सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

१९८ हितोपदेशः [ विग्रहः १०४-
दुःख होना अच्छा है परन्तु उस अनुचित काम करनेसे उसका नाश होना अच्छा
नहीं है ॥ १०३ ॥
वैद्यो गुरुश्च मन्त्री च यस्य राज्ञः प्रियः सदा ।
शरीरधर्मकोशेभ्यः क्षिप्रं स परिहीयते ॥ १०४ ॥
जिस राजाके पास वैद्य, गुरु और मंत्री सदा हाँमें हाँ मिलाने वाले हों वह
राजा शरीर, धर्म और कोशसे शीघ्र रहित ( नष्ट ) हो जाता है ॥ १०४ ॥
शृणु देव !-
पुण्याल्लब्धं यदेकेन तन्ममापि भविष्यति ।
हत्वा भिक्षुं महालोभान्निध्यर्थी नापितो हतः' ॥ १०५ ॥
सुनिये महाराज ! जो वस्तु किसीने पुण्यसे पा ली वह वस्तु मुझे भी मिल
जायगी, यह नहीं सोचना चाहिये; अधिक लोभसे भिखारीको मार कर एक
धनका अभिलाषी नाई मारा गया ॥ १०५ ॥
राजा पृच्छति - 'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति-
राजा पूछने लगा-'यह कथा कैसी है ?' मंत्री कहने लगा ।-
कथा १०
[ एक क्षत्रिय, नाई और भिखारीकी कहानी १० ]
'अस्त्ययोध्यायां चूडामणिर्नाम क्षत्रियः । तेन धनार्थिना महता
क्लेशेन भगवांश्चन्द्रार्धचूडामणिश्चिरमाराधितः । ततः क्षीणपापो-
ऽसौ स्वप्ने दर्शनं दत्वा भगवदादेशाद्यक्षेश्वरेणादिष्टः - 'यत्त्वमद्य
प्रातः क्षौरं कृत्वा लगुडं हस्ते कृत्वा गृहे निभृतं स्थास्यसि
ततोऽस्मिन्नेवाङ्गणे समागतं भिक्षुं पश्यसि । तं निर्दयं लगुड-
प्रहारेण हनिष्यसि । ततः सुवर्णकलशो भविष्यति, तेन त्वया
यावज्जीवं सुखिना भवितव्यम् ।' ततस्तथानुष्ठिते तद्वृत्तम् । तत्र
क्षौरकरणायानीतेन नापितेनालोक्य चिन्तितम्- 'अये ! निधि-
प्राप्तेरयमुपायः । अहमप्येवं किं न करोमि ?' ततःप्रभृति नापितः
प्रत्यहं तथाविधो लगुडहस्तः सुनिभृतं भिक्षोरागमनं प्रतीक्षते ।
एकदा तेन प्राप्तो भिक्षुर्लगुडेन व्यापादितः । तस्मादपराधा-
त्सोऽपि नापितो राजपुरुषैर्व्यापादितः । अतोऽहं ब्रवीमि-
'पुण्याल्लब्धं यदेकेन' इत्यादि ।

