कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७८ ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ संशयसाउजदेहमें, संगहिखेलैजुआरि ॥
ऐसाघायलवापुरा, जीवनमारैझारि ॥ ५ ॥
जैसे शिकारी बाघको मारैहै जो बाघ घायलभयो तौ शिकारीको धरिडारैहै
तैसे संशयसाउज जो व्याघ्ररूप मन सो देहरूपी बनमें बसैहै ताके संग जीव
जुआं खेलै है जब मनोबासनाछैकी उपाय कियो तब वही वाको घायल ह्वैबोहै
सो व्याघ्ररूप जो मन है सो घायलह्वैकै बापुरे जे सबजीव हैं तिनको झारदेकै
मारैहै अर्थात् सबको वहीं माया धोखा ब्रह्ममें लगायदियो औ जोयह पाठहोय कि
( ऐसा घायल बापुरा सब जीवनमारै झारि) तो यह अर्थहै कि ऐसा घायलकहे
घाती जो मन सो बापुरेजीवनकोझारादैंकैमारैहै जननमरणदेईहै ॥ ५ ॥
इति अठारहवींरमैनीसमाप्तम् ।
अथ उन्नीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
अनहदअनुभवकीकरिआशा। देखौ यहविपरीततमाशा॥१॥
यहै तमाशा देखहु भाई । जहँहैशून्यतहां चलिजाइ ॥ २ ॥
शून्यहिवांछा शून्यहि गयऊ। हाथाछोड़ि बेहाथाभयऊ॥३॥
संशय साउज सब संसारा । कालअहेरी सांझसकारा ॥४॥
साखी ॥ सुमिरन करहु सो रामको, काल गहैहै केश ॥
नाजानौं कब मारि है, क्याघर क्यापरदेश॥५॥
अनहदअनुभवकीकरिआशा। देखौयह विपरीततमाशा १
अनहद शब्द सुनतसुनत जौने ब्रह्मको अनुभव होईहै ताको तू विचारैहै
कि ब्रह्म मैंहीहौं या नहीं जानैहै कि अनहद मेरे शरीरहीकोहै वह ब्रह्म मेरही
अनुभवहै यह बड़ो तमाशाहैताही की आशाकरै है यह बड़ी बिपरीत है ॥ १ ॥