कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७४ ) बीजक कबीरदास ।
देख्यो तबतक तो उजियारी जब ज्योतिमें लीनह्वैगयो तब सुषुप्ति ऐसेमें
पर्यो रह्यो यही भयावनि रैनिहै भयावनिको हेतु यह है कि प्राणके उतरिबेकी
अवधि बनीहै ॥ ४ । ५ ॥ ६ ॥
साखी ॥ सभैलोगजहँडाइया, औ अन्धासभैभुलान ॥
कहाकोइनहिमानही, सबएकैमाहँसमान ॥ ७ ॥
और जे मायाते सभयरहे डेराते रहे ते लोग जहँडाइया कहे बहेकिकै औ-
रई और मतनमें लगिगये औ जेअज्ञान आंधेररहें ते संसारहीमें परे संसार
छूटिबेको उपौवैना किये भूलिही गये सो कबीरजी कहैंहैं कि मेरो कहा कोई
नहीं मानैहै सब जे जीव हैं ते एक जो मायाब्रह्म ताहीमें सब समाते भये
इत्यर्थ औ साहबको बिनाजाने ब्रह्महूमें लीनहै संसारहीमें आवैहै वाको प्रमाण
पीछे लिखिआये हैं ॥ ७ ॥
इति सोलहवीं रमैनी समाप्तम् ।
अथ सत्रहवीं रमैनी ।
चौपाई ।
जसजिवआपिमिलैअसकोई। बहुतधर्मसुखहृदयाहोई ॥१॥
जासों बातरामकी कही । प्रीति न काहूसोंनिर्वही ॥ २ ॥
एकैभाव सकलजगदेखी । बाहेरपरैसोहोयविवेकी ॥ ३ ॥
विषयमोहकेफंदछोड़ाई । जहांजायतहँकाटुकसाई ॥ ४ ॥
आय कसाई छूरी हाथा । कैसहु आवै काटौंमाथा ॥ ५ ॥
मानुष बड़े बड़े ह्वैआये । एकै पण्डित सबै पढ़ाये ॥ ६ ॥
पढ़नापढ़हुधरहुजिनगोई । नहिंतोनिश्चयजाहुविगोई॥७॥
साखी ॥ सुमिरन करहु सुरामको, औ छांड़हु दुखकी आस॥
तरऊपर धरि चापिहैं जसकोल्हूकोटिपचास ॥८॥