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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

( ६६ ) बीजक कबीरदास ।
देखत उतपतिलागु न वारा । एक मरैयककरैबिचारा ॥ १० ॥
हे जीवौ ! तुम या देखतहौ कि जो समाधि उतरी तो मनादिक उत्पन्न होत
बार नहीं लगैहै तौ संसार कबै छूट्यो औ येहूं देखतहौ कि एकै मरैं हैं तिनको
लाय आय गैवगुफा जरिगई औ फिर वही गैवगुफामें प्राण चढ़ाय मुक्तिको बिचा-
रौहौ अर्थात् मुक्ति चाहौहौ सो हे जीवौ तुम सब बिचारौ ! तौ जो समाधि सुख
नित्य हो तो तौ कैसे मिटिजातो ताते नित्य नहीं है ॥ १० ॥
मुयेगयेकी काहु न कही । झूठी आशलागिजगरही ॥ ११ ॥
तुम्हारे गुरुवा लोगमरे मरिकै कहां गये कौनी गतिको प्राप्त भये या निकासकी
बात तो काहू न कह्यो सो तौ तुम सब न बिचारयो धोखा ब्रह्महोवेकी जो झूटी
आशा ताहीमें तुमसब लागिरहेहौ मोको न जानतभये ॥ ११ ॥
साखी ॥ जरतजरतसेवाँचहु, काहे न करहुगोहारि ॥
बिष बिषयाकैखायहु, रातिदिवसमिलि झारि ॥ १२ ॥
प्रथम तो हेजीवौ ! नानायोनि नरकगर्भ बासके जठराग्निमें जरत जरतसे
बचेहु अर्थात् मोसों नानाप्रार्थना करि गर्भबास ते निकसे सो गर्भबास को दुःख
तौ तुमको भूलिगयो । औ जैन मोसों करार कियेरहौ सोऊ भूलिगयो बिषरू-
पा जो बिषयताही को रातिवदिन खायहु अर्थात् झारि बिषयही भोगकीन्हों मेरी
शरण को काहै न गोहरायो । जे मेरी शरणको गोहरावै हैं तेई बचै हैं सो हे
जीवौ ! जब मेरी शरणको गोहरावोगे तबहीं बचोगे मेरी या प्रतिज्ञा है जो कोई
मेरी शरणको गोहरावैहै ताको मैं बचायही लेउहौं । गोहारिको अर्थ यह है कि
कोई हमारी रक्षाकरै सो साहब शरणगयेरक्षा करतही हैं तामें प्रमाण ॥ ( सकृद्दे
वप्रपन्नाय तवास्मीतिच याचते । अभयंसर्वभूतेभ्योददाम्येतद्व्रतमम ) ॥ १ ॥
इतिबाल्मीकीये ॥ १२ ॥
इति तेरहवीं रमैनी समाप्तम् ।
१ नाना प्रकारके कर्म, उपासना और ज्ञान की जौ कल्पना सोई कल्पना विषय ।

रमैनी । ( ६७ )
अथ चौदहवींरमैनी ।
गुरुमुख । चौपाई ।
बड़सो पापीआयगुमानी । पाखंडरूपछलोनरजानी ॥ १ ॥
वामनरूप छल्योवलिराजा।ब्राह्मणकीन कौनसोकाजा॥२॥
ब्रह्मणही सबकीन्होंचोरी । ब्राह्मणहीको लागी खोरी ॥ ३ ॥
ब्राह्मण कीन्होग्रंथ पुराना । कैसेहुकैमोहिं मानुषजाना॥४॥
यकसे ब्रह्मै पंथ चलाया । यकसेहंस गोपालहिगाया ॥ ५ ॥
यकसे शंभू पंथ चलाया । यकसे भूतप्रेत मनलाया ॥ ६ ॥
यकसे पूजा जौन विचारा । यकसेनिहुरिनेमाजगुजारा ॥७॥
कोई काहूकोहटा न माना । झूठा खसमकबीरन जाना ८॥
तनमनभाजिरहु मेरे भक्ता । सत्यकबीर सत्यहै वक्ता ॥९॥
आपुहिदेवआपुही पाती । आपुहिकुलआपुहिहैजाती॥१०॥
सर्वभूतसंसार निवासी । आपुहिकुसुमआपुसुखरासी॥११॥
कहतेमोहिंभये युगचारी । काके आगे कहौं पुकारी ॥१२॥
साखी ॥ सांचो कोई न मानई, झूटाके सँगजाय ॥
झूठेझूठा मिलिरहा, अहमक खेहाखाय ॥ १३ ॥
बड़ोसोपापी आयगुमानी । पाखँडरूपछलोनरजानी ॥ १ ॥
वावनरूपछल्योवालिराजा।ब्राह्मणकीनकौनकरकाजा ॥२॥
साहब कहैहैं तै बड़ोपापी है बड़ोगुमानी है काहेते कि मैं येतो समझाऊंहीं तैं
नहीं समझैहै सो मैंजान्यो पाखंडरूप, जो धोखा ब्रह्मताते हेनर ! तुमछलेगये
और जिनको छल्यो तिनको कहैहैं १ वहीमाया सवलित ब्रह्म बामनरूप करिकै

