कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८० ) बीजक कबीरदास ।
अथ बीसवीं रमनी ।
चौपाई ।
अबकहुरामनामअविनासी।हरितजिजियराकतहुँनजासी १
जहांजाहु तहँ होहुपतंगा। अवजनिजरहुसमुझिविषसंगा २
रामनामलौलायसोलीन्हा। भृङ्गीकीट समुझि मनदीन्हा ३
भोअतिगरुवा दुखकै भारी। करुजिययतनसोदेखुबिचारी४
मनकीवातहैलहरिबिकारा। त्वहिंनहिं सूझै वार न पारा ५
साखी ॥ इच्छाको भवसागरै, वोहित राम अधार ॥
कहैकबिरहरिशरणगहु, गोवच्छखुरविस्तार ॥६॥
अबकहुरामनामअविनासी।हरितजिजियराकतहुंनजासी १
अविनाशी जो रामनाम ताको अबहूं कहु । हरिकहे भक्तन के आरति हार-
णहारे जे साहब हैं तिनको छोड़ि हे जीव औरमतनमें कतहुंन जा अर्थातचित-
चित्ते विग्रहकरि सर्वत्रसाहिबैकोदेखु ॥ १ ॥
जहांजाहुतहँहोहुपतंगा । अवजनिजरहुसमुझिविषसंगा २
जौनेन मतमें जाहुहौ तहां पतंगहीसे जरिजाउहौ। सो ते गुरुवन को संगजो
बिषाग्नि ताको समुझि अबजनि जरहु अर्थात् जो इनको संगकरहुगे तौ मन इन्द्रिया-
दिकन को बिषय जो सिद्धांत कीन्हेहै ताही में तुम्हहूँको लगाइ देयँगे तौ
संसारही में परेरहोगे ताते इनको संगत्यागि गमनाम जपौ जो कहौ कौनीरीति-
ते जपै रामनामतौ मन वचनके पेरैहै सो आगे कहैंहैं ॥ २ ॥
रामनामलौलायसोलीन्हा । भृंगीकीटसमुझि मनदीन्हा ३
रामनाममें सो लौ लगाय लीन्हेहै कौनजौन भृङ्गी औ कीट की ऐसीगति
समुझिकै अपने मनदीन्हेहै अर्थात् जैसे कीटभृङ्गी को देखत देखत वाको शब्द