कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
( ९८ ) बीजक कबीरदास ।
ज्ञान कहौं सो जब सोऊ न रह्यो तब वह दशामें बिचारिदेखो तुम्हीं रहिजा-
उहौ, तुम्हारोई अनुमान ब्रह्महै, तोते मिथ्याही है । जब तुम्हीं रहि गये तब
तुममें तो माया ब्रह्मते छूटनेकी सामर्थ्य है नहीं जो सामर्थ्यहोती तौ पहिलेही
ते तुमको काहे को बांधिलेती । याते तुम डेराउहौ कि, हमकैसेकै छूटेंगे ।
सो यामाया औ धोखाब्रह्मका डर तुम काहेको मानतेहौ । मैं जो अनिर्वचनी-
यहौं ताके तुम अंशहौ तुम्हूं अनिर्वचनीय हौ नाहक धोखा ब्रह्म औ माया कों
अनुमान कैकै नानादुःख पावतेहौ । तुममाया ब्रह्मको भ्रमत्यागि मेरे अनिर्वच-
नीय नाम में लगिकै मेरे पासआवो मैं रक्षाकरि लेउँगो । यह मालिक जे
श्रीरामचन्द्र हैं ते कहै हैं ॥ ४ ॥
ऊउतंगतुम जातिपतंगा । यमघर किहेहु जीवकै संगा॥५॥
नीमकीटजसनीमपियारा । बिषकोअमृतमानगँवारा ॥६॥
वहजोमाया औ धोखा ब्रह्मअग्निरूपताकी उत्तुंगकहे बड़ीऊंची लपटैंहैं तुम-
जातिकेपतंगहैकै वामेंकाहेजरिजरिमरौहै । सोहेजीव नानाबस्तुनकोसंगकरि
जाहीमेंमनलगायमरचो औ सोई भयो याहीभांतिजनमिकै मरिकै यमकेपासघर-
बनायेहौ अर्थात् या संग का प्रभावहै जो यमके यहां घरबनोयेहैं ५ जैसेनीमके
किरवा को नीमही प्यारलगैहै, जो मिष्टान्नौ पावै तौ न खाय, ऐसे बिषरूप
जो विषय ताको अमृतमानिगँवार जोजीवहैंसो खायहैं ॥ ६ ॥
विषकेसंगकौनगुण होई । किंचितलाभमूलगो खोई॥ ७ ॥
विषअमृतगोएकहिसानी । जिनजानातिनबिषकैमानी॥८॥
सोयाबिषरूपी विषयके संगकौनगुणहै क्षणभरेकोसुखहै औ सबकोमूल जो
मेरोज़्ञानसो नशायगो अनेकजन्म दुःखपावनलग्यो ७ साहब कहै हैं कि और
नाना देवतन को जो नामजपिबो औ तिन्हीं के लोक में जाय सुख पाइबो या
तोबिष है औ मेरे नामको जपिबो मेरे लोकमें जायसुख पाइबो यातो अमृतहै
सो ये दूनौं बिष अमृत एकैमें सानिगो कैसे जैसे साहबको नामलीन्हे मुक्त
हैजायहै साहबके लोकमें जाय सुखपावै है ऐसे औरहूदेवतनके नामलीन्हेसे
रमैनी । (५९)
मुक्त ह्वैजायहै औ तिनके लोकमें जाय सुख पावैहै । वास्तव एकही नाम भेद-
से और और कहैहै या भांतिते जे ज्ञान राखेहैं तिनके ज्ञानको मेरे अनिर्वचनीय
नामरूप धामके जे जनैया हैं तिनके ज्ञानको ते विषयी मानै हैं ॥ ८ ॥
कहाभयेनलसुधवेसूझा । बिनपरचै जगमूढ़ न बूझा ॥९॥
मतिकेहीनकौनगुणकहई । लालचलागेआशारहई॥१०॥
ऐसे बे सूझ जीवजिनको नहीं सूझपरैहै ते कहां शुद्धभये, नहीं भये।मैं जो अनिर्व-
चनीय ताकेपरचै बिना जगमें मूढ़जीवो तुम न बूझत भयो सो ऐसे मतिके हीन जे तुम
तिनके कौनगुण कहैं लालचईमें लागेरहैहैं काहूको द्रव्यकीआशा काहूको
ब्रह्मज्ञानकी आशा काहूको नाना देवतनकी आशा काहूको विषयकी आशा में
फिरैहै सांचजोवेद को अर्थ मैं ताको न जानतभये अर्थात् साहबकहैहै कि मोको
न जानोगे तो कबहीं बचोगे नहीं, तो वेद पुरान कहैहै कि,
सब मरिजाहुगे ॥ ९ ॥ १० ॥
साखी ॥ मुवा अहै मरिजाहुगे, मुयेकी बाजी ढोल ॥
स्वप्नस्नेही जगभया, सहिदानीरहिगाबोल ११॥
साहबकहैहै कि हेजीवौ मुवाजोधोखा ब्रह्म नानादेवतातिनमें जो लागौगे
तोमरिजाहुगे अथात् जनमतैमरत रहौगे यातुम्हारे मुयेकी ढोल जो वेदपुराणहै
सो बाजैहै कहे कहैहैं । तब तुम्हारा इष्टदेवन को स्नेह औ सबसुख जगत्को
स्वप्न ऐसा ह्वैजायगा ये सब मुयेहैं ये वेदपुराण तात्पर्यते डंका दैकेकहैहैं अथवा-
जोगुरुवालोग ब्रह्मको नाना देवतनमें लगावै है सो सबसंसारमें मुये की ढोल बा-
जैहै । मरिजाहुगे जो यामें लगौगे तो तुम्हारी सहिदानी बोलरहिजायगा । बोल
कहाहै जे तुम अपने इष्टदेवनके ग्रन्थबनाय जावगे तेई रहिजायँगे कि फलानेकेबना-
ये ग्रन्थहै कालपाय वोहूं न रहिजायँगे अथवा सहिदानी बोल रहिजायगा कौन
