कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । (७१)
परैहै सोताहीको मुक्तिवाछा मानैहै सो या एक सिद्धांत ब्रह्माके पुत्र वेदन तें
पूछयो वेदब्रह्माते पूछयो तबब्रह्मै को भ्रम भयो तब आकाशवाणी सुनि के सं-
भ्रमपूर्वक सबको शेष के पास पठयो सो शेषजी जौन वेदको तात्पर्य्य सिद्धांत
सबको समुझायोहै सो आदिमंगलमें लिखि आयेहैं औमेरे बनायेरामायणके अंत-
हूमैं लिख्योहै सो या हेतुते कबीरजी कहैहैं कि अगुवा जेब्रह्मा तिनहीको
भ्रमभयो है ॥ १ ॥
पियअनतै धनअनतैरहई । चौपरिकामरिमाथेगहई ॥ २ ॥
पियतो साहबहै औपियके मिलनवारो जोजीवनको ज्ञान सोई धनहै सों
दोउ अनतही रहैहैं कोई बिरले संत पावैहैं । चौपरि जो चारों वेद तिनकी का-
मरि ऐसी भारी शीशपर धरे अपने अपने मनको अर्थ करैहैं वेदको सिद्धांत
नहीं पावैहैं । अथवा चौपरि जो चारो खानिकेजीव ते कर्मरूप जोहै कामरि
ताको कांधैपैधरेहैं ॥ २ ॥
साखी ॥ फुलवाभार न लै सकै, कहै सखीसोंरोय ॥
ज्योंज्योंभीजैकामरी, त्योंत्यों भारीहोय ॥ ३ ॥
जीवजेहैं ते अल्प हैं कर्मकांडरूप जोफूल ताही को भार नहीं सहिसकै अ-
र्थात् सोई नहीं समुझिपारै ब्रह्मविचार कैसे समुझिपरे सो वेदरूप कामरि कांधे-
धरे जब ब्रह्मविचार करनलगे निषेध करतकरत तब विचारमें ब्रह्म न आयो
तबसखी जे जीवहैं तिनते रोइकै कहतेंहैं नेति नेति यतनै नहीं है अबै और क-
छुहै नहीं समुझिपारै यही रोइबोहै सो सो गुरुवालोगहैं तिनसे पूछयो कि, जो-
तुमने बतायोकि, ब्रह्महै सो हमको समझ न परी तब उन गुरुवालोगन ज्यों
ज्यों वेदरूप कामरीभीजैहै कहे विचारत जाइहैं त्यों त्यों भारीहोतजायहै ।
सो कामरीमें दोय अर्थ दोयहै एक कर्मविचाररूपहै एक ब्रह्मविचाररूपहै सो
दोनोंको पारनाही पावैहैं ज्यों ज्यों विचारत जाई है त्यों त्यों कठिनई होत जाइहै
अर्थात् गहिरो अर्थ होतजायहै सो कैसे समुझिपरे वातो वेदार्थमें विचार करै है
ब्रह्मरूप कामरी सो तो धोखाब्रह्म कुछ वस्तुही नहीं है ॥ ३ ॥
इति पंद्रहवींरमैनीसमाप्तम् ।