( ६८ ) बीजक कबीरदास ।
बलिराजाको छल्यो है सो या ब्राह्मण जोमाया सबलित ब्रह्म सो कौनको काजकीन्हों
है अर्थात् नहीं कीन्हों है ॥ २ ॥
ब्राह्मणहीसबकीन्होंचोरी।ब्राह्मणहीकोलागीखोरी ॥ ३ ॥
वहीब्रह्म सबकी चोरीकियो है काहेते कि मायातो जड़है यह चैतन्यहै
ब्रह्मही माया सबलितहै मायहूको कर्ताके मेरेसांचेज्ञानको संसारमें शंकादिक
पदार्थ बनाइ चोराइराख्योहै सो जब व्यापकरूप ते सबपदार्थ ब्रह्महीठहरचो
औब्रह्महीके संयोगते मायाकर्ता भई है तब ब्रह्महीको खोरिलगी कि वही
सब करैहै ॥ ३ ॥
ब्रह्महिकीन्हों ग्रंथ पुराना । कैसेहुकैमोहिंमानुषजाना ॥ ४ ॥
वहीमाया सबलित जो ब्रह्महै ताहीते सब वेदपुराण निकसेहैं ताहीते ना-
नामतभये कोई निराकार ब्रह्मही कोई चतुर्भुज कोई अष्टभुज इत्यादि मानत-
भये । तुम सब बसहु जो निर्गुण के सगुणपरे वेदपुराणको तात्पर्यताको जा-
निकै ऐसो मेरो मनुष्य रूप कैसेहुकैकह जसतसकै कोई बिरलेसंत जानै हैं
और नहीं जानै हैं अथवा मोको सब बातके जनैया श्रीरामचन्द्रको सांच मनु-
ष्यरूप है तामें प्रमाण ॥ ( आत्मानंमानुषंमन्ये रामंदशरथात्मजम् ) ॥
इति और जे नानापंथ वेदतेनिकसे तिनको आगे कहैं ( दशतिसर्पानि-
तिदशः गरुड़ः सरथोयस्यसः दशरथः विष्णुः सएव आत्मजोयस्यसः
दशरथात्मजः तं ) ॥ ४ ॥
यकसेब्रह्महिपन्थचलाया । यकसेहंसगोपालहिगाया ॥ ५ ॥
यकसे कहे एकजो माया सबलित ब्रह्म ताही को भतिपादन करत ब्रह्मैनां-
ना शास्त्रके नानापंथ चलावतभये । औ यकसे कहै एक जो माया सबलित
ब्रह्मताहीको बिचारकरत हंसजो जीव सो गोपालहि गावतभये अर्थात् गोजो-
इंद्रिताको पालनवारो जो मनताहीको गावतभये अर्थात् मन्मुखी पंथ चलावत्
भये औ ब्रह्माने वेदकह्योहै वेदते सबमत निकसेहैं जीवनको जोजुदेकरि कै
कह्यो सोमेरे सम्मुखको जो अर्थ है ताको छपाय दीन्हों वेद अर्थ नानादेवतन
यज्ञादिमें लगायदीन्हे ॥ ५ ॥

रमैनी । ( ६९ )
यकसे शम्भूपंथचलाया । यकसे भूतप्रेत मनलाया ॥ ६ ॥
यकसेपूजाजौनविचारा । यकसेनिहुरिनेवाजगुजारा ॥७॥
यकसेकहे एकजो माया सबलित ब्रह्माताहीको प्रतिपादन करत वेदको
अर्थ बदलिकै महादेवजीको तामसमत चलावतभये और यकसे कहेएक जो-
माया सबलित ब्रह्माताहीको प्रतिपादनकरत जीवनको मन भूत प्रेतदेव सब
लगायदेतेभये अर्थात् माया में अरुझाय देतेभये ६ यकसे कहे एक जो माया
सबलित ब्रह्म ताके ज्ञानहेतु निहुरिकै मुसलमानलोग नेवाज गुजारतभये ॥७॥
कोउकाहूको हटा न माना । झूठाखसमकबीरनजाना॥८॥
तनमन भजिरहुमेरेभक्ता । सत्य कबीर सत्यहैवक्ता ॥ ९ ॥
कोऊ काहूको हटको न मानतभये झूठाजो धोखा ब्रह्म ताही को दृढ़करि-
कै कायाके बीरजे जीव ते नाना देवतनसोते खसम जानतभये । कोई महीं
ब्रह्महौं या मानतभये । खसम जो परमपुरुष मैंहौंताको तुमसब न जानतभये ८॥
तनमनते मोहींमें लगो तबही तिहारो उबारहोइगो सोहे कबीर जीवो
एकतो तुम सत्यहौ और एक जो तिहारे समुझावन वाला वक्ता मैं सो सत्यहौं
और सबझूठे हैं वही ब्रह्म चारों ओर हैगयो है यह द्वैमत दिखायो तामें प्रमाण
( सत्यमात्मा सत्यजीवो सत्यंभिदः ) ॥ ९ ॥
आपुहिदेवआपुहीपाती । आपुहिकुलआपुहिहैजाती॥१०॥
सर्वभूतसंसारनिवासी । आपुहिखसमआपुसुखरासी॥११॥
कहतेमोहिंभयेयुगचारी । काकेआगेकहौंपुकारी ॥ १२ ॥
औवही माया सबलित ब्रह्म आपुही देवता हैगयौहै आपुही फूलपातीहैं
आपुही पूजा करनवालो है आपहीकुल जातिहै १० सोयाभांतिते वहीब्रह्म सर्व-
भूतमें निवासी हैकै आपुही खसमहै रह्यौहै औ जामें पुरुषके सुखको सांचहै
ऐसी सुखराशी नारीहै रह्यौहै ११ सो यह बात चारों युगमोंको कहतभयो
काके आगे पुकारिकै कहा कोई समुझै या धोखा ब्रह्मको नहीं देखोपरे ॥१२॥