-१०७ ] शत्रु की जांच करनेकी युक्ति १९९
अयोध्यामें चूड़ामणि नाम एक क्षत्रिय रहता था। उस धनके अभिलाषीने
बड़े क्लेशसे भगवान् महादेवजीकी बहुत काल तक आराधना की। फिर जब वह
क्षीणपाप हो गया तब महादेवजीकी आज्ञासे कुबेरने स्वप्नमें दर्शन दे कर आज्ञा
दी कि-जो तुम आज प्रातःकाल और क्षौर कराके लाठी हाथमें ले कर घरमें
एकांतमें छुप कर बैठोगे तो इसी आँगनमें एक भिखारीको आया हुआ देखोगे।
जब तुम उसे निर्दय हो कर लाठीकी प्रहारोंसे मारोगे तब वह सुवर्णका कलश हो
जायगा । उससे तुम जीवनपर्यन्त सुखसे रहोगे ।' फिर वैसा करने पर वही
बात हुई । वहाँ क्षौर करनेके लिये बुलाया हुआ नाई सोचने लगा-‘अरे ! धन
पानेका यही उपाय है, मैं भी ऐसा क्यों न करूँ ?' फिर उस दिनसे नाई वैसे ही
लाठी हाथमें लिये हमेशा छिप कर भिखारीके आनेकी राह देखता रहता था।
एक दिन उसने भिखारीको पा लिया और लाठीसे मार डाला । अपराधसे
उस नाईको भी राजाके पुरुषोंने मार डाला । इसलिये मैं कहता हूं, "किसीको
पुण्यसे मिल गई" इत्यादि ।'
राजाह—
‘पुरावृत्तकथोद्गारैः कथं निर्णीयते परः ।
स्यान्निष्कारणबन्धुर्वा किं वा विश्वासघातकः ॥ १०६ ॥
राजा बोला-‘पहले हो गई कथाओंके कहनेसे नवीन आया हुआ कैसे
निश्चय किया जाय कि यह अकृत्रिम बांधव है अथवा विश्वासघाती है ॥१०६॥
यातु । प्रस्तुतमनुसंधीयताम् । मलयाधित्यकायां चेच्चित्रवर्णस्त-
दधुना किं विधेयम् ?' मन्त्री वदति—'देव ! आगतप्रणिधिमुखा-
न्मया श्रुतं तन्महामन्त्रिणो गृध्रस्योपदेशे, यच्चित्रवर्णेनानादरः
कृतः । ततोऽसौ मूढो जेतुं शक्यः ।
इसे जाने दो। अब जो उपस्थित है उसका विचार करो। मलय पर्वतके
ऊपर जो चित्रवर्ण ठहरा है इसलिये अब क्या करना चाहिये ?' मंत्री बोला-‘हे
महाराज ! लौट कर आये हुए दूतके मुँहसे मैंने यह सुना है कि उस महामंत्री
गृध्रके उपदेश पर चित्रवर्णने अनादर किया है। फिर उस मूर्खको जीत सकते हैं।
तथा चोक्तम्,—
लुब्धः क्रूरोऽलसोऽसत्यः प्रमादी भीरुरस्थिरः ।
मूढो योधावमन्ता च सुखच्छेद्यो रिपुः स्मृतः ॥ १०७ ॥

२०० हितोपदेशः [ विग्रहः १०८-
वैसा कहा है—लोभी, कपटी, आलसी, झूठा, कायर, अधीर, मूर्ख और
योद्धाओंका अनादर करने वाला शत्रु सहजमें नाश किया जा सकता हैं ॥१०७॥
ततोऽसौ यावदस्मद्दुर्गद्वाररोधं न करोति तावन्नद्यद्रिवनवर्त्मसु
तद्बलानि हन्तुं सारसादयः सेनापतयो नियुज्यन्ताम् ।
फिर वह जब तक हमारे गढ़का द्वार न रोके तब तक पर्वत और वनके
मार्गोंमें उसकी सेनाको मारनेके लिये सारस आदिको सेनापति नियुक्त कर दीजिये ।
तथा चोक्तम्,—
दीर्घवर्त्मपरिश्रान्तं नद्यद्रिवनसंकुलम् ।
घोराग्निभयसंत्रस्तं क्षुत्पिपासादितं तथा ॥ १०८ ॥
वैसा कहा है—राजाको लंबे मार्गसे थकी हुई, नदी, पर्वत और वनके
कारण रुकी हुई भयंकर अग्निसे डरी हुई तथा भूख-प्याससे व्याकुल हुई ॥१०८॥
प्रमत्तं भोजनव्यग्रं व्याधिदुर्भिक्षपीडितम् ।
असंस्थितमभूयिष्ठं वृष्टिवातसमाकुलम् ॥ १०९ ॥
( मद्यपानादिसे ) मतवाली, भोजनमें आसक्त, रोग तथा अकालसे पीडित तथा
आश्रयरहित, थोड़ीसी, तथा वर्षा और ( शीतल ) वायुसे घबराई हुई ॥ १०९ ॥
पङ्कपांशुजलाच्छन्नं सुव्यस्तं दस्युविद्रुतम् ।
एवंभूतं महीपालः परसैन्यं विघातयेत् ॥ ११० ॥
कीचड़, धूलि और जलसे व्याप्त, आपत्तिसे निकलनेके यत्नमें व्याकुल, चौर
आदिके उपद्रवोंसे युक्त ऐसी शत्रु की सेनाको नाश करना चाहिये ॥ ११० ॥
अन्यच्च,—
अवस्कन्दभयाद्राजा प्रजागरकृतश्रमम् ।
दिवासुप्तं समाहन्यान्निद्राव्याकुलसैनिकम् ॥ १११ ॥
और दूसरे—घिर जानेकी शंकाके कारण रातके अधिक जागनेसे थकी हुई,
दिनमें सोती हुई, निद्रासे व्याकुल शत्रु की सेनाको राजा मार डाले ॥ १११ ॥
अतस्तस्य प्रमादिनो बलं गत्वा यथावकाशं दिवानिशं घ्नन्त्वस्म-
त्सेनापतयः ।' तथानुष्ठिते चित्रवर्णस्य सैनिकाः सेनापतयश्च
बहवो निहताः । ततश्चित्रवर्णो विषण्णः स्वमन्त्रिणं दूरदर्शिनमाह—
'तात ! किमित्यस्मदुपेक्षा क्रियते किं काप्यवानयो ममास्ति ?