जौन मेरे रामनामको संसारमुख अर्थ करि संसारी भयोहै सोइजगत्की सहिदा-
नी मेरोनाम रहिजायगो ताहीको फेरि संसारमुख अर्थकरि संसारी होउगे जब
नाममें मोको जानोगे तबहीं मुक्त होउगे ॥ ११ ॥
इतिग्यारहवीं रमैनी समाप्तम् ।
( ६० ) बीजक कबीरदास ।
अथ बारहवीं रमैनी ।
चौपाई ।
माटिक कोट पषाणकताला । सोई बनसोई रखवाला १
सो बनदेखत जीवडेराना । ब्राह्मण विष्णुएक करिजाना २
जोरि किसान किसानी करई । उपजै खेत बीज नहिंपरई ३
त्यागि देहु नर झोलिक झेला । बूड़े दोऊ गुरु अरु चेला ४
तीसर बूड़े पारथ भाई । जिन बन दाह्यो दवा लगाई ॥५॥
भूँकि भूँकि कूकुर मरिगयऊ । काज न एकस्यारसौं भयऊ ६
साखी ॥ मूसबिलारी एकसँग, कहु कैसे रहिजाय ।
यक अचरज देखौ संतौ, हस्ती सिंहहिखाय॥७॥
माटिककोटपषाणकताला । सोईबनसोईरखवाला ॥ १ ॥
माटीका कोट यहशरीरहै मनरूप पाषाणका तालौहै कठिनभ्रमजौनेते माया
औ धोखा ब्रह्ममें लग्योहै सोई भ्रमके बनको नानाबाणीमाया ताको रक्षक सोई
भ्रमही है जबभ्रम मिटै तब माया धोखाब्रह्म तबहीमिटै संसारताला खुलै तबमैं
सर्वत्र देखपरों ॥ १ ॥
सोबनदेखतजीवडेराना । ब्राह्मणविष्णुएककरिजाना ॥२॥
तौन जो भ्रमको वनहै संसार नानाशास्त्र तिनके द्वारा देखिके डरानजाय नाना
मतनमें तुम सब नहिंपारपाये कि कौनमतलैकै संसार पारहोई ये शास्त्र एक म-
तनहीं कहैंहैं तब डेराय ब्राह्मण भये ॥ ब्रह्मजानातिब्राह्मणः ॥ सब ब्रह्मको
जानतभयेः वैष्णवजेहैं ते एक व्यापक तुमसब विष्णुही को मानतभये व्याप्य
पदार्थ न मानतभये सो हेजीवो! जो व्याप्य पदार्थ नै होयगो तो व्यापक कामें
होयगो ताते एक मानिबो धोखई है । अथवा ब्राह्मण जेहैं ब्रह्मज्ञानी ते एक
रमैनी । ( ६१ )
ब्रह्महीमाने औ वैष्णव जेहैं विष्णुके दास तौनेके एकै मानतभये कि दास भाव
करत करत जब अंतःकरण शुद्धहोइगो तब अभेदई भावहोइगो आपही विष्णु
मानेगो काहेते कि देव ह्वैकै देवताकी पूजा करिबेको होई है यह शास्त्रमें लिखा
है ताते हम विष्णुही ह्वैजाइँगे तौने दृष्टांत देइहैं कि वहै तौ बनैहै वहै रखवार
तौ कैसे पूरपरै माया ब्रह्म ईश्वर ई सब मनके कल्पित हैं मनै है औ यही म-
नको रक्षक मानै अथवा ब्रह्मज्ञान को रक्षक मानै है सो वही तौ भ्रम है औ
वही को रक्षक मानै है सो कैसे पूरपरैगो ॥ २ ॥
जोरिकिसानकिसानीकरई । उपजैखेतबीजनाहींपरई ॥३॥
जैसे सिगरी सामग्री जोरि किसान किसानी करै है जौनबीजखेतमें बोवैहै
सोई उपजैहै । तैसे हेजीवो तुमसब नानाबाणीको बिस्तार करि नानामतनमें
लाग्यो सोईफल भयो मेरो जो रामनाम बीजै सोतौखेतमें परबई नं कियोमेरो-
ज्ञानफल कहांतहोय तुम्हारे खेतमेंनानामतनको फल संसार उपज्यो ॥ ३ ॥
छांड़िदेहुनरझेलिकझेला । बूड़ेदोऊगुरू अरु चेला ॥ ४ ॥
तीसरबूड़े पार्थ भाई । जिनवन दाह्यो दवालगाई ॥ ५ ॥
सो हे नरौ! झेली का झेला तुमछांड़ि देहु। धोखा ब्रह्ममें लागिकै तुममाया
को झेला चाहौहौ, माया तुम्हींको झेलैहै या नहींजानौहौ कि, धोखा ब्रह्ममाया
सबलितहै ताही मायाकी धारमें गुरु जे तुमको उपदेश किये ते औ तुमदोऊ
बूड़े ४ पृथु बिस्तारे धातुहै अपने ज्ञान दवाग्निको बिस्तार कैकै अपने सेवकन
केजे बनरूप कर्म जारि अपनेलोकनको लैगये ऐसे जे इष्टदेवता जिनको गुरुवा
लोग उपदेश करैहैं सो हे भाई तीसर तेऊ मायाकी धारमें बूड़े काहेते महाप्रल-
यमें वोऊ नहीं रहिजायँगे ॥ ५ ॥
भूंकिभूंकिककूरमरिगयऊ । काजनएकस्यारसोंभयऊ॥६॥
हे नरौ ! जैसे कूकुर शीशाके महलमें अपनारूप देखि भूंकि भूंकि मरिजायहै
तैसे तुम्हारोई अनुभव जो धोखा ब्रह्म तामें लगि भूंकि भूंकिकहे शास्त्रार्थ करिकरि
Here is the complete, line-by-line transcription of the page:
