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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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रमैनी । (८१)
सुनत सुनत वाको डेरात डेरात तदाकारहै भृङ्गीहीरूप ह्वै जाय है तैसे रामनाम
जपतजाइहै, वाको सुनतजाइहै, जगत्मुख अर्थते डेरातजायहै; औ साहबमुख
अर्थमें साहबकी रूप औ अपनो हंसस्वरूप बिचारत निज हंसस्वरूप में तदाकार
ह्वैजायहै, मनादिक मिंटिजायहै शुद्ध रहिजाय है सो अपनेरूप पायजायहै । तब
मन वचनके परे जो रामनाम सो आपनेते अस्फूर्त्तिहोइ है तामें लौलगायकै
जैसे कीटभृङ्गी बनिकै औरे कीटको भृङ्गी बनावैहै तैसे यहौ जीव उपदेश करिकै
औरेहूको हंसरूप बनावै है । सो जो भृङ्गीको शब्द कीट न ग्रहणकरै तौ कीट-
ही रहिजाय ऐसे जो रामनामको जीव ना ग्रहणकरै तौ असारही रहिजायहै
तामें प्रमाण अनुरागसागरको॥ ( ज्यों भृङ्गीगै कीट के पासा । कीटहिगहि गुरग
मि परगासा ॥ बिरला कीट होय सुखदाई । प्रथम अवाज गहै चितलाई॥ कोइ
दूजे कोई तीजे मांनै । तन मन रहित शब्दहित जानै ॥ तबलगै भृङ्गी निजगे-
हा । स्वाती दैकर निज समदेहा ) ॥ ३ ॥
भोअतिगरुवादुखकैभारी । करुजियतनजोदेखुविचारी४
मनकीबातहैलहरिविकारा। त्वहिंनहिंसूर्झैवारनपारा ॥ ५॥
यह संसार भारी दुःखक.रिकै अति गरुवा बोझाहै जीव तू बिचारि देखु जौ
तोको बोझालगै तौ रामनामको यतन करु ॥४॥ मनकी बातकहै मनते गुरुवन
को धोखा ब्रह्म तेहिते उठी जो काररूप लहरि माया ताको कौनो मन कहिकै
तोको वारपार नहीं सूझै है ॥ ५ ॥
साखी ॥ इच्छाकेभवसागरै, वोहितरामअधार ॥
कहैकबीरहरिशरणगहु, गोबछखुरविस्तार ॥६॥
यह जो समष्टि जीवको इच्छारूप भवसागर तामें वोहित जो नौका रामना-
म सोई आधार है और नहीं है सो कबीरजी कहैं हैं हरि जे साहेबहैं तिनकी
शरणगहु यह भवसागर गऊके बछवाके खुरके सम उतरि जायगो यामें
संदेह नहीं है ॥ ६ ॥
इति बीसवीं रमैनी समाप्त ।
६