कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । ( ९१ )
साखी ॥ जिनयह चित्र बनाइया, सांचा सूत्रधारि ॥
कहही कबीरते जन भले, चित्रवंतहिंलेहिविचारि॥६॥
आपुहिकरताभेकरतारा । बहुविधिबासनगढ़ैकुम्हारा ॥१॥
विधनासवैकीनयकठाऊं । अनेकयतनकैकनकवनाऊं ॥२॥
बिधि जे ब्रह्मःहैं ते अपनेको कर्त्ता मानि सब साजुजोरि अनेक यतन
कै जगत् बनावतभये जैसे कुम्हार दण्ड चक्र सब साज जोरिकै बासन
गढ़ै है सो करतार जो अपनेको कर्त्ता मान्यो सो वाकी अज्ञानताहै
काहेते कबीरजी कहै हैं कि सबसाजु आगेही उत्पन्न हैरही है कौन
नईसाज बनाइ करतार अपनेको कर्त्तामानै साजुतो सब आगेकी उत्पन्न भई है
सो कहै हैं ॥ १ ॥ २ ॥
जठरअग्निमहँदियपरजाली । तामेंआपुभयेप्रतिपाली॥३॥
बहुतयतनकैवाहरआया । तबशिवशक्तीनामधराया ॥४॥
जब महाप्रलय होइ जाइहै तबजौनकालरहिजायहै सोकाल सदा शिवरूपहै
ताके जठरमें कहे पेटमें अग्नि जो लोकप्रकाश ब्रह्म तामें समष्टि जीवपर
जालिदिये पराशक्ति को जाल लगाइ दिये अर्थात् अग्नि जो लोकप्रकाश ब्रह्म
सो महीं हौ यह मानि माया सबलित होतभयो तामें तौने माया के प्रति-
पाली आप ही होतभये अर्थात् जीवनके मानेमात्र मायाहै ॥ ३ ॥ सो माया
सबलित जो ब्रह्म समष्टि जीवरूप सो अनेक यत्न कहे रामनामको संसारमुख अर्थ
करि पांचौ ब्रह्म आदि सब बस्तु उत्पन्नकै समष्टितै ब्यष्टिद्वैकै जगत् उत्पन्न
कियो ताको शिव शक्त्यात्मक नाम धरावतभये ॥ ४ ॥
घरकोसुतजोहोयअयाना । ताकेसंग न जाहिसयाना ॥५॥
सोकबीरजी कहैहैं कि, हे जीवो! येब्रह्मादिकतुम्हारही सुत हैं तुम्हीं समष्टि
तै ब्यष्टि भयेहौ कि, जो घरकोपूत अयान होइ है ताकेसंग सयान नहीं जायहै