कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । (८७)
कहे काहे जड़वत् होयहै मनुष्य जन्म याते कह्यो अथवा जहँडाय कहे काहें
भूले जाते हैं कि, मनुष्य के मनुष्यै होय हैं हाथीके हाथी होय हैं कछू हाथी
के मनुष्य नहीं होयहैं ऐसे जो तैं निराकार ब्रह्मको हो तो तोहूं निराकार
होतो सो तैं मनुष्य है ताते मनुष्यरूपजे श्रीरामचन्द्रहैं तिनही को है ॥ ६ ॥
इति तेईसवीं रमैनी समाप्त ।
अथ चौबीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
चंद्रचकोर कसिवातजनाई । मानुषबुद्धिदीन पलटाई॥१॥
चारि अवस्था सपनो कहई । झूठे फुरे जानत रहई ॥२॥
मिथ्यावात न जानै कोई।यहिविधि सिगरे गये विगोई॥३॥
आगेदैदै सबन गँवावा । मानुष बुद्धि न सपनेहु पावा॥४॥
चौंतिस अक्षरसौं निकलै जोई।पापपुण्य जानैगा सोई॥५॥
साखी । सोइकहते सोइ होउगे,निकलि न बाहेरआउ ॥
होहुजूरठाढ़ो कहौं, धोखे न जन्म गँवाउ ॥ ६ ॥
चन्द्रचकोरकसिवातजनाई । मानुषबुद्धिदीनपलटाई॥१॥
साहब कहैहैं कि,हे जीवो ! तुमको गुरुवालोग चन्द्रचकोर कैसो दृष्टांत जना-
यकै नानाईश्वरमें लगायदियो कैसे जैसे चन्द्रमा को ताकत ताकत चकोर
चन्द्ररूपहै या बुद्धिमान्है तब चकोरको अग्निकी गरमी नहीं लगहै अग्नि खाय-
जायहै तैसेअपनोस्वरूप जो ब्रह्म ताको जबजानिलेहुगे तबतुमको दुःखसुख न
जानिपैरैगो कोई यह कहैहैं कि,जैसे चन्द्रमा चकोरमें नेहकरैहै ऐसे तुम ईश्वर-
नमें प्रीतिकरौगे तौ दुःखसुख न जानिपैरैगो यह जो तुम्हारी मनुष्यबुद्धि कि, मैं
हंसस्वरूपहौं द्विभुजहौं द्विभुजई को होऊँगो सो पलटायकै ब्रह्ममें लगायदियें
नानादेवतनमें लगायदिये ॥ १ ॥