जन्मत मरतरहौहौ अथवा अहंब्रह्म अहंब्रह्म अहमीश्वरः अहंभोगी अहंसिद्धः
अहंबलवान् अहंसुखी इहै भूंकैहै तामें प्रमाण॥ (ईश्वरोऽहमहंभोगी सिद्धोऽहंबल-
वान्सुखी)॥ इत्यादिक स्यार जो बाणी ताते एकौकाज नहींभयो अर्थात् जौनी
बाणीकेदेखाये प्रतिबिम्बदेख्यो अनुभव ब्रह्ममान्यो तौनेकेकाज न भयो जनन
मरण न छूट्यो अथवा हे जीवो ! तुम जे कूकुरहौ ते स्यार शिवा भवानी रुद्राणी
अमरमें लिखैहैं सो हे जीवो ! सोई स्यार रूपजो बाणीहै ताको देखिदेखि भूंकतेहौ
कहे पढ़तेहौ वा स्यार रूपबाणीके धरिबेकोतौ भूंकिभूंकि तुमहीं मरिगये
स्यारते कार्य न भयो अर्थात् स्यारूप जोबाणी सोतुम्हारीधरी न धरिगई वाको
तात्पर्य्यार्थको न जानतभये वृत्तितौनहीं राखौहौ अपने जानपनीको घमण्डराखौ
हौ तातेमायाते न छूटे ॥ ६ ॥
रमैनी । ( ६३ )
आजुकाजाजियकालिहअकाजा।चलेलादिदिग्गंतरराजा॥४॥
सहज विचारत मूल गँवाई । लाभतेहानि होय रे भाई॥५॥
ओछी मती चन्द्रगो अथई । त्रिकुटीसंगमस्वामी वसई॥६॥
तबहींविष्णु कहासमुझाई । मैथुनाष्ट तुमजीतहु जाई ॥७॥
तवसनकादिकतत्वविचारा। ज्योंधनपावहिरंक अपारा ॥८॥
भोमर्याद बहुत सुखलागा । यहिलेखे सबसंशयभागा॥९॥
देखत उत्पति लागु न बारा । एकमरै यककरै विचारा॥१०॥
मुये गये की काहु न कही । झूटी आश लागि जबरही॥११॥
साखी ॥ जरत जरत से बाचहू, काहेन करहु गोहारि ॥
विषविषयौकैखायहु, रातदिवसमिलिझारि॥ १२ ॥
नहिंपरतीतिजोयहि संसारा।द्रव्यकचोटकठिनकोमारा॥१॥
साहब कहैहैं यह तो उपदेश हमकरते हैं तुमसबको परतीति
( ६४ ) बीजक कबीरदास ।
नहींतो शेषहोतहोत सब लुकाय जायहै एक एक में लीनह्वैजायहैं कहीं लोप
है जाय है कहीं अलोप है जायहै निषेध करत करत तुमहीं रहिजाउहै।
कि मैं रहिजाउँहौं तब मैं तुमको हंसरूपदै अपने धामको लैआवो हौं
सो या जगतमरेही शरीरहै या प्रतीतितुमको काहूको न आई द्रव्यही बुद्धि
मानते भये ॥ २ ॥
चलेलोगसब मूलगँवाई । यमकीबाढ़िकाटिनहिंजाई ॥३॥
सबको मूल जो मेरो रामनाम ताको गँवाय कहेभूलिकै हे जीवो! तुम सब ना-
नापन्थमें चलेहौ परन्तु यमकहे दोऊविद्या अविद्यारूप जो घोरनदी तिनकीबा-
ढ़िजोहै धारा सो न काटीजायगी अर्थात् न पैरी जायगी । वाही में बूडिजा-
वोगे । अथवा यम जो है काल रूप ब्रह्म ताकी बाढ़ि जो बाणी जो एकते
अनेक भई है सो हे जीवो तुम्हारी काटी न काटिजायगी जो काटि पाठहोय
तौयह अर्थ है विद्या अविद्याकी दुइ नदी बाढ़ी तुम्हारे हिय में सो तुम्हारी
काटि न काटिजायगी अर्थात् वाहीमें परेरहौगे अथवा चौदहौ जे यमवर्णन
करिआये है तिनकीबाढ़िबढ़ी है सो तुम बिना मेरी कृपा न छूटोगे । सो तुम्हारी
काटी न कटैगी बिनामोकोजाने ॥ ३ ॥
आजुकाजजियकालिहअकाजा । चलेलादिदिग्गंतरराजा४
हेजीवौ ! अनिर्वचनीय जो मेरो नाम ताको जोआजु समुझौ तौ कार्य्य होयगो
तिहारो औ जोकाल्हि कहे शरीर छूटेंमें समुझो चाहौतौ अकाजहै नाजानै कौनी
योनिमें परौ फिरि समुझौ धौं ना समुझौ । सो हे जीवो तुमतो राजा है मन
मायादिक ये तुम्हारे ही बनाये हैं सोतौ तुम भूलिगये । चले लादि कहेविद्या-
अविद्याके जे नानाकर्म तिनको अंगीकार करि अर्थात् वैहै बोझाअपनेमाथे में धरि
दिगंतरमें जाय नानाशरीर धारण करत है सो अबहूं मोको जानि तुम सब
यहदुःख त्यागो यह मायारूप धोखावाले नको उपदेश दियो अब सहजस-
माधिवाले नको कहै हैं ॥ ४ ॥
१ देखौ मंगल में १८ वीं साखीकी टीका ।
रमैनी । ( ६५ )
सहज विचारत मूलगँवाई । लाभतेहानिहोयरेभाई ॥ ५ ॥
सहजकहे सोहंसअहं यह प्रतिश्वास बिचारतबिचारत सबको मूल जोमेरो
नाम ताको गँवाय दियो अर्थात् भुलायदियो सो हे जीवौ ! तुमको तौ धोखा
ब्रह्मकी लाभभई परन्तु यह लाभते मेरे जाननेवाला जो ज्ञान ताकी हे भाइयो !
