कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८२ ) बीजक कबीरदास ।
अथ इक्कीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
बहुतदुखै है दुखकी खानी । तबवचिहौजवरामहिजानी १
रामहि जानियुक्ति जोचलई । युक्तिहिते फंदा नहिं परई २
युक्तिहि युक्ति चलत संसारा । निश्चयकहा न मानुहमारा ३
कनक कामिनी घोरपटोरा । संपत्ति बहुत रहे दिनथोरा ४
थोरेहि संपतिगो बौराई । धरमरायकी खबरि न पाई ५
देखित्रासमुखगोकुम्हिलाई । अमृत धोखे गो विष खाई ६
साखी ॥ मैं सिरजों मैं मारहूँ, मैं जारों मैं खाउँ ॥
जलथलमैंहींरमरह्यों, मोरनिरंजननाउँ ॥ ७ ॥
बहुतदुखै हैदुखकीखानी । तबबचिहौजवरामहिजानी ॥१॥
रामहिजानियुक्तिजोचलई । युक्तिहितेफंदानहिपरई ॥ २ ॥
युक्तिहियुक्तिचलतसंसारा । निश्चयकहानमानुहमारा॥३॥
यह दुःखकी खानि जो संसारसो बहुतदुःखैहै अर्थात् बहुतदुःख देइहै तुम तबहीं
यातेबचोगे जब सबकेमालिक रक्षक जे श्रीरामचन्द्रतिनकोजानौगे आनउपाय न
बचौगे ॥१॥ काहेते जे श्रीरामचंद्र को जानिकै युक्ति सहित चलैहै तेई वही यु-
क्तिहीते संसारके फंदामें नहीं परैहैं सो कबीरजी कहैहैं सो युक्ति आगे लिखैंगे॥२॥
यासंसार केवल अपनी अपनी युक्तिहीते चलै है कबीरजी कहैहैं मैं जो निश्चय
बात कहौहौं कि, रामनामहीते तेरो उद्धार होयगो याकी युक्ति कोई नहीं मानैहै
अपनेही मनकी युक्ति चलैहै ॥ ३ ॥
कनककामिनी घोरपटोरा । संपतिबहुत रहेदिनथोरा ॥४॥
थोरेहि संपति गो बौराई । धर्मराजकी खबरि न पाई ॥ ५ ॥