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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 135

( ८४ ) बीजक कबीरदास ।
धंधा बँधा कीन्ह व्यवहारा । कर्म विवर्जित बसै निनारा ॥३॥
षटआश्रमषटदरशनकीन्हा । षटरसवस्तुखोटसबचीन्हा ॥४॥
चारि वृक्ष छाशाख बखानै । विद्याअगणितगनै न जानै॥५॥
औरौ आगम करै विचारा। तेहिनहिंसूकै वार न पारा ॥६॥
जप तीरथ व्रत पूजे भूता । दान पुण्य औ किये बहूता॥७॥
साखी ॥ मंदिर तो है नेहको,मति कोइ पैठे धाइ ॥
जोकोइपैठे धाइकै, बिन शिर सेंतीजाइ ॥ ८ ॥
अलखनिरंजनलखैनकोई । जेहिकेबँधे बँधासवकोई ॥ १ ॥
जेहिझूठो सो बँधो अयाना । झूठीवातसांचकैमाना ॥ २ ॥
धंधाबँधाकीन्ह व्यवहारा । कर्मविवर्जितबसैनिनारा ॥ ३ ॥
कबीरजी कहैहैं कि, हे जीव! तूतो अपनेको निरंजन मान्यो सो निरंजन तों
अलखहै वाको कोईनहीं लखैहै जाके बँधतेकहे मायामें सब कोई बँधे हैं ॥ १ ॥
हे अजानौ ! जौने झूठे सो तुम बँधे हौ सो झूठही है तुम सांच मानौहौ सो न
मानौ ॥ २ ॥ धन्धा जो साहबकीसेवा ताको बँधाकहे बांधनवारे तौनेको व्यव-
हार तुम कीन अर्थात् व्यवहार मानि कर्मते वर्जित ब्रह्म सबते
न्यारही रहै है या परमार्थ तुमलोग कहौहौ औ वाहीमें आरूढ़ होतहौ साह-
बको नहीं जानौहौ ॥ ३ ॥
षटआश्रमषटदरशनकीन्हा । षटरसवस्तुखोटसबचीन्हा ॥४॥
चारिवृक्षछाशाखबखानै । विद्याअगणितगनैनजानै ॥ ५ ॥
षटरसनको खोटमानि त्यागन करिकै औ षटआश्रम करिकै षट दर्शन
करिकै वही धोखा ब्रह्मही को सिद्धांत मानते भये ॥ ४ ॥ पुनि चारि वेद
छवोशास्त्र अगणित विद्या वाच्यार्थ करिकै धोखा ब्रह्मको कहैहैं ताको तो तुम
ग्रहणकियो तात्पर्य वृत्ति ते जो साहबको कहैहै सो तुम न जानत भये ॥ ५ ॥