हानिह्वैगई अर्थात् नहा प्राप्तभई ॥ ५ ॥ अबयोगिनको कहै हैं।
ओछीमती चन्द्रगो अथई । त्रिकुटीसंगमस्वामीबसई॥६॥
तवहाँविष्णुकहासमझाई । मैथुनाष्टतुमजीतहुजाई ॥ ७ ॥
वीर्यकी उलटी गतिकरतकरत ओछीमतिकहे बुद्धयादिकसूक्ष्म है थिरह्वैगई
तब चन्द्ररूप जो वीर्य्य सो अथैगयो अर्थात् उलटी गतिह्वैगई तब दूनौनेत्रकों
उलटिकै ध्यानलगाय प्राणके साथ वीर्य्यको चढ़ाय त्रिकुटीमें जहां इड़ा पिंगला
गंगा यमुना सरस्वतीको सङ्गममें स्वामीबसैहै जहां पहुंचौहौ तब लक्ष्मीनारा-
( ६६ ) बीजक कबीरदास ।
देखत उतपतिलागु न वारा । एक मरैयककरैबिचारा ॥ १० ॥
हे जीवौ ! तुम या देखतहौ कि जो समाधि उतरी तो मनादिक उत्पन्न होत
बार नहीं लगैहै तौ संसार कबै छूट्यो औ येहूं देखतहौ कि एकै मरैं हैं तिनको
लाय आय गैवगुफा जरिगई औ फिर वही गैवगुफामें प्राण चढ़ाय मुक्तिको बिचा-
रौहौ अर्थात् मुक्ति चाहौहौ सो हे जीवौ तुम सब बिचारौ ! तौ जो समाधि सुख
नित्य हो तो तौ कैसे मिटिजातो ताते नित्य नहीं है ॥ १० ॥
मुयेगयेकी काहु न कही । झूठी आशलागिजगरही ॥ ११ ॥
तुम्हारे गुरुवा लोगमरे मरिकै कहां गये कौनी गतिको प्राप्त भये या निकासकी
बात तो काहू न कह्यो सो तौ तुम सब न बिचारयो धोखा ब्रह्महोवेकी जो झूटी
आशा ताहीमें तुमसब लागिरहेहौ मोको न जानतभये ॥ ११ ॥
साखी ॥ जरतजरतसेवाँचहु, काहे न करहुगोहारि ॥
बिष बिषयाकैखायहु, रातिदिवसमिलि झारि ॥ १२ ॥
प्रथम तो हेजीवौ ! नानायोनि नरकगर्भ बासके जठराग्निमें जरत जरतसे
बचेहु अर्थात् मोसों नानाप्रार्थना करि गर्भबास ते निकसे सो गर्भबास को दुःख
तौ तुमको भूलिगयो । औ जैन मोसों करार कियेरहौ सोऊ भूलिगयो बिषरू-
पा जो बिषयताही को रातिवदिन खायहु अर्थात् झारि बिषयही भोगकीन्हों मेरी
शरण को काहै न गोहरायो । जे मेरी शरणको गोहरावै हैं तेई बचै हैं सो हे
जीवौ ! जब मेरी शरणको गोहरावोगे तबहीं बचोगे मेरी या प्रतिज्ञा है जो कोई
मेरी शरणको गोहरावैहै ताको मैं बचायही लेउहौं । गोहारिको अर्थ यह है कि
कोई हमारी रक्षाकरै सो साहब शरणगयेरक्षा करतही हैं तामें प्रमाण ॥ ( सकृद्दे
वप्रपन्नाय तवास्मीतिच याचते । अभयंसर्वभूतेभ्योददाम्येतद्व्रतमम ) ॥ १ ॥
इतिबाल्मीकीये ॥ १२ ॥
इति तेरहवीं रमैनी समाप्तम् ।
१ नाना प्रकारके कर्म, उपासना और ज्ञान की जौ कल्पना सोई कल्पना विषय ।
रमैनी । ( ६७ )
अथ चौदहवींरमैनी ।
गुरुमुख । चौपाई ।
बड़सो पापीआयगुमानी । पाखंडरूपछलोनरजानी ॥ १ ॥
वामनरूप छल्योवलिराजा।ब्राह्मणकीन कौनसोकाजा॥२॥
ब्रह्मणही सबकीन्होंचोरी । ब्राह्मणहीको लागी खोरी ॥ ३ ॥
ब्राह्मण कीन्होग्रंथ पुराना । कैसेहुकैमोहिं मानुषजाना॥४॥
यकसे ब्रह्मै पंथ चलाया । यकसेहंस गोपालहिगाया ॥ ५ ॥
यकसे शंभू पंथ चलाया । यकसे भूतप्रेत मनलाया ॥ ६ ॥
यकसे पूजा जौन विचारा । यकसेनिहुरिनेमाजगुजारा ॥७॥
कोई काहूकोहटा न माना । झूठा खसमकबीरन जाना ८॥
तनमनभाजिरहु मेरे भक्ता । सत्यकबीर सत्यहै वक्ता ॥९॥
आपुहिदेवआपुही पाती । आपुहिकुलआपुहिहैजाती॥१०॥
सर्वभूतसंसार निवासी । आपुहिकुसुमआपुसुखरासी॥११॥
कहतेमोहिंभये युगचारी । काके आगे कहौं पुकारी ॥१२॥
साखी ॥ सांचो कोई न मानई, झूटाके सँगजाय ॥
झूठेझूठा मिलिरहा, अहमक खेहाखाय ॥ १३ ॥
बड़ोसोपापी आयगुमानी । पाखँडरूपछलोनरजानी ॥ १ ॥
वावनरूपछल्योवालिराजा।ब्राह्मणकीनकौनकरकाजा ॥२॥
साहब कहैहैं तै बड़ोपापी है बड़ोगुमानी है काहेते कि मैं येतो समझाऊंहीं तैं
नहीं समझैहै सो मैंजान्यो पाखंडरूप, जो धोखा ब्रह्मताते हेनर ! तुमछलेगये
और जिनको छल्यो तिनको कहैहैं १ वहीमाया सवलित ब्रह्म बामनरूप करिकै
( ६८ ) बीजक कबीरदास ।
बलिराजाको छल्यो है सो या ब्राह्मण जोमाया सबलित ब्रह्म सो कौनको काजकीन्हों
