कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 126, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । ( ७५ )
जसजिवआपुमिलैअसकोई । वहुतधर्मसुखहृदयाहोई॥१॥
जासोंबात रामकीकही । प्रीति न काहूसों निर्वही ॥ २ ॥
जैसो आपु होई तैसो जबताको मिलै तबहीं धर्मबढै है औ हृदयमें बड़ो
सुखहोयहै तामें प्रमाण गोसाईंजीको ॥ दोहा ॥ इष्टमिलै अरु मन मिलै, मिलै
भजनरसरीति ॥ तुलसिदास तासों मिलै, हठिकै उपजै प्रीति १ सो औरी-
भांति सुखनहींहोयहै १ काहे ते कि जासों कहे जौने जीवनसों रामकी बात मैं
कहौं हौं कि तैं रामचन्द्रकोहै तिनको अपनो साहब मानु नाना ईश्वर जो तैंने
माने हैं सो येसब मायाके जालमें परेंहैं तोको कहा उबारेंगे सो कबीरजी कहैंहैं
कि या मेरी बातपै काहू जीवनकी प्रीति न निबहतभई अर्थात् जो मेरीबात
प्रीतिते सुनै साहब को जानै जपने अपने मतमें आरूढ़है वादसोकरैहै वस्तुनहीं
ग्रहणकरै है ॥ २ ॥
एकैभाव सकलजगदेखी । बाहेरपरै सोहोय विवेकी ॥ ३ ॥
विषयमोहकेफंदछोड़ाई । जहां जाय तहँकाटकसाई॥ ४ ॥
एकैभाव सकल जगदेखी कहे जे एक ब्रह्मभाव जगत्को देखै हैं तेहिते बा-
हेर अपनेको दासमानि सब में चिद्रूपको जो जानै है । सोई विवेकी होयहैं
सो ऐसे विवेकिकनके पासतो नहीं जायहै २ नाना विषयके मोहके फंद छोड़ायकै
अर्थात् संसारते वैराग्य करिकै अधिकारिह्वैकै जहांजहांजायहैं तहांतहां कसाई जे
गुरुवा लोग ते गलाकोटैहैं अर्थात् साहबको ज्ञानकाटि धोखा ब्रह्ममें लगाय देयँ
हैं । सो याको गलाकाट्यो गलाकाटे फेरिजन्महोयहै याते गुरुवालोगनको कसाई
कह्यो । ऐसे याहूको जनन मरण होय है । ब्यंग्य यहहै कि जे जीव साहब
को त्यागि और औरमें लगे हैं ते पशुहैं उनको ऐसही गलाकाट्यो जायहै ॥४ ॥
कसाई तो शरीरको गलाकाटैहैं और—
आय कसाई छूरी हाथा । कैसेहु आवै काटों माथा ॥ ५ ॥
१ स्वार्थी गुरुवालोग जिनको संसारी सुख और क्षणिक मान बड़ाईके अतिरिक्त
सत्यका ज्ञानही नहीं है । २ गुरुवालोगोंके नानाप्रकारसे जीवोंको ठगनेके उपाय ।