( ७० ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ सांचेकोइ न मानई, झूठाके सँगजाय ॥
झूठे झूठा मिलिरहा, अहमक खेहाखाय ॥ १३ ॥
सांचो मैं सांचे तुम जीव यह मततो कोई नहीं मानैहै झूठाजो वहब्रह्मताकें
संगसब जायैहैं अर्थात् वहीको सर्वस्वमानै है सो झूठावह ब्रह्मऔझूंठाज्ञानवाला
जोजीव सोमिलिकै अहमक खेहा खायहै अर्थात् मरयो तब राख खायहै जनम
मरण नहीं छूटै है ॥ १३ ॥
इति चौदहवींरमैनी समाप्तम् ।
अथ पंद्रहवींरमैनी ।
चौपाई ।
उनई बदरिया परिगै सांझा। अगुवा भूले वनखंड मांझा॥१॥
पियनतैधनअनतैरहई । चौपरि कामरि माथे गहई ॥२॥
साखी ॥ फुलवा भार न लैसकै, कहै सखिन सों रोइ ॥
ज्यों ज्यों भीजै कामरी, त्यों त्यों भारी होइ॥३॥
उँनईवदरियापरिगैसाँझा । अगुवाभलेवनखंडमाँझा ॥ १ ॥
भ्रमकी बदरी ओनई परिगै साँझा कहे जगतमें अँधियारी है गई साहबकों
ज्ञानरूपी रबि मूँदिगयो न समुझि परत भयो तब बनखंड जो चारिउ वेद तामें
भगुवा जे ब्रह्मादिक सब मुनि ते भूलिगये । कोई भैरव कोई भवानीको कोई
गणेशको इत्यादि नानादेवतनकी उपासना करतेभये । औशास्त्रहुमें नानामत हो-
तगये कोई कर्मको, कोई ब्रह्मको, कोई प्रकृतिपुरुषको, कोई ईश्वरको, कोईका-
ळको, कोई शब्दको, कोईब्रह्मांडमें ज्योतिको, प्रधानमानतभये । औ तिनहूमें
एकएक मतनमें अनेक मतहोतभये औमुसलमानहूके मजहबमें तिहत्तर फिरकें
होत भये एकमें तो मुक्ति होतीहै औरनमें नहीं होती । सो जो जैने फिरकेमें

रमैनी । (७१)

परैहै सोताहीको मुक्तिवाछा मानैहै सो या एक सिद्धांत ब्रह्माके पुत्र वेदन तें
पूछयो वेदब्रह्माते पूछयो तबब्रह्मै को भ्रम भयो तब आकाशवाणी सुनि के सं-
भ्रमपूर्वक सबको शेष के पास पठयो सो शेषजी जौन वेदको तात्पर्य्य सिद्धांत
सबको समुझायोहै सो आदिमंगलमें लिखि आयेहैं औमेरे बनायेरामायणके अंत-
हूमैं लिख्योहै सो या हेतुते कबीरजी कहैहैं कि अगुवा जेब्रह्मा तिनहीको
भ्रमभयो है ॥ १ ॥
पियअनतै धनअनतैरहई । चौपरिकामरिमाथेगहई ॥ २ ॥
पियतो साहबहै औपियके मिलनवारो जोजीवनको ज्ञान सोई धनहै सों
दोउ अनतही रहैहैं कोई बिरले संत पावैहैं । चौपरि जो चारों वेद तिनकी का-
मरि ऐसी भारी शीशपर धरे अपने अपने मनको अर्थ करैहैं वेदको सिद्धांत
नहीं पावैहैं । अथवा चौपरि जो चारो खानिकेजीव ते कर्मरूप जोहै कामरि
ताको कांधैपैधरेहैं ॥ २ ॥
साखी ॥ फुलवाभार न लै सकै, कहै सखीसोंरोय ॥
ज्योंज्योंभीजैकामरी, त्योंत्यों भारीहोय ॥ ३ ॥
जीवजेहैं ते अल्प हैं कर्मकांडरूप जोफूल ताही को भार नहीं सहिसकै अ-
र्थात् सोई नहीं समुझिपारै ब्रह्मविचार कैसे समुझिपरे सो वेदरूप कामरि कांधे-
धरे जब ब्रह्मविचार करनलगे निषेध करतकरत तब विचारमें ब्रह्म न आयो
तबसखी जे जीवहैं तिनते रोइकै कहतेंहैं नेति नेति यतनै नहीं है अबै और क-
छुहै नहीं समुझिपारै यही रोइबोहै सो सो गुरुवालोगहैं तिनसे पूछयो कि, जो-
तुमने बतायोकि, ब्रह्महै सो हमको समझ न परी तब उन गुरुवालोगन ज्यों
ज्यों वेदरूप कामरीभीजैहै कहे विचारत जाइहैं त्यों त्यों भारीहोतजायहै ।
सो कामरीमें दोय अर्थ दोयहै एक कर्मविचाररूपहै एक ब्रह्मविचाररूपहै सो
दोनोंको पारनाही पावैहैं ज्यों ज्यों विचारत जाई है त्यों त्यों कठिनई होत जाइहै
अर्थात् गहिरो अर्थ होतजायहै सो कैसे समुझिपरे वातो वेदार्थमें विचार करै है
ब्रह्मरूप कामरी सो तो धोखाब्रह्म कुछ वस्तुही नहीं है ॥ ३ ॥
इति पंद्रहवींरमैनीसमाप्तम् ।

( ७२ ) बीजक कबीरदास ।
अथ सोरहवींरमैनी ।
चोपाई ।
चलतचलतअतिचरणपिराने।हारिपरेतहँअतिखिसिआने १
गणगन्धर्वमुनिअंतनपाया । हारिअलोपजगधंधेलाया २
गहनी वंधन बांध न सूझा।थाकि परे तब कछू न बूझा ॥३॥
भूलिपरे जिय अधिक डेराई।रजनी अंधकूप है जाई ॥ ४ ॥
मायामोह उहां भरि भूरी। दादुर दामिनि पवनहु पूरी ॥५॥
बरसै तपै अखण्डित धारा।रैनिभयावनि कछुन अहारा॥६॥
साखी ॥ सबैलोग जहँडाइया, औ अंधा सबै भुलान ॥
कहाकोइ नहिं मानही, सब एकैमाहँ समान ॥ ७ ॥
चलतचलतअतिचरणपिराने।हारिपरेतहँ अतिखिसियाने १
नाना मतमें लगे जीव तिनकेचरण ब्रह्मके खोजहीमें पिरान लगे अर्थात
थकिआये मतिनहीं पहुंचै एकहू शास्त्रके बिचारके पार न गये तामें प्रमाण ॥
( इन्द्रादयोपियस्यांतंनययुः शब्दवारिधेः । प्रक्रियांतस्यकृत्स्नस्यक्षमोवक्तुंनरः
कथम् ) ॥ तब खिसि आइकै यह कहते ( भये अतिरेसयान पाठ होय तौ अर्थ
कि बड़ेसयानो रहे तेऊ हारिगे ) ॥ १ ॥
गणगंधर्वमुनिअंतनपाया। हरिअलोपजगधंधेलाया ॥२॥
जौने ब्रह्मको अंतगन्धर्व औ मुनिनके गण नहीं पायो ताको हमकैसे जानि-
सकैं। जो ब्रह्मको साकारकहैं तौमध्यम प्रमाणमें आयजाय है, अनित्य
होयहै। औ जो ब्रह्मको निराकारकहै है तौजगत्की कर्तृत्व कैसे होयगो यही
संदेह मेरे सिद्धांत न भयो । कबीरजी कहैं कि, कैसे होयगी सन्देहमें परे
जैसे हरि हैं तैसे बिनासद्गुरुके बताये तोजानतही नहीं है, यहिते हरि अलोप