है अर्थात् नहीं कीन्हों है ॥ २ ॥
ब्राह्मणहीसबकीन्होंचोरी।ब्राह्मणहीकोलागीखोरी ॥ ३ ॥
वहीब्रह्म सबकी चोरीकियो है काहेते कि मायातो जड़है यह चैतन्यहै
ब्रह्मही माया सबलितहै मायहूको कर्ताके मेरेसांचेज्ञानको संसारमें शंकादिक
पदार्थ बनाइ चोराइराख्योहै सो जब व्यापकरूप ते सबपदार्थ ब्रह्महीठहरचो
औब्रह्महीके संयोगते मायाकर्ता भई है तब ब्रह्महीको खोरिलगी कि वही
सब करैहै ॥ ३ ॥
ब्रह्महिकीन्हों ग्रंथ पुराना । कैसेहुकैमोहिंमानुषजाना ॥ ४ ॥
वहीमाया सबलित जो ब्रह्महै ताहीते सब वेदपुराण निकसेहैं ताहीते ना-
नामतभये कोई निराकार ब्रह्मही कोई चतुर्भुज कोई अष्टभुज इत्यादि मानत-
भये । तुम सब बसहु जो निर्गुण के सगुणपरे वेदपुराणको तात्पर्यताको जा-
निकै ऐसो मेरो मनुष्य रूप कैसेहुकैकह जसतसकै कोई बिरलेसंत जानै हैं
और नहीं जानै हैं अथवा मोको सब बातके जनैया श्रीरामचन्द्रको सांच मनु-
ष्यरूप है तामें प्रमाण ॥ ( आत्मानंमानुषंमन्ये रामंदशरथात्मजम् ) ॥
इति और जे नानापंथ वेदतेनिकसे तिनको आगे कहैं ( दशतिसर्पानि-
तिदशः गरुड़ः सरथोयस्यसः दशरथः विष्णुः सएव आत्मजोयस्यसः
दशरथात्मजः तं ) ॥ ४ ॥
यकसेब्रह्महिपन्थचलाया । यकसेहंसगोपालहिगाया ॥ ५ ॥
यकसे कहे एकजो माया सबलित ब्रह्म ताही को भतिपादन करत ब्रह्मैनां-
ना शास्त्रके नानापंथ चलावतभये । औ यकसे कहै एक जो माया सबलित
ब्रह्मताहीको बिचारकरत हंसजो जीव सो गोपालहि गावतभये अर्थात् गोजो-
इंद्रिताको पालनवारो जो मनताहीको गावतभये अर्थात् मन्मुखी पंथ चलावत्
भये औ ब्रह्माने वेदकह्योहै वेदते सबमत निकसेहैं जीवनको जोजुदेकरि कै
कह्यो सोमेरे सम्मुखको जो अर्थ है ताको छपाय दीन्हों वेद अर्थ नानादेवतन
यज्ञादिमें लगायदीन्हे ॥ ५ ॥
रमैनी । ( ६९ )
यकसे शम्भूपंथचलाया । यकसे भूतप्रेत मनलाया ॥ ६ ॥
यकसेपूजाजौनविचारा । यकसेनिहुरिनेवाजगुजारा ॥७॥
यकसेकहे एकजो माया सबलित ब्रह्माताहीको प्रतिपादन करत वेदको
अर्थ बदलिकै महादेवजीको तामसमत चलावतभये और यकसे कहेएक जो-
माया सबलित ब्रह्माताहीको प्रतिपादनकरत जीवनको मन भूत प्रेतदेव सब
लगायदेतेभये अर्थात् माया में अरुझाय देतेभये ६ यकसे कहे एक जो माया
सबलित ब्रह्म ताके ज्ञानहेतु निहुरिकै मुसलमानलोग नेवाज गुजारतभये ॥७॥
कोउकाहूको हटा न माना । झूठाखसमकबीरनजाना॥८॥
तनमन भजिरहुमेरेभक्ता । सत्य कबीर सत्यहैवक्ता ॥ ९ ॥
कोऊ काहूको हटको न मानतभये झूठाजो धोखा ब्रह्म ताही को दृढ़करि-
कै कायाके बीरजे जीव ते नाना देवतनसोते खसम जानतभये । कोई महीं
ब्रह्महौं या मानतभये । खसम जो परमपुरुष मैंहौंताको तुमसब न जानतभये ८॥
तनमनते मोहींमें लगो तबही तिहारो उबारहोइगो सोहे कबीर जीवो
एकतो तुम सत्यहौ और एक जो तिहारे समुझावन वाला वक्ता मैं सो सत्यहौं
और सबझूठे हैं वही ब्रह्म चारों ओर हैगयो है यह द्वैमत दिखायो तामें प्रमाण
( सत्यमात्मा सत्यजीवो सत्यंभिदः ) ॥ ९ ॥
आपुहिदेवआपुहीपाती । आपुहिकुलआपुहिहैजाती॥१०॥
सर्वभूतसंसारनिवासी । आपुहिखसमआपुसुखरासी॥११॥
कहतेमोहिंभयेयुगचारी । काकेआगेकहौंपुकारी ॥ १२ ॥
औवही माया सबलित ब्रह्म आपुही देवता हैगयौहै आपुही फूलपातीहैं
आपुही पूजा करनवालो है आपहीकुल जातिहै १० सोयाभांतिते वहीब्रह्म सर्व-
भूतमें निवासी हैकै आपुही खसमहै रह्यौहै औ जामें पुरुषके सुखको सांचहै
ऐसी सुखराशी नारीहै रह्यौहै ११ सो यह बात चारों युगमोंको कहतभयो
काके आगे पुकारिकै कहा कोई समुझै या धोखा ब्रह्मको नहीं देखोपरे ॥१२॥
( ७० ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ सांचेकोइ न मानई, झूठाके सँगजाय ॥
झूठे झूठा मिलिरहा, अहमक खेहाखाय ॥ १३ ॥
