कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । ( ८९ )
अथ पचीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
चौंतिस अक्षरकोयहैबिशेखा । सहसौ नामयहैमें देखा १
भूलिभटकि नर फिरिघरआवैं । होतज्ञान सोसवन गवाँवैं २
खोजहिंब्रह्माविष्णु शिवशक्ती । अनंतलोगखोजहिंबहुभक्ती ३
खोजहिंगणगँधर्वमुनिदेवा । अनंतलोकखोजहिंबहुसेवा ४
साखी ॥ यतीसती सबखोजहीं, मनै न मानै हारि ॥
बड़ेबड़े बीरवाचें नहीं, कहहिं कबीरपुकारि ॥ ५॥
चौंतिसअक्षरकोयहैबिशेखा । सहसौनामयहैमेंदेखा ॥ १॥
भूलिभटकिनरफिरिघरआवै । होतज्ञानसोसवनगवाँवै ॥ २॥
चौतिस अक्षर को विशेष धोखई है काहेते हजारनाम यही चौतिस अक्षरैमें
देखेहैं अर्थात जे भरि वचनमें आवै है ते माया ब्रह्मरूप धोखईहै मिथ्याही सो
चौतिसै अक्षरके भीतर सबहै अनिर्वचनीयपदार्थ तोको कैसे मिले ॥ १ ॥ चौतिस
अक्षरको बिस्तार जो निगम अगम तामें साहब को ज्ञानभूलि भटकिकै जब-
पार नहीं पावै है तब फिरि थकिकै आपने घटमें आय या कहै है कि एकये-
डूनहीं है वेदहू तौ नेतिनेतिकहैं तब अपनो स्वरूपमें आयो सो साहबके ज्ञान
होतही गुरुवा लोग भटकाइकै अज्ञानमें डारि दिये जौन यह बिचारकियो कि ये
सब अनिर्वचनीय नहीं हैं सो गँवायंदियो अनिर्वचनीय धोखाब्रह्महीको
मानतभये ॥ २ ॥
खोजहिंब्रह्माविष्णुशिवशक्ती । अनंतलोगखोजहिंबहुभक्ती ३
खोजहिंगणगँधर्वमुनिदेवा । अनंतलोकखोजहिंबहुसेवा ४