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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 141

( ९० ) बीजक कबीरदास ।
अनंत जे लोकहैं तिनमें अनंत जे ब्रह्मा बिष्णु महेश शक्ति तिनकी भक्ति
करिकै वही ब्रह्माण्डमें अनिर्वचनीय को खोजन लगे अरु वही को अनंत
लोकमें बहुत सेवाकरि गंधर्ब मुनि देबता खोजनलगे ॥ ३ ॥ ४ ॥
साखी ॥ यती सती सबखोजहीं, मनै न मानैहारि ॥
बड़े बड़े वीरवाचैनहीं, कहाहिकवीरपुकारि ॥ ५॥
औ यती सती सब मनमें हारि ना मानिकै वही अनिर्वचनीय जो मायाब्रह्म
ताहीको खोजैहै सो कबीरजी कहै हैं कि, मैं पुकारिकै कहौंहीं या माया ब्रह्मके
धोखाते बड़े बड़े बीर नहीं बाचे है जे कोई बिरले संत साहबको जानै हैं तेई
बाचे हैं तामें प्रमाण कबीरजीको ॥ (रसना रामगुणर मिरमि पीजै । गुणातीत
निर्मूलक लीजै । निरगुण ब्रह्मजपौ रे भाई । जेहि सुमिरत सुधिबुधि सब पाई॥
विषतजिराम न जपसि अभागे । काबूडैलालचकेलागे ॥ ते सब तरे रामरस
स्वादी । कह कबीर बूड़े बकवादी ) ॥ ५ ॥
इति पचीसवीं रमैनी समाप्तम् ।
अथ छब्बीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
आपुहि करता भे करतारा । बहुविधि वासनगढ़ै कुम्हारा १
बिधनासबैकीनयक ठाऊं । अनेक यतनकै बनकवनाऊं२
जठरअग्निमहँदियरजाली । तामें आपुभये प्रतिपाली ३
बहुत यतनकै बाहर आया । तब शिवशक्ती नामधराया ४
घरको सुत जो होय अयाना । ताके संग न जायसयाना५
सांचीवात कहौं मैं अपनी । भया देवाना और कि सपनी६
गुप्त प्रगट है एकै मुद्रा । काको कहिये ब्राह्मण शुद्रा ॥ ७॥
झूठ गर्व भूलै मति कोई । हिन्दू तुरुक झूठ कुल दोई ॥८॥