सांचो मैं सांचे तुम जीव यह मततो कोई नहीं मानैहै झूठाजो वहब्रह्मताकें
संगसब जायैहैं अर्थात् वहीको सर्वस्वमानै है सो झूठावह ब्रह्मऔझूंठाज्ञानवाला
जोजीव सोमिलिकै अहमक खेहा खायहै अर्थात् मरयो तब राख खायहै जनम
मरण नहीं छूटै है ॥ १३ ॥
इति चौदहवींरमैनी समाप्तम् ।
अथ पंद्रहवींरमैनी ।
चौपाई ।
उनई बदरिया परिगै सांझा। अगुवा भूले वनखंड मांझा॥१॥
पियनतैधनअनतैरहई । चौपरि कामरि माथे गहई ॥२॥
साखी ॥ फुलवा भार न लैसकै, कहै सखिन सों रोइ ॥
ज्यों ज्यों भीजै कामरी, त्यों त्यों भारी होइ॥३॥
उँनईवदरियापरिगैसाँझा । अगुवाभलेवनखंडमाँझा ॥ १ ॥
भ्रमकी बदरी ओनई परिगै साँझा कहे जगतमें अँधियारी है गई साहबकों
ज्ञानरूपी रबि मूँदिगयो न समुझि परत भयो तब बनखंड जो चारिउ वेद तामें
भगुवा जे ब्रह्मादिक सब मुनि ते भूलिगये । कोई भैरव कोई भवानीको कोई
गणेशको इत्यादि नानादेवतनकी उपासना करतेभये । औशास्त्रहुमें नानामत हो-
तगये कोई कर्मको, कोई ब्रह्मको, कोई प्रकृतिपुरुषको, कोई ईश्वरको, कोईका-
ळको, कोई शब्दको, कोईब्रह्मांडमें ज्योतिको, प्रधानमानतभये । औ तिनहूमें
एकएक मतनमें अनेक मतहोतभये औमुसलमानहूके मजहबमें तिहत्तर फिरकें
होत भये एकमें तो मुक्ति होतीहै औरनमें नहीं होती । सो जो जैने फिरकेमें
रमैनी । (७१)
परैहै सोताहीको मुक्तिवाछा मानैहै सो या एक सिद्धांत ब्रह्माके पुत्र वेदन तें
पूछयो वेदब्रह्माते पूछयो तबब्रह्मै को भ्रम भयो तब आकाशवाणी सुनि के सं-
भ्रमपूर्वक सबको शेष के पास पठयो सो शेषजी जौन वेदको तात्पर्य्य सिद्धांत
सबको समुझायोहै सो आदिमंगलमें लिखि आयेहैं औमेरे बनायेरामायणके अंत-
हूमैं लिख्योहै सो या हेतुते कबीरजी कहैहैं कि अगुवा जेब्रह्मा तिनहीको
भ्रमभयो है ॥ १ ॥
पियअनतै धनअनतैरहई । चौपरिकामरिमाथेगहई ॥ २ ॥
पियतो साहबहै औपियके मिलनवारो जोजीवनको ज्ञान सोई धनहै सों
दोउ अनतही रहैहैं कोई बिरले संत पावैहैं । चौपरि जो चारों वेद तिनकी का-
मरि ऐसी भारी शीशपर धरे अपने अपने मनको अर्थ करैहैं वेदको सिद्धांत
नहीं पावैहैं । अथवा चौपरि जो चारो खानिकेजीव ते कर्मरूप जोहै कामरि
ताको कांधैपैधरेहैं ॥ २ ॥
साखी ॥ फुलवाभार न लै सकै, कहै सखीसोंरोय ॥
ज्योंज्योंभीजैकामरी, त्योंत्यों भारीहोय ॥ ३ ॥
जीवजेहैं ते अल्प हैं कर्मकांडरूप जोफूल ताही को भार नहीं सहिसकै अ-
र्थात् सोई नहीं समुझिपारै ब्रह्मविचार कैसे समुझिपरे सो वेदरूप कामरि कांधे-
धरे जब ब्रह्मविचार करनलगे निषेध करतकरत तब विचारमें ब्रह्म न आयो
तबसखी जे जीवहैं तिनते रोइकै कहतेंहैं नेति नेति यतनै नहीं है अबै और क-
छुहै नहीं समुझिपारै यही रोइबोहै सो सो गुरुवालोगहैं तिनसे पूछयो कि, जो-
तुमने बतायोकि, ब्रह्महै सो हमको समझ न परी तब उन गुरुवालोगन ज्यों
ज्यों वेदरूप कामरीभीजैहै कहे विचारत जाइहैं त्यों त्यों भारीहोतजायहै ।
सो कामरीमें दोय अर्थ दोयहै एक कर्मविचाररूपहै एक ब्रह्मविचाररूपहै सो
दोनोंको पारनाही पावैहैं ज्यों ज्यों विचारत जाई है त्यों त्यों कठिनई होत जाइहै
अर्थात् गहिरो अर्थ होतजायहै सो कैसे समुझिपरे वातो वेदार्थमें विचार करै है
ब्रह्मरूप कामरी सो तो धोखाब्रह्म कुछ वस्तुही नहीं है ॥ ३ ॥
इति पंद्रहवींरमैनीसमाप्तम् ।
( ७२ ) बीजक कबीरदास ।
अथ सोरहवींरमैनी ।
चोपाई ।
चलतचलतअतिचरणपिराने।हारिपरेतहँअतिखिसिआने १
गणगन्धर्वमुनिअंतनपाया । हारिअलोपजगधंधेलाया २
गहनी वंधन बांध न सूझा।थाकि परे तब कछू न बूझा ॥३॥
भूलिपरे जिय अधिक डेराई।रजनी अंधकूप है जाई ॥ ४ ॥
मायामोह उहां भरि भूरी। दादुर दामिनि पवनहु पूरी ॥५॥
बरसै तपै अखण्डित धारा।रैनिभयावनि कछुन अहारा॥६॥