रमैनी । ( ७३ )
कहे हरि अमकट भये तिनके बिना जाने जगत्के धन्धेमें जीव सब अपनो
मन लगायराख्यो ॥ २ ॥
गहनी बंधन बांधनसूझा । थाकिपरेतबकछूनबूझा ॥ ३ ॥
गहनी बंधन जो मायासबलित ब्रह्म जौन बांधिकै संसारमें डारि देनवारों
ऐसो जो ब्रह्म ताको बांधजीवनको न सूझिपरचो कौन बांध कि जो कोई
मोहीमेंलगैहै तौमैं बांधिकै संसारमें डारिदेउँ हैं या मायासबलित ब्रह्मको
बांध न सूझि परचो जों कहो काहेते बांधबांध्यो है तो जगत्की उत्पत्ति वही
ब्रह्मते होय है वा ब्रह्म जगत्को रहिबोई चहैहै याही ते जो कोई वामें लगै है
ताको साहबको ज्ञान भुलायकै संसारहीमें राखैहै सो कबीरजी कहैं हैं कि
जब वही संसार में थकिपरे तब कछु न बूझत भये अर्थात् अनेक मतनकों
बिचारैहै पै सिद्धांत न पावतभये साहबको ज्ञान भूलिगये ॥ ३ ॥
भूलिपरे तब अधिक डेराइ ।

( ७४ ) बीजक कबीरदास ।
देख्यो तबतक तो उजियारी जब ज्योतिमें लीनह्वैगयो तब सुषुप्ति ऐसेमें
पर्यो रह्यो यही भयावनि रैनिहै भयावनिको हेतु यह है कि प्राणके उतरिबेकी
अवधि बनीहै ॥ ४ । ५ ॥ ६ ॥
साखी ॥ सभैलोगजहँडाइया, औ अन्धासभैभुलान ॥
कहाकोइनहिमानही, सबएकैमाहँसमान ॥ ७ ॥
और जे मायाते सभयरहे डेराते रहे ते लोग जहँडाइया कहे बहेकिकै औ-
रई और मतनमें लगिगये औ जेअज्ञान आंधेररहें ते संसारहीमें परे संसार
छूटिबेको उपौवैना किये भूलिही गये सो कबीरजी कहैंहैं कि मेरो कहा कोई
नहीं मानैहै सब जे जीव हैं ते एक जो मायाब्रह्म ताहीमें सब समाते भये
इत्यर्थ औ साहबको बिनाजाने ब्रह्महूमें लीनहै संसारहीमें आवैहै वाको प्रमाण
पीछे लिखिआये हैं ॥ ७ ॥
इति सोलहवीं रमैनी समाप्तम् ।
अथ सत्रहवीं रमैनी ।
चौपाई ।
जसजिवआपिमिलैअसकोई। बहुतधर्मसुखहृदयाहोई ॥१॥
जासों बातरामकी कही । प्रीति न काहूसोंनिर्वही ॥ २ ॥
एकैभाव सकलजगदेखी । बाहेरपरैसोहोयविवेकी ॥ ३ ॥
विषयमोहकेफंदछोड़ाई । जहांजायतहँकाटुकसाई ॥ ४ ॥
आय कसाई छूरी हाथा । कैसहु आवै काटौंमाथा ॥ ५ ॥
मानुष बड़े बड़े ह्वैआये । एकै पण्डित सबै पढ़ाये ॥ ६ ॥
पढ़नापढ़हुधरहुजिनगोई । नहिंतोनिश्चयजाहुविगोई॥७॥
साखी ॥ सुमिरन करहु सुरामको, औ छांड़हु दुखकी आस॥
तरऊपर धरि चापिहैं जसकोल्हूकोटिपचास ॥८॥

