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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 123

( ७२ ) बीजक कबीरदास ।
अथ सोरहवींरमैनी ।
चोपाई ।
चलतचलतअतिचरणपिराने।हारिपरेतहँअतिखिसिआने १
गणगन्धर्वमुनिअंतनपाया । हारिअलोपजगधंधेलाया २
गहनी वंधन बांध न सूझा।थाकि परे तब कछू न बूझा ॥३॥
भूलिपरे जिय अधिक डेराई।रजनी अंधकूप है जाई ॥ ४ ॥
मायामोह उहां भरि भूरी। दादुर दामिनि पवनहु पूरी ॥५॥
बरसै तपै अखण्डित धारा।रैनिभयावनि कछुन अहारा॥६॥
साखी ॥ सबैलोग जहँडाइया, औ अंधा सबै भुलान ॥
कहाकोइ नहिं मानही, सब एकैमाहँ समान ॥ ७ ॥
चलतचलतअतिचरणपिराने।हारिपरेतहँ अतिखिसियाने १
नाना मतमें लगे जीव तिनकेचरण ब्रह्मके खोजहीमें पिरान लगे अर्थात
थकिआये मतिनहीं पहुंचै एकहू शास्त्रके बिचारके पार न गये तामें प्रमाण ॥
( इन्द्रादयोपियस्यांतंनययुः शब्दवारिधेः । प्रक्रियांतस्यकृत्स्नस्यक्षमोवक्तुंनरः
कथम् ) ॥ तब खिसि आइकै यह कहते ( भये अतिरेसयान पाठ होय तौ अर्थ
कि बड़ेसयानो रहे तेऊ हारिगे ) ॥ १ ॥
गणगंधर्वमुनिअंतनपाया। हरिअलोपजगधंधेलाया ॥२॥
जौने ब्रह्मको अंतगन्धर्व औ मुनिनके गण नहीं पायो ताको हमकैसे जानि-
सकैं। जो ब्रह्मको साकारकहैं तौमध्यम प्रमाणमें आयजाय है, अनित्य
होयहै। औ जो ब्रह्मको निराकारकहै है तौजगत्की कर्तृत्व कैसे होयगो यही
संदेह मेरे सिद्धांत न भयो । कबीरजी कहैं कि, कैसे होयगी सन्देहमें परे
जैसे हरि हैं तैसे बिनासद्गुरुके बताये तोजानतही नहीं है, यहिते हरि अलोप