कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ९८ ) बीजक कबीरदास ।
ज्ञान कहौं सो जब सोऊ न रह्यो तब वह दशामें बिचारिदेखो तुम्हीं रहिजा-
उहौ, तुम्हारोई अनुमान ब्रह्महै, तोते मिथ्याही है । जब तुम्हीं रहि गये तब
तुममें तो माया ब्रह्मते छूटनेकी सामर्थ्य है नहीं जो सामर्थ्यहोती तौ पहिलेही
ते तुमको काहे को बांधिलेती । याते तुम डेराउहौ कि, हमकैसेकै छूटेंगे ।
सो यामाया औ धोखाब्रह्मका डर तुम काहेको मानतेहौ । मैं जो अनिर्वचनी-
यहौं ताके तुम अंशहौ तुम्हूं अनिर्वचनीय हौ नाहक धोखा ब्रह्म औ माया कों
अनुमान कैकै नानादुःख पावतेहौ । तुममाया ब्रह्मको भ्रमत्यागि मेरे अनिर्वच-
नीय नाम में लगिकै मेरे पासआवो मैं रक्षाकरि लेउँगो । यह मालिक जे
श्रीरामचन्द्र हैं ते कहै हैं ॥ ४ ॥
ऊउतंगतुम जातिपतंगा । यमघर किहेहु जीवकै संगा॥५॥
नीमकीटजसनीमपियारा । बिषकोअमृतमानगँवारा ॥६॥
वहजोमाया औ धोखा ब्रह्मअग्निरूपताकी उत्तुंगकहे बड़ीऊंची लपटैंहैं तुम-
जातिकेपतंगहैकै वामेंकाहेजरिजरिमरौहै । सोहेजीव नानाबस्तुनकोसंगकरि
जाहीमेंमनलगायमरचो औ सोई भयो याहीभांतिजनमिकै मरिकै यमकेपासघर-
बनायेहौ अर्थात् या संग का प्रभावहै जो यमके यहां घरबनोयेहैं ५ जैसेनीमके
किरवा को नीमही प्यारलगैहै, जो मिष्टान्नौ पावै तौ न खाय, ऐसे बिषरूप
जो विषय ताको अमृतमानिगँवार जोजीवहैंसो खायहैं ॥ ६ ॥
विषकेसंगकौनगुण होई । किंचितलाभमूलगो खोई॥ ७ ॥
विषअमृतगोएकहिसानी । जिनजानातिनबिषकैमानी॥८॥
सोयाबिषरूपी विषयके संगकौनगुणहै क्षणभरेकोसुखहै औ सबकोमूल जो
मेरोज़्ञानसो नशायगो अनेकजन्म दुःखपावनलग्यो ७ साहब कहै हैं कि और
नाना देवतन को जो नामजपिबो औ तिन्हीं के लोक में जाय सुख पाइबो या
तोबिष है औ मेरे नामको जपिबो मेरे लोकमें जायसुख पाइबो यातो अमृतहै
सो ये दूनौं बिष अमृत एकैमें सानिगो कैसे जैसे साहबको नामलीन्हे मुक्त
हैजायहै साहबके लोकमें जाय सुखपावै है ऐसे औरहूदेवतनके नामलीन्हेसे