कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७० ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ सांचेकोइ न मानई, झूठाके सँगजाय ॥
झूठे झूठा मिलिरहा, अहमक खेहाखाय ॥ १३ ॥
सांचो मैं सांचे तुम जीव यह मततो कोई नहीं मानैहै झूठाजो वहब्रह्मताकें
संगसब जायैहैं अर्थात् वहीको सर्वस्वमानै है सो झूठावह ब्रह्मऔझूंठाज्ञानवाला
जोजीव सोमिलिकै अहमक खेहा खायहै अर्थात् मरयो तब राख खायहै जनम
मरण नहीं छूटै है ॥ १३ ॥
इति चौदहवींरमैनी समाप्तम् ।
अथ पंद्रहवींरमैनी ।
चौपाई ।
उनई बदरिया परिगै सांझा। अगुवा भूले वनखंड मांझा॥१॥
पियनतैधनअनतैरहई । चौपरि कामरि माथे गहई ॥२॥
साखी ॥ फुलवा भार न लैसकै, कहै सखिन सों रोइ ॥
ज्यों ज्यों भीजै कामरी, त्यों त्यों भारी होइ॥३॥
उँनईवदरियापरिगैसाँझा । अगुवाभलेवनखंडमाँझा ॥ १ ॥
भ्रमकी बदरी ओनई परिगै साँझा कहे जगतमें अँधियारी है गई साहबकों
ज्ञानरूपी रबि मूँदिगयो न समुझि परत भयो तब बनखंड जो चारिउ वेद तामें
भगुवा जे ब्रह्मादिक सब मुनि ते भूलिगये । कोई भैरव कोई भवानीको कोई
गणेशको इत्यादि नानादेवतनकी उपासना करतेभये । औशास्त्रहुमें नानामत हो-
तगये कोई कर्मको, कोई ब्रह्मको, कोई प्रकृतिपुरुषको, कोई ईश्वरको, कोईका-
ळको, कोई शब्दको, कोईब्रह्मांडमें ज्योतिको, प्रधानमानतभये । औ तिनहूमें
एकएक मतनमें अनेक मतहोतभये औमुसलमानहूके मजहबमें तिहत्तर फिरकें
होत भये एकमें तो मुक्ति होतीहै औरनमें नहीं होती । सो जो जैने फिरकेमें