रमैनी । ( ७५ )
जसजिवआपुमिलैअसकोई । वहुतधर्मसुखहृदयाहोई॥१॥
जासोंबात रामकीकही । प्रीति न काहूसों निर्वही ॥ २ ॥
जैसो आपु होई तैसो जबताको मिलै तबहीं धर्मबढै है औ हृदयमें बड़ो
सुखहोयहै तामें प्रमाण गोसाईंजीको ॥ दोहा ॥ इष्टमिलै अरु मन मिलै, मिलै
भजनरसरीति ॥ तुलसिदास तासों मिलै, हठिकै उपजै प्रीति १ सो औरी-
भांति सुखनहींहोयहै १ काहे ते कि जासों कहे जौने जीवनसों रामकी बात मैं
कहौं हौं कि तैं रामचन्द्रकोहै तिनको अपनो साहब मानु नाना ईश्वर जो तैंने
माने हैं सो येसब मायाके जालमें परेंहैं तोको कहा उबारेंगे सो कबीरजी कहैंहैं
कि या मेरी बातपै काहू जीवनकी प्रीति न निबहतभई अर्थात् जो मेरीबात
प्रीतिते सुनै साहब को जानै जपने अपने मतमें आरूढ़है वादसोकरैहै वस्तुनहीं
ग्रहणकरै है ॥ २ ॥
एकैभाव सकलजगदेखी । बाहेरपरै सोहोय विवेकी ॥ ३ ॥
विषयमोहकेफंदछोड़ाई । जहां जाय तहँकाटकसाई॥ ४ ॥
एकैभाव सकल जगदेखी कहे जे एक ब्रह्मभाव जगत्को देखै हैं तेहिते बा-
हेर अपनेको दासमानि सब में चिद्रूपको जो जानै है । सोई विवेकी होयहैं
सो ऐसे विवेकिकनके पासतो नहीं जायहै २ नाना विषयके मोहके फंद छोड़ायकै
अर्थात् संसारते वैराग्य करिकै अधिकारिह्वैकै जहांजहांजायहैं तहांतहां कसाई जे
गुरुवा लोग ते गलाकोटैहैं अर्थात् साहबको ज्ञानकाटि धोखा ब्रह्ममें लगाय देयँ
हैं । सो याको गलाकाट्यो गलाकाटे फेरिजन्महोयहै याते गुरुवालोगनको कसाई
कह्यो । ऐसे याहूको जनन मरण होय है । ब्यंग्य यहहै कि जे जीव साहब
को त्यागि और औरमें लगे हैं ते पशुहैं उनको ऐसही गलाकाट्यो जायहै ॥४ ॥
कसाई तो शरीरको गलाकाटैहैं और—
आय कसाई छूरी हाथा । कैसेहु आवै काटों माथा ॥ ५ ॥
१ स्वार्थी गुरुवालोग जिनको संसारी सुख और क्षणिक मान बड़ाईके अतिरिक्त
सत्यका ज्ञानही नहीं है । २ गुरुवालोगोंके नानाप्रकारसे जीवोंको ठगनेके उपाय ।

( ७६ ) बीजक कबीरदास ।

मानुष बड़े बड़े ह्वै आये । एकै पण्डित सबै पढ़ाये ॥ ६ ॥
कसाई जे गुरुवालोग तिनकी बनाई पोथी सोई छुरीहाथमें लीन्हे यह
ताके हैं कि कैसेहुकै कौन्यो मतको आवै तौ ठगिकै अपनेमतमें कैकेइँ माथ काटिलै
कहेमूंड़िडारै चेलाकरिलैं । सो साहबको छोड़ाइ औरे आरम लगाबनवारो हैं
सो गुरू कसाई है । यहौ द्वैत ज्ञानवाले गुरुवालोग जीवनको गलाकाटें हैं जो
संसारमें रहतो तो कबहूं दैवयोगते साधु सङ्गमभयो उद्धारहू होतो सो तौने
धोखा ब्रह्ममें लगायदियो जहांते उद्धार नहीं है वहां काहेको कोई साहबको
बतावेंगे ॥ ५ ॥ मनुष्य जे बड़ेबड़े ज्ञानीलोग हैं ते यही पढ़ावतभये कि एक
वही ब्रह्महै जीवनहींहै और कोई या पढ़ाया कि एकजीवही सांच है और सब
असांचहै ॥ ६ ॥
पढ़नापढ़हुधरहुजनिगोई।नाहींतौनिश्चय जाउविगोई ॥७॥
जौनपढ़ना तुम गुरुवालोगनतेपढ़योह

रमैनी। ( ७७ )
अथ अठारहवींरमैनी।
चौपाई।
अद्भुत पंथ वरणिनहिं जाई । भूले रामभूलिदुनियाई॥१॥
जो चेतौतौ चेतुरे भाई । नहिंतो जिय जरि मूलै जाई॥२॥
शब्द न मानै कथै विज्ञाना । तातेयम दीन्ह्यो है थाना॥३॥
संशय साउज बसै शरीरा।ते खायल अनवेधल हीरा॥४॥
साखी ॥ संशय सारज देह में, संगहि खेल जुआरि ॥
ऐसा घायल वापुरा, जीवन मारै झारि ॥ ५ ॥
अद्भुत पंथ वरणि नहिं जाई।भूलेराम भूलिदुनियाई ॥१॥
जो चेतौ तौ चेतुरे भाई । नहिंतो जियजरिमूलैजाई ॥ २॥
अद्भुत पंथ जो ब्रह्म ताको वर्णतकोईने अंतनहींपायो राम जो साहबहैं तिनके
भूलेकहे बिना जानेते सब दुनिया धोखा ब्रह्म मायामेंभूलिगई १ हे भाइउ
चेतौतौ चेतौ नहीं तौ मायाब्रह्मकी आगिमें जरिकै मूलतेजाउगे । यह कबीर-
जीकहै हैं । नहीं तौ यम जीव लैजाइ जो यहपाठहोयतौ यहअर्थहै कि चेतौतौ
चेतौ नहीं तौ यम लैजायके नरकमें डारिदैँगे ॥ २ ॥
शब्द न मानैकथै विज्ञाना । तातेयमदीन्ह्योहैथाना॥ ३ ॥
संशय साउज बसै शरीरा । तेखायलअनवेधलहीरा ॥४॥
बिज्ञानहूको सार जाते सबशब्द निकसे हैं ऐसो जोरामनाम ताको तौ मानै-
नहीं है और और मतिमें लगिकै विज्ञान कथै है ताते यमराज जो जैसो
कर्मकरैहै ताको तैसो नरक स्वर्गकोथान देयहैं ३ संशयरूपी साउज जो
मन सो शरीररूपी बनमें बसिके अनबेधलकहे जाकोयश रामनाममें नहींहै ऐसो
जो हीराजीव ताको खायगयो कौनीरीतिते खायो सो आगे कहै हैं ॥ ४ ॥

