कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६४ ) बीजक कबीरदास ।
नहींतो शेषहोतहोत सब लुकाय जायहै एक एक में लीनह्वैजायहैं कहीं लोप
है जाय है कहीं अलोप है जायहै निषेध करत करत तुमहीं रहिजाउहै।
कि मैं रहिजाउँहौं तब मैं तुमको हंसरूपदै अपने धामको लैआवो हौं
सो या जगतमरेही शरीरहै या प्रतीतितुमको काहूको न आई द्रव्यही बुद्धि
मानते भये ॥ २ ॥
चलेलोगसब मूलगँवाई । यमकीबाढ़िकाटिनहिंजाई ॥३॥
सबको मूल जो मेरो रामनाम ताको गँवाय कहेभूलिकै हे जीवो! तुम सब ना-
नापन्थमें चलेहौ परन्तु यमकहे दोऊविद्या अविद्यारूप जो घोरनदी तिनकीबा-
ढ़िजोहै धारा सो न काटीजायगी अर्थात् न पैरी जायगी । वाही में बूडिजा-
वोगे । अथवा यम जो है काल रूप ब्रह्म ताकी बाढ़ि जो बाणी जो एकते
अनेक भई है सो हे जीवो तुम्हारी काटी न काटिजायगी जो काटि पाठहोय
तौयह अर्थ है विद्या अविद्याकी दुइ नदी बाढ़ी तुम्हारे हिय में सो तुम्हारी
काटि न काटिजायगी अर्थात् वाहीमें परेरहौगे अथवा चौदहौ जे यमवर्णन
करिआये है तिनकीबाढ़िबढ़ी है सो तुम बिना मेरी कृपा न छूटोगे । सो तुम्हारी
काटी न कटैगी बिनामोकोजाने ॥ ३ ॥
आजुकाजजियकालिहअकाजा । चलेलादिदिग्गंतरराजा४
हेजीवौ ! अनिर्वचनीय जो मेरो नाम ताको जोआजु समुझौ तौ कार्य्य होयगो
तिहारो औ जोकाल्हि कहे शरीर छूटेंमें समुझो चाहौतौ अकाजहै नाजानै कौनी
योनिमें परौ फिरि समुझौ धौं ना समुझौ । सो हे जीवो तुमतो राजा है मन
मायादिक ये तुम्हारे ही बनाये हैं सोतौ तुम भूलिगये । चले लादि कहेविद्या-
अविद्याके जे नानाकर्म तिनको अंगीकार करि अर्थात् वैहै बोझाअपनेमाथे में धरि
दिगंतरमें जाय नानाशरीर धारण करत है सो अबहूं मोको जानि तुम सब
यहदुःख त्यागो यह मायारूप धोखावाले नको उपदेश दियो अब सहजस-
माधिवाले नको कहै हैं ॥ ४ ॥
१ देखौ मंगल में १८ वीं साखीकी टीका ।