साखी ॥ सबैलोग जहँडाइया, औ अंधा सबै भुलान ॥
कहाकोइ नहिं मानही, सब एकैमाहँ समान ॥ ७ ॥
चलतचलतअतिचरणपिराने।हारिपरेतहँ अतिखिसियाने १
नाना मतमें लगे जीव तिनकेचरण ब्रह्मके खोजहीमें पिरान लगे अर्थात
थकिआये मतिनहीं पहुंचै एकहू शास्त्रके बिचारके पार न गये तामें प्रमाण ॥
( इन्द्रादयोपियस्यांतंनययुः शब्दवारिधेः । प्रक्रियांतस्यकृत्स्नस्यक्षमोवक्तुंनरः
कथम् ) ॥ तब खिसि आइकै यह कहते ( भये अतिरेसयान पाठ होय तौ अर्थ
कि बड़ेसयानो रहे तेऊ हारिगे ) ॥ १ ॥
गणगंधर्वमुनिअंतनपाया। हरिअलोपजगधंधेलाया ॥२॥
जौने ब्रह्मको अंतगन्धर्व औ मुनिनके गण नहीं पायो ताको हमकैसे जानि-
सकैं। जो ब्रह्मको साकारकहैं तौमध्यम प्रमाणमें आयजाय है, अनित्य
होयहै। औ जो ब्रह्मको निराकारकहै है तौजगत्की कर्तृत्व कैसे होयगो यही
संदेह मेरे सिद्धांत न भयो । कबीरजी कहैं कि, कैसे होयगी सन्देहमें परे
जैसे हरि हैं तैसे बिनासद्गुरुके बताये तोजानतही नहीं है, यहिते हरि अलोप
रमैनी । ( ७३ )
कहे हरि अमकट भये तिनके बिना जाने जगत्के धन्धेमें जीव सब अपनो
मन लगायराख्यो ॥ २ ॥
गहनी बंधन बांधनसूझा । थाकिपरेतबकछूनबूझा ॥ ३ ॥
गहनी बंधन जो मायासबलित ब्रह्म जौन बांधिकै संसारमें डारि देनवारों
ऐसो जो ब्रह्म ताको बांधजीवनको न सूझिपरचो कौन बांध कि जो कोई
मोहीमेंलगैहै तौमैं बांधिकै संसारमें डारिदेउँ हैं या मायासबलित ब्रह्मको
बांध न सूझि परचो जों कहो काहेते बांधबांध्यो है तो जगत्की उत्पत्ति वही
ब्रह्मते होय है वा ब्रह्म जगत्को रहिबोई चहैहै याही ते जो कोई वामें लगै है
ताको साहबको ज्ञान भुलायकै संसारहीमें राखैहै सो कबीरजी कहैं हैं कि
जब वही संसार में थकिपरे तब कछु न बूझत भये अर्थात् अनेक मतनकों
बिचारैहै पै सिद्धांत न पावतभये साहबको ज्ञान भूलिगये ॥ ३ ॥
भूलिपरे तब अधिक डेराइ ।
( ७४ ) बीजक कबीरदास ।
देख्यो तबतक तो उजियारी जब ज्योतिमें लीनह्वैगयो तब सुषुप्ति ऐसेमें
पर्यो रह्यो यही भयावनि रैनिहै भयावनिको हेतु यह है कि प्राणके उतरिबेकी
अवधि बनीहै ॥ ४ । ५ ॥ ६ ॥
साखी ॥ सभैलोगजहँडाइया, औ अन्धासभैभुलान ॥
कहाकोइनहिमानही, सबएकैमाहँसमान ॥ ७ ॥
और जे मायाते सभयरहे डेराते रहे ते लोग जहँडाइया कहे बहेकिकै औ-
रई और मतनमें लगिगये औ जेअज्ञान आंधेररहें ते संसारहीमें परे संसार
छूटिबेको उपौवैना किये भूलिही गये सो कबीरजी कहैंहैं कि मेरो कहा कोई
नहीं मानैहै सब जे जीव हैं ते एक जो मायाब्रह्म ताहीमें सब समाते भये
इत्यर्थ औ साहबको बिनाजाने ब्रह्महूमें लीनहै संसारहीमें आवैहै वाको प्रमाण
पीछे लिखिआये हैं ॥ ७ ॥
इति सोलहवीं रमैनी समाप्तम् ।
अथ सत्रहवीं रमैनी ।
चौपाई ।
जसजिवआपिमिलैअसकोई। बहुतधर्मसुखहृदयाहोई ॥१॥
जासों बातरामकी कही । प्रीति न काहूसोंनिर्वही ॥ २ ॥
एकैभाव सकलजगदेखी । बाहेरपरैसोहोयविवेकी ॥ ३ ॥
विषयमोहकेफंदछोड़ाई । जहांजायतहँकाटुकसाई ॥ ४ ॥
आय कसाई छूरी हाथा । कैसहु आवै काटौंमाथा ॥ ५ ॥
मानुष बड़े बड़े ह्वैआये । एकै पण्डित सबै पढ़ाये ॥ ६ ॥
पढ़नापढ़हुधरहुजिनगोई । नहिंतोनिश्चयजाहुविगोई॥७॥
साखी ॥ सुमिरन करहु सुरामको, औ छांड़हु दुखकी आस॥
तरऊपर धरि चापिहैं जसकोल्हूकोटिपचास ॥८॥
रमैनी । ( ७५ )
जसजिवआपुमिलैअसकोई । वहुतधर्मसुखहृदयाहोई॥१॥
जासोंबात रामकीकही । प्रीति न काहूसों निर्वही ॥ २ ॥
जैसो आपु होई तैसो जबताको मिलै तबहीं धर्मबढै है औ हृदयमें बड़ो
सुखहोयहै तामें प्रमाण गोसाईंजीको ॥ दोहा ॥ इष्टमिलै अरु मन मिलै, मिलै
भजनरसरीति ॥ तुलसिदास तासों मिलै, हठिकै उपजै प्रीति १ सो औरी-
भांति सुखनहींहोयहै १ काहे ते कि जासों कहे जौने जीवनसों रामकी बात मैं