( ७८ ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ संशयसाउजदेहमें, संगहिखेलैजुआरि ॥
ऐसाघायलवापुरा, जीवनमारैझारि ॥ ५ ॥
जैसे शिकारी बाघको मारैहै जो बाघ घायलभयो तौ शिकारीको धरिडारैहै
तैसे संशयसाउज जो व्याघ्ररूप मन सो देहरूपी बनमें बसैहै ताके संग जीव
जुआं खेलै है जब मनोबासनाछैकी उपाय कियो तब वही वाको घायल ह्वैबोहै
सो व्याघ्ररूप जो मन है सो घायलह्वैकै बापुरे जे सबजीव हैं तिनको झारदेकै
मारैहै अर्थात् सबको वहीं माया धोखा ब्रह्ममें लगायदियो औ जोयह पाठहोय कि
( ऐसा घायल बापुरा सब जीवनमारै झारि) तो यह अर्थहै कि ऐसा घायलकहे
घाती जो मन सो बापुरेजीवनकोझारादैंकैमारैहै जननमरणदेईहै ॥ ५ ॥
इति अठारहवींरमैनीसमाप्तम् ।
अथ उन्नीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
अनहदअनुभवकीकरिआशा। देखौ यहविपरीततमाशा॥१॥
यहै तमाशा देखहु भाई । जहँहैशून्यतहां चलिजाइ ॥ २ ॥
शून्यहिवांछा शून्यहि गयऊ। हाथाछोड़ि बेहाथाभयऊ॥३॥
संशय साउज सब संसारा । कालअहेरी सांझसकारा ॥४॥
साखी ॥ सुमिरन करहु सो रामको, काल गहैहै केश ॥
नाजानौं कब मारि है, क्याघर क्यापरदेश॥५॥
अनहदअनुभवकीकरिआशा। देखौयह विपरीततमाशा १
अनहद शब्द सुनतसुनत जौने ब्रह्मको अनुभव होईहै ताको तू विचारैहै
कि ब्रह्म मैंहीहौं या नहीं जानैहै कि अनहद मेरे शरीरहीकोहै वह ब्रह्म मेरही
अनुभवहै यह बड़ो तमाशाहैताही की आशाकरै है यह बड़ी बिपरीत है ॥ १ ॥

रमैनी। (७९)
यहैतमाशादेखहुभाई । जहँहैशून्यतहांचलिजाइ ॥ २ ॥
शून्यहिवांछाशून्यहिगयऊ । हाथाछोड़िवेहाथाभयऊ ॥ ३ ॥
सो हे भाइयो! हे जीवो ! यह तमाशा तुमहूं अनेकन जन्मते देखतैआयेहौ
परन्तु जहां शून्यहै तहां जाइकै मुक्ति हैवो चाहौहौ तुम या नहीं बिचारौहौ
कि शून्य जो धोखा ब्रह्म तामें जो हम जायँगे तौ हमारी मुक्तिकी बांछहु शून्य
ह्वैजायगी अर्थात् मुक्ति न होयगी सो या बड़ो आश्चर्यहै अपनेते झूठेमें बांधिकै
साहब को हाथ छोड़िकै बेहाथ भयऊ कहे धोखा ब्रह्मके हाथमें ह्वैजाउ हौ
अथवा कबीरजी झूटे जीवनते कहैहैं हे भाइयो ! देखौ तो तमाशा ये जीव
जहां शून्यहै धोखाहै तहां सब चलेजाँयहैं जौने ज्ञानमें साहब भरेपूरे हैं तहां
नहीं जायँहैं २ । ३ ॥
संशयसाउजसबसंसारा । कालअहेरीसांझसकारा ॥ ४ ॥
' संशय कहै मनरूप जो साउज ताहीको सकलकहे सुरति यासंसार है रह्यो
है अर्थात् मनरूप जीव है रह्यो है संकल्प विकल्प सबैकैरहेहैं संशय सब जीव
को लग रही है । सो अहेरी जोकाल शिकारी सो सांझ सकारकहे काहू को
जन्मतमें मारैहै काहू का मध्य अवस्था में और काहूको आयुर्दायके अंतमें
मारैहै ॥ ४ ॥
साखी ॥ सुमिरनकरहुसोरामको, कालगहेहै केश ॥
नाजानौंकबमारिहै, क्याघरक्यापरदेश ॥ ५ ॥
सो कबीरजी कहैहैं कि परमपुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनको सुमिरण करहु
शिकारी जो कालहै सो केश करमें गहेहै या नहीं जानौहौ धौं कब मारै या
घरमें या परदेशमें अर्थात् साहबकेबिना स्मरण घरमेंरहोगे तौ न बचोगे जोँ
बनमें जाउगे तोहू न बचौगे ॥ ५ ॥
इति उन्नीसवींरमैनी समाप्तम् ।

( ८० ) बीजक कबीरदास ।
अथ बीसवीं रमनी ।
चौपाई ।
अबकहुरामनामअविनासी।हरितजिजियराकतहुँनजासी १
जहांजाहु तहँ होहुपतंगा। अवजनिजरहुसमुझिविषसंगा २
रामनामलौलायसोलीन्हा। भृङ्गीकीट समुझि मनदीन्हा ३
भोअतिगरुवा दुखकै भारी। करुजिययतनसोदेखुबिचारी४
मनकीवातहैलहरिबिकारा। त्वहिंनहिं सूझै वार न पारा ५
साखी ॥ इच्छाको भवसागरै, वोहित राम अधार ॥
कहैकबिरहरिशरणगहु, गोवच्छखुरविस्तार ॥६॥
अबकहुरामनामअविनासी।हरितजिजियराकतहुंनजासी १
अविनाशी जो रामनाम ताको अबहूं कहु । हरिकहे भक्तन के आरति हार-
णहारे जे साहब हैं तिनको छोड़ि हे जीव औरमतनमें कतहुंन जा अर्थातचित-
चित्ते विग्रहकरि सर्वत्रसाहिबैकोदेखु ॥ १ ॥
जहांजाहुतहँहोहुपतंगा । अवजनिजरहुसमुझिविषसंगा २
जौनेन मतमें जाहुहौ तहां पतंगहीसे जरिजाउहौ। सो ते गुरुवन को संगजो
बिषाग्नि ताको समुझि अबजनि जरहु अर्थात् जो इनको संगकरहुगे तौ मन इन्द्रिया-
दिकन को बिषय जो सिद्धांत कीन्हेहै ताही में तुम्हहूँको लगाइ देयँगे तौ
संसारही में परेरहोगे ताते इनको संगत्यागि गमनाम जपौ जो कहौ कौनीरीति-
ते जपै रामनामतौ मन वचनके पेरैहै सो आगे कहैंहैं ॥ २ ॥
रामनामलौलायसोलीन्हा । भृंगीकीटसमुझि मनदीन्हा ३
रामनाममें सो लौ लगाय लीन्हेहै कौनजौन भृङ्गी औ कीट की ऐसीगति
समुझिकै अपने मनदीन्हेहै अर्थात् जैसे कीटभृङ्गी को देखत देखत वाको शब्द

