कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी। (७९)
यहैतमाशादेखहुभाई । जहँहैशून्यतहांचलिजाइ ॥ २ ॥
शून्यहिवांछाशून्यहिगयऊ । हाथाछोड़िवेहाथाभयऊ ॥ ३ ॥
सो हे भाइयो! हे जीवो ! यह तमाशा तुमहूं अनेकन जन्मते देखतैआयेहौ
परन्तु जहां शून्यहै तहां जाइकै मुक्ति हैवो चाहौहौ तुम या नहीं बिचारौहौ
कि शून्य जो धोखा ब्रह्म तामें जो हम जायँगे तौ हमारी मुक्तिकी बांछहु शून्य
ह्वैजायगी अर्थात् मुक्ति न होयगी सो या बड़ो आश्चर्यहै अपनेते झूठेमें बांधिकै
साहब को हाथ छोड़िकै बेहाथ भयऊ कहे धोखा ब्रह्मके हाथमें ह्वैजाउ हौ
अथवा कबीरजी झूटे जीवनते कहैहैं हे भाइयो ! देखौ तो तमाशा ये जीव
जहां शून्यहै धोखाहै तहां सब चलेजाँयहैं जौने ज्ञानमें साहब भरेपूरे हैं तहां
नहीं जायँहैं २ । ३ ॥
संशयसाउजसबसंसारा । कालअहेरीसांझसकारा ॥ ४ ॥
' संशय कहै मनरूप जो साउज ताहीको सकलकहे सुरति यासंसार है रह्यो
है अर्थात् मनरूप जीव है रह्यो है संकल्प विकल्प सबैकैरहेहैं संशय सब जीव
को लग रही है । सो अहेरी जोकाल शिकारी सो सांझ सकारकहे काहू को
जन्मतमें मारैहै काहू का मध्य अवस्था में और काहूको आयुर्दायके अंतमें
मारैहै ॥ ४ ॥
साखी ॥ सुमिरनकरहुसोरामको, कालगहेहै केश ॥
नाजानौंकबमारिहै, क्याघरक्यापरदेश ॥ ५ ॥
सो कबीरजी कहैहैं कि परमपुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनको सुमिरण करहु
शिकारी जो कालहै सो केश करमें गहेहै या नहीं जानौहौ धौं कब मारै या
घरमें या परदेशमें अर्थात् साहबकेबिना स्मरण घरमेंरहोगे तौ न बचोगे जोँ
बनमें जाउगे तोहू न बचौगे ॥ ५ ॥
इति उन्नीसवींरमैनी समाप्तम् ।