-११५ ] राज्य पाने पर राजाका कर्तव्यकर्तव्य २०१
इसलिये उस प्रमादीकी सेनाको जा कर जैसा अवसर मिले रातदिन हमारे
सेनापति लूट खसोट कर मारे । ऐसा करनेसे चित्रवर्णकी सेना और बहुतसे
सेनापति मारे गये; फिर चित्रवर्ण विकल हो कर अपने मंत्री दूरदर्शीसे कहने
लगा—'प्यारे ! किसलिये हमारा अनादर करता है ? क्या कभी मैंने तेरा
अनादर किया है ?
तथा चोक्तम्,—
न राज्यं प्राप्तमित्येवं वर्तितव्यमसांप्रतम् ।
श्रियं ह्यविनयो हन्ति जरा रूपमिवोत्तमम् ॥ ११२ ॥
जैसा कहा है—राज्य मिल गया, यह जान कर अनुचित व्यवहार नहीं करना
चाहिये । क्योंकि कठोरता निश्चय करके लक्ष्मीको ऐसे नाशमें मिला देती है जैसे
सुन्दर रूप-रंगको बुढ़ापा ॥ ११२ ॥
अपि च,—
दक्षः श्रियमधिगच्छति पथ्याशी कल्यतां सुखमरोगी ।
अभ्यासी विद्यान्तं धर्मार्थयशांसि च विनीतः ॥ ११३ ॥
और भी-चतुर पुरुष लक्ष्मीको, सुन्दर और हलका भोजन करने वाला
नीरोगताको, रोगहीन सुखको, अभ्यासी विद्याके अंतको, और सुशील अर्थात्
नम्रतादिगुणोंसे युक्त मनुष्य धर्म, धन और यशको पाता है ॥ ११३ ॥
गृध्रोऽवदत्—'देव ! शृणु,—
गिद्ध बोला—'महाराज ! सुनिये,—
अविद्वानपि भूपालो विद्यावृद्धोपसेवया ।
परां श्रियमवाप्नोति जलासन्नतस्तरुर्यथा ॥ ११४ ॥
मूर्ख राजा भी पण्डितोंकी सेवासे जलके समीपके वृक्षके समान उत्तमोत्तम
संपत्तिको पाता है ॥ ११४ ॥
अन्यच्च,—
पानं स्त्री मृगया द्यूतमर्थदूषणमेव च ।
वाग्दण्डयोश्च पारुष्यं व्यसनानि महीभुजाम् ॥ ११५ ॥
और दूसरे-मद्य आदिका पीना, परस्त्रीका संग, आखेट, जुआ, अन्यायसे
पराया धन लेना, और वचन तथा दंडमें रुखाई और कठोरता ये राजाओंके
अवगुण कहे हैं; अर्थात् उनका त्याग करना अवश्य है ॥ ११५ ॥