रमैनी । (८१)
सुनत सुनत वाको डेरात डेरात तदाकारहै भृङ्गीहीरूप ह्वै जाय है तैसे रामनाम
जपतजाइहै, वाको सुनतजाइहै, जगत्मुख अर्थते डेरातजायहै; औ साहबमुख
अर्थमें साहबकी रूप औ अपनो हंसस्वरूप बिचारत निज हंसस्वरूप में तदाकार
ह्वैजायहै, मनादिक मिंटिजायहै शुद्ध रहिजाय है सो अपनेरूप पायजायहै । तब
मन वचनके परे जो रामनाम सो आपनेते अस्फूर्त्तिहोइ है तामें लौलगायकै
जैसे कीटभृङ्गी बनिकै औरे कीटको भृङ्गी बनावैहै तैसे यहौ जीव उपदेश करिकै
औरेहूको हंसरूप बनावै है । सो जो भृङ्गीको शब्द कीट न ग्रहणकरै तौ कीट-
ही रहिजाय ऐसे जो रामनामको जीव ना ग्रहणकरै तौ असारही रहिजायहै
तामें प्रमाण अनुरागसागरको॥ ( ज्यों भृङ्गीगै कीट के पासा । कीटहिगहि गुरग
मि परगासा ॥ बिरला कीट होय सुखदाई । प्रथम अवाज गहै चितलाई॥ कोइ
दूजे कोई तीजे मांनै । तन मन रहित शब्दहित जानै ॥ तबलगै भृङ्गी निजगे-
हा । स्वाती दैकर निज समदेहा ) ॥ ३ ॥
भोअतिगरुवादुखकैभारी । करुजियतनजोदेखुविचारी४
मनकीबातहैलहरिविकारा। त्वहिंनहिंसूर्झैवारनपारा ॥ ५॥
यह संसार भारी दुःखक.रिकै अति गरुवा बोझाहै जीव तू बिचारि देखु जौ
तोको बोझालगै तौ रामनामको यतन करु ॥४॥ मनकी बातकहै मनते गुरुवन
को धोखा ब्रह्म तेहिते उठी जो काररूप लहरि माया ताको कौनो मन कहिकै
तोको वारपार नहीं सूझै है ॥ ५ ॥
साखी ॥ इच्छाकेभवसागरै, वोहितरामअधार ॥
कहैकबीरहरिशरणगहु, गोबछखुरविस्तार ॥६॥
यह जो समष्टि जीवको इच्छारूप भवसागर तामें वोहित जो नौका रामना-
म सोई आधार है और नहीं है सो कबीरजी कहैं हैं हरि जे साहेबहैं तिनकी
शरणगहु यह भवसागर गऊके बछवाके खुरके सम उतरि जायगो यामें
संदेह नहीं है ॥ ६ ॥
इति बीसवीं रमैनी समाप्त ।
६

( ८२ ) बीजक कबीरदास ।
अथ इक्कीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
बहुतदुखै है दुखकी खानी । तबवचिहौजवरामहिजानी १
रामहि जानियुक्ति जोचलई । युक्तिहिते फंदा नहिं परई २
युक्तिहि युक्ति चलत संसारा । निश्चयकहा न मानुहमारा ३
कनक कामिनी घोरपटोरा । संपत्ति बहुत रहे दिनथोरा ४
थोरेहि संपतिगो बौराई । धरमरायकी खबरि न पाई ५
देखित्रासमुखगोकुम्हिलाई । अमृत धोखे गो विष खाई ६
साखी ॥ मैं सिरजों मैं मारहूँ, मैं जारों मैं खाउँ ॥
जलथलमैंहींरमरह्यों, मोरनिरंजननाउँ ॥ ७ ॥
बहुतदुखै हैदुखकीखानी । तबबचिहौजवरामहिजानी ॥१॥
रामहिजानियुक्तिजोचलई । युक्तिहितेफंदानहिपरई ॥ २ ॥
युक्तिहियुक्तिचलतसंसारा । निश्चयकहानमानुहमारा॥३॥
यह दुःखकी खानि जो संसारसो बहुतदुःखैहै अर्थात् बहुतदुःख देइहै तुम तबहीं
यातेबचोगे जब सबकेमालिक रक्षक जे श्रीरामचन्द्रतिनकोजानौगे आनउपाय न
बचौगे ॥१॥ काहेते जे श्रीरामचंद्र को जानिकै युक्ति सहित चलैहै तेई वही यु-
क्तिहीते संसारके फंदामें नहीं परैहैं सो कबीरजी कहैहैं सो युक्ति आगे लिखैंगे॥२॥
यासंसार केवल अपनी अपनी युक्तिहीते चलै है कबीरजी कहैहैं मैं जो निश्चय
बात कहौहौं कि, रामनामहीते तेरो उद्धार होयगो याकी युक्ति कोई नहीं मानैहै
अपनेही मनकी युक्ति चलैहै ॥ ३ ॥
कनककामिनी घोरपटोरा । संपतिबहुत रहेदिनथोरा ॥४॥
थोरेहि संपति गो बौराई । धर्मराजकी खबरि न पाई ॥ ५ ॥

