कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकनक जेहै कामिनी जेहै घोड़े जैहैं हाथी जैहैं पटंबर जैहैं ये संपति तो
बहुतहै परंतु इनके भोग करिबेको दिनतो थोरही है अर्थात् आयुर्दाय थोरी है
सोतौ भोगमें बितावै है साहबको कब जानैगो ॥ ४ ॥ सो तै तो थोगी
संपत्तिमें बौराय गयो धर्मराज की खबरि तै नहीं पाई कि, जब मोको ६
जाइँगे तब सारी संपत्ति दियई परीरहि जायगी तब कौन भोगकरैगो
बिचारि साहब को जानो ॥ ५ ॥
देखित्रासमुखगोकुम्हिलाई । अमृतधोखेगोबिषखाई ॥६॥
औ दैवयोगजो कदाचित् तुम्हे धर्मराजको त्रासदेखिकै मुख जब कुम्हिलां-
यगयो कहे संसारते बैराग्यभई तब गुरुवालोगनके निकटजाइ अपनो स्वरूप
समुझौ कि, मैं अमृतहौं मन मायादिक ते भिन्नहौं सो बाततो तू सांचिबिचारी
ऐसहीहै परंतु भगवत् अंशत्व तेरे स्वरूपमें है सो गुरुवालोग नहीं बतायो और-
हीमें लगाय दियो सो अपनो स्वरूप समुझबो जो अमृत ताही के धोखे ते
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