कहौं हौं कि तैं रामचन्द्रकोहै तिनको अपनो साहब मानु नाना ईश्वर जो तैंने
माने हैं सो येसब मायाके जालमें परेंहैं तोको कहा उबारेंगे सो कबीरजी कहैंहैं
कि या मेरी बातपै काहू जीवनकी प्रीति न निबहतभई अर्थात् जो मेरीबात
प्रीतिते सुनै साहब को जानै जपने अपने मतमें आरूढ़है वादसोकरैहै वस्तुनहीं
ग्रहणकरै है ॥ २ ॥
एकैभाव सकलजगदेखी । बाहेरपरै सोहोय विवेकी ॥ ३ ॥
विषयमोहकेफंदछोड़ाई । जहां जाय तहँकाटकसाई॥ ४ ॥
एकैभाव सकल जगदेखी कहे जे एक ब्रह्मभाव जगत्को देखै हैं तेहिते बा-
हेर अपनेको दासमानि सब में चिद्रूपको जो जानै है । सोई विवेकी होयहैं
सो ऐसे विवेकिकनके पासतो नहीं जायहै २ नाना विषयके मोहके फंद छोड़ायकै
अर्थात् संसारते वैराग्य करिकै अधिकारिह्वैकै जहांजहांजायहैं तहांतहां कसाई जे
गुरुवा लोग ते गलाकोटैहैं अर्थात् साहबको ज्ञानकाटि धोखा ब्रह्ममें लगाय देयँ
हैं । सो याको गलाकाट्यो गलाकाटे फेरिजन्महोयहै याते गुरुवालोगनको कसाई
कह्यो । ऐसे याहूको जनन मरण होय है । ब्यंग्य यहहै कि जे जीव साहब
को त्यागि और औरमें लगे हैं ते पशुहैं उनको ऐसही गलाकाट्यो जायहै ॥४ ॥
कसाई तो शरीरको गलाकाटैहैं और—
आय कसाई छूरी हाथा । कैसेहु आवै काटों माथा ॥ ५ ॥
१ स्वार्थी गुरुवालोग जिनको संसारी सुख और क्षणिक मान बड़ाईके अतिरिक्त
सत्यका ज्ञानही नहीं है । २ गुरुवालोगोंके नानाप्रकारसे जीवोंको ठगनेके उपाय ।
( ७६ ) बीजक कबीरदास ।
मानुष बड़े बड़े ह्वै आये । एकै पण्डित सबै पढ़ाये ॥ ६ ॥
कसाई जे गुरुवालोग तिनकी बनाई पोथी सोई छुरीहाथमें लीन्हे यह
ताके हैं कि कैसेहुकै कौन्यो मतको आवै तौ ठगिकै अपनेमतमें कैकेइँ माथ काटिलै
कहेमूंड़िडारै चेलाकरिलैं । सो साहबको छोड़ाइ औरे आरम लगाबनवारो हैं
सो गुरू कसाई है । यहौ द्वैत ज्ञानवाले गुरुवालोग जीवनको गलाकाटें हैं जो
संसारमें रहतो तो कबहूं दैवयोगते साधु सङ्गमभयो उद्धारहू होतो सो तौने
धोखा ब्रह्ममें लगायदियो जहांते उद्धार नहीं है वहां काहेको कोई साहबको
बतावेंगे ॥ ५ ॥ मनुष्य जे बड़ेबड़े ज्ञानीलोग हैं ते यही पढ़ावतभये कि एक
वही ब्रह्महै जीवनहींहै और कोई या पढ़ाया कि एकजीवही सांच है और सब
असांचहै ॥ ६ ॥
पढ़नापढ़हुधरहुजनिगोई।नाहींतौनिश्चय जाउविगोई ॥७॥
जौनपढ़ना तुम गुरुवालोगनतेपढ़योह
रमैनी। ( ७७ )
अथ अठारहवींरमैनी।
चौपाई।
अद्भुत पंथ वरणिनहिं जाई । भूले रामभूलिदुनियाई॥१॥
जो चेतौतौ चेतुरे भाई । नहिंतो जिय जरि मूलै जाई॥२॥
शब्द न मानै कथै विज्ञाना । तातेयम दीन्ह्यो है थाना॥३॥
संशय साउज बसै शरीरा।ते खायल अनवेधल हीरा॥४॥
साखी ॥ संशय सारज देह में, संगहि खेल जुआरि ॥
ऐसा घायल वापुरा, जीवन मारै झारि ॥ ५ ॥
अद्भुत पंथ वरणि नहिं जाई।भूलेराम भूलिदुनियाई ॥१॥
जो चेतौ तौ चेतुरे भाई । नहिंतो जियजरिमूलैजाई ॥ २॥
अद्भुत पंथ जो ब्रह्म ताको वर्णतकोईने अंतनहींपायो राम जो साहबहैं तिनके
भूलेकहे बिना जानेते सब दुनिया धोखा ब्रह्म मायामेंभूलिगई १ हे भाइउ
चेतौतौ चेतौ नहीं तौ मायाब्रह्मकी आगिमें जरिकै मूलतेजाउगे । यह कबीर-
जीकहै हैं । नहीं तौ यम जीव लैजाइ जो यहपाठहोयतौ यहअर्थहै कि चेतौतौ
चेतौ नहीं तौ यम लैजायके नरकमें डारिदैँगे ॥ २ ॥
शब्द न मानैकथै विज्ञाना । तातेयमदीन्ह्योहैथाना॥ ३ ॥
संशय साउज बसै शरीरा । तेखायलअनवेधलहीरा ॥४॥
बिज्ञानहूको सार जाते सबशब्द निकसे हैं ऐसो जोरामनाम ताको तौ मानै-
नहीं है और और मतिमें लगिकै विज्ञान कथै है ताते यमराज जो जैसो
कर्मकरैहै ताको तैसो नरक स्वर्गकोथान देयहैं ३ संशयरूपी साउज जो
मन सो शरीररूपी बनमें बसिके अनबेधलकहे जाकोयश रामनाममें नहींहै ऐसो
जो हीराजीव ताको खायगयो कौनीरीतिते खायो सो आगे कहै हैं ॥ ४ ॥