कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६६ ) बीजक कबीरदास ।
देखत उतपतिलागु न वारा । एक मरैयककरैबिचारा ॥ १० ॥
हे जीवौ ! तुम या देखतहौ कि जो समाधि उतरी तो मनादिक उत्पन्न होत
बार नहीं लगैहै तौ संसार कबै छूट्यो औ येहूं देखतहौ कि एकै मरैं हैं तिनको
लाय आय गैवगुफा जरिगई औ फिर वही गैवगुफामें प्राण चढ़ाय मुक्तिको बिचा-
रौहौ अर्थात् मुक्ति चाहौहौ सो हे जीवौ तुम सब बिचारौ ! तौ जो समाधि सुख
नित्य हो तो तौ कैसे मिटिजातो ताते नित्य नहीं है ॥ १० ॥
मुयेगयेकी काहु न कही । झूठी आशलागिजगरही ॥ ११ ॥
तुम्हारे गुरुवा लोगमरे मरिकै कहां गये कौनी गतिको प्राप्त भये या निकासकी
बात तो काहू न कह्यो सो तौ तुम सब न बिचारयो धोखा ब्रह्महोवेकी जो झूटी
आशा ताहीमें तुमसब लागिरहेहौ मोको न जानतभये ॥ ११ ॥
साखी ॥ जरतजरतसेवाँचहु, काहे न करहुगोहारि ॥
बिष बिषयाकैखायहु, रातिदिवसमिलि झारि ॥ १२ ॥
प्रथम तो हेजीवौ ! नानायोनि नरकगर्भ बासके जठराग्निमें जरत जरतसे
बचेहु अर्थात् मोसों नानाप्रार्थना करि गर्भबास ते निकसे सो गर्भबास को दुःख
तौ तुमको भूलिगयो । औ जैन मोसों करार कियेरहौ सोऊ भूलिगयो बिषरू-
पा जो बिषयताही को रातिवदिन खायहु अर्थात् झारि बिषयही भोगकीन्हों मेरी
शरण को काहै न गोहरायो । जे मेरी शरणको गोहरावै हैं तेई बचै हैं सो हे
जीवौ ! जब मेरी शरणको गोहरावोगे तबहीं बचोगे मेरी या प्रतिज्ञा है जो कोई
मेरी शरणको गोहरावैहै ताको मैं बचायही लेउहौं । गोहारिको अर्थ यह है कि
कोई हमारी रक्षाकरै सो साहब शरणगयेरक्षा करतही हैं तामें प्रमाण ॥ ( सकृद्दे
वप्रपन्नाय तवास्मीतिच याचते । अभयंसर्वभूतेभ्योददाम्येतद्व्रतमम ) ॥ १ ॥
इतिबाल्मीकीये ॥ १२ ॥
इति तेरहवीं रमैनी समाप्तम् ।
१ नाना प्रकारके कर्म, उपासना और ज्ञान की जौ कल्पना सोई कल्पना विषय ।