कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । ( ८५ )
औरो आगम करेविचारा । त्यहिनहिंसूझैवारनपारा॥ ६ ॥
जप तीरथ ब्रत पूजेभूता । दान पुण्य औ कियेबहूता ॥ ७ ॥
अरु औरौ आगम जेहैं ज्योतिष यंत्र मंत्र आदिदैकै तेऊ तात्पर्य वृत्तितें
जौने साहबको कहैहैं ताको वारपार तो तुमको न सूझिपर्यो वाच्यार्थ प्रतिपाद्य
जो धोखा ब्रह्म और और देवता ताही में लागत भये॥६॥सो यहिप्रकार नाना
मतन करिकै मानते भये कोई नाना देवतन के जपकिये कोई तीर्थ किये कोई
ब्रत किये कोई भूतनकी पूजाकिये कोई दानकिये कोई पुण्य जो यज्ञादिक कर्म
ते किये ॥ ७ ॥
साखी ॥ मंदिरतोहै नेहको, मतिकोइ पैठेधाई ॥
जोकोइपैठेधाइके, बिनुशिरसेंती जाई ॥ ८ ॥
सो यह सब मतमा एक नानोदेवता धोखा ब्रह्म इनमें जो प्रीति है सो
नेहको मंदिरहै तामें तू धायकै मतिपैठै जो इनमें धायकै पैठैगो तौ बिनु
शिरकहे सबकेशिरे जे साहब तिनके बिना सेंतिही जाईगो कछुहाथ न लगैगो
तेरेसाधन मुक्तिदेनवाले न होवेंगे संसारही देनवाले होइँगे अथवा तुम्हारोमाथा
काटो जायगो वृथा मारेजाउगे ॥ ८ ॥
इति बाईसवीं रमैनी समाप्त ।
अथ तेईसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
अल्पसौख्यदुखआदिहुअंता । मन भुलानमैगर मैमंता॥१॥
सुख विसराय मुक्तिकहँपावै। परिहरिसांचझूंठनिजधावै॥२॥
अनल ज्योति डाहै यकसंगा।नयन नेह जसजरै पतंगा॥३॥
करु बिचारज्यहिसबदुखजाई।परिहरिझूठा केरि सगाई॥४॥
लालच लागे जन्म सिराई।जरामरणनियरायलआई॥५॥