ते जन भले हैं ॥६॥
इति छब्बीसवीं रमैनी समाप्ता ।