कनक जेहै कामिनी जेहै घोड़े जैहैं हाथी जैहैं पटंबर जैहैं ये संपति तो
बहुतहै परंतु इनके भोग करिबेको दिनतो थोरही है अर्थात् आयुर्दाय थोरी है
सोतौ भोगमें बितावै है साहबको कब जानैगो ॥ ४ ॥ सो तै तो थोगी
संपत्तिमें बौराय गयो धर्मराज की खबरि तै नहीं पाई कि, जब मोको ६
जाइँगे तब सारी संपत्ति दियई परीरहि जायगी तब कौन भोगकरैगो
बिचारि साहब को जानो ॥ ५ ॥
देखित्रासमुखगोकुम्हिलाई । अमृतधोखेगोबिषखाई ॥६॥
औ दैवयोगजो कदाचित् तुम्हे धर्मराजको त्रासदेखिकै मुख जब कुम्हिलां-
यगयो कहे संसारते बैराग्यभई तब गुरुवालोगनके निकटजाइ अपनो स्वरूप
समुझौ कि, मैं अमृतहौं मन मायादिक ते भिन्नहौं सो बाततो तू सांचिबिचारी
ऐसहीहै परंतु भगवत् अंशत्व तेरे स्वरूपमें है सो गुरुवालोग नहीं बतायो और-
हीमें लगाय दियो सो अपनो स्वरूप समुझबो जो अमृत ताही के धोखे ते
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( ८४ ) बीजक कबीरदास ।
धंधा बँधा कीन्ह व्यवहारा । कर्म विवर्जित बसै निनारा ॥३॥
षटआश्रमषटदरशनकीन्हा । षटरसवस्तुखोटसबचीन्हा ॥४॥
चारि वृक्ष छाशाख बखानै । विद्याअगणितगनै न जानै॥५॥
औरौ आगम करै विचारा। तेहिनहिंसूकै वार न पारा ॥६॥
जप तीरथ व्रत पूजे भूता । दान पुण्य औ किये बहूता॥७॥
साखी ॥ मंदिर तो है नेहको,मति कोइ पैठे धाइ ॥
जोकोइपैठे धाइकै, बिन शिर सेंतीजाइ ॥ ८ ॥
अलखनिरंजनलखैनकोई । जेहिकेबँधे बँधासवकोई ॥ १ ॥
जेहिझूठो सो बँधो अयाना । झूठीवातसांचकैमाना ॥ २ ॥
धंधाबँधाकीन्ह व्यवहारा । कर्मविवर्जितबसैनिनारा ॥ ३ ॥
कबीरजी कहैहैं कि, हे जीव! तूतो अपनेको निरंजन मान्यो सो निरंजन तों
अलखहै वाको कोईनहीं लखैहै जाके बँधतेकहे मायामें सब कोई बँधे हैं ॥ १ ॥
हे अजानौ ! जौने झूठे सो तुम बँधे हौ सो झूठही है तुम सांच मानौहौ सो न
मानौ ॥ २ ॥ धन्धा जो साहबकीसेवा ताको बँधाकहे बांधनवारे तौनेको व्यव-
हार तुम कीन अर्थात् व्यवहार मानि कर्मते वर्जित ब्रह्म सबते
न्यारही रहै है या परमार्थ तुमलोग कहौहौ औ वाहीमें आरूढ़ होतहौ साह-
बको नहीं जानौहौ ॥ ३ ॥
षटआश्रमषटदरशनकीन्हा । षटरसवस्तुखोटसबचीन्हा ॥४॥
चारिवृक्षछाशाखबखानै । विद्याअगणितगनैनजानै ॥ ५ ॥
षटरसनको खोटमानि त्यागन करिकै औ षटआश्रम करिकै षट दर्शन
करिकै वही धोखा ब्रह्मही को सिद्धांत मानते भये ॥ ४ ॥ पुनि चारि वेद
छवोशास्त्र अगणित विद्या वाच्यार्थ करिकै धोखा ब्रह्मको कहैहैं ताको तो तुम
ग्रहणकियो तात्पर्य वृत्ति ते जो साहबको कहैहै सो तुम न जानत भये ॥ ५ ॥

रमैनी । ( ८५ )
औरो आगम करेविचारा । त्यहिनहिंसूझैवारनपारा॥ ६ ॥
जप तीरथ ब्रत पूजेभूता । दान पुण्य औ कियेबहूता ॥ ७ ॥
अरु औरौ आगम जेहैं ज्योतिष यंत्र मंत्र आदिदैकै तेऊ तात्पर्य वृत्तितें
जौने साहबको कहैहैं ताको वारपार तो तुमको न सूझिपर्यो वाच्यार्थ प्रतिपाद्य
जो धोखा ब्रह्म और और देवता ताही में लागत भये॥६॥सो यहिप्रकार नाना
मतन करिकै मानते भये कोई नाना देवतन के जपकिये कोई तीर्थ किये कोई
ब्रत किये कोई भूतनकी पूजाकिये कोई दानकिये कोई पुण्य जो यज्ञादिक कर्म
ते किये ॥ ७ ॥
साखी ॥ मंदिरतोहै नेहको, मतिकोइ पैठेधाई ॥
जोकोइपैठेधाइके, बिनुशिरसेंती जाई ॥ ८ ॥
सो यह सब मतमा एक नानोदेवता धोखा ब्रह्म इनमें जो प्रीति है सो
नेहको मंदिरहै तामें तू धायकै मतिपैठै जो इनमें धायकै पैठैगो तौ बिनु
शिरकहे सबकेशिरे जे साहब तिनके बिना सेंतिही जाईगो कछुहाथ न लगैगो
तेरेसाधन मुक्तिदेनवाले न होवेंगे संसारही देनवाले होइँगे अथवा तुम्हारोमाथा
काटो जायगो वृथा मारेजाउगे ॥ ८ ॥
इति बाईसवीं रमैनी समाप्त ।
अथ तेईसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
अल्पसौख्यदुखआदिहुअंता । मन भुलानमैगर मैमंता॥१॥
सुख विसराय मुक्तिकहँपावै। परिहरिसांचझूंठनिजधावै॥२॥
अनल ज्योति डाहै यकसंगा।नयन नेह जसजरै पतंगा॥३॥
करु बिचारज्यहिसबदुखजाई।परिहरिझूठा केरि सगाई॥४॥
लालच लागे जन्म सिराई।जरामरणनियरायलआई॥५॥