२०२ हितोपदेशः [ विग्रहः ११६-
किं च,—
न साहसैकान्तरसानुवर्तिना
न चाप्युपायोपहतान्तरात्मना ।
विभूतयः शक्यमवाप्तुमूर्जिता
नये च शौर्ये च वसन्ति संपदः ॥ ११६ ॥
और ( बुराई भलाईको विना विचार कर ) केवल साहस करने वाला, और
उपायसे उपहत चित्तवाला, अधिक ऐश्वर्यको नहीं पा सकता है, क्योंकि
जहां पर नीति और शूरता रहती है वहां ही संपत्तियाँ रहती हैं ॥ ११६ ॥
त्वया स्वबलोत्साहमवलोक्य साहसैकवासिना मयोपन्यस्ते-
ष्वपि मन्त्रेष्वनवधानं वाक्पारुष्यं च कृतम् । अतो दुर्नीतेः
फलमिदमनुभूयते ।
और केवल साहस पर भरोसा करने वाले, आपने अपनी सेनाके उत्साहको
देख कर मेरे किये उपदेशों पर ध्यान नहीं दिया था और कठोर वचन कहे थे
उसी कटु नीतिका फल भोग रहे हो ।
तथा चोक्तम्,—
दुर्मन्त्रिणं किमुपयन्ति न नीतिदोषाः
संतापयन्ति कमपथ्यभुजं न रोगाः ? ।
कं श्रीर्न दर्पयति कं न निहन्ति मृत्युः
कं स्त्रीकृता न विषयाः परितापयन्ति ? ॥ ११७ ॥
नीतिके दोष किस बुरे मंत्रीमें नहीं होते हैं ? किसको अपथ्य ( अहितकर
वस्तुएँ ) खाने पर रोग नहीं पीड़ा देते हैं ? लक्ष्मी किस मनुष्यको
अभिमानी नहीं करती है ? मृत्यु किसको नहीं मारती है और स्त्रीके किये हुए
दुराचार किस पुरुषको दुःख नहीं देते हैं ? ॥ ११७ ॥
अपरं च,—
मुदं विषादः शरदं हिमागम-
स्तमो विवस्वान् सुकृतं कृतघ्नता ।
प्रियोपपत्तिः शुचमापदं नयः
श्रियः समृद्धा अपि हन्ति दुर्नयः ॥ ११८ ॥

नीतिशास्त्रकथाकौमुदीं वागुल्काभिस्तिमिरयति ?

-१२१] बची सेनाके साथ विंध्याचल जानेकी तैयारी २०३
और दूसरे-दुःख-हर्षको, हिमऋतु शरदको, सूर्य अँधेरेको, कृतघ्नता उपकार
अथवा पुण्यको, अभीष्टका लाभ शोकको, नीति आपत्तिको और अनीति
अतिसमृद्ध ( बड़ी हुई ) संपत्तिको भी नाश कर देती है ॥ ११८ ॥
ततो मयाप्यालोचितम्—'प्रज्ञाहीनोऽयं राजा । नो चेत्कथं
नीतिशास्त्रकथाकौमुदीं वागुल्काभिस्तिमिरयति ?
तब मैंने भी सोच लिया था कि यह राजा बुद्धिहीन है; नहीं तो कैसे
नीतिशास्त्रकी कथारूपी चाँदनीको वाणीरूपी उल्कापातोंसे धुँधली करता ?
यतः,—
यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ? ।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ?' ॥ ११९ ॥
क्योंकि—जिस मनुष्यको अपनी बुद्धि नहीं है उसको शास्त्र क्या करता है ?
जैसे दोनों आँखोंसे रहित अन्धे मनुष्यको दर्पण क्या करेगा ?' ॥ ११९ ॥
इत्यालोच्य तूष्णीं स्थितः । अथ राजा बद्धाञ्जलिरह—'तात !
अस्त्ययं ममापराधः । इदानीं यथावशिष्टबलसहितः प्रत्यावृत्य
विन्ध्याचलं गच्छामि तथोपदिश ।' गृध्रः स्वगतं चिन्तयति—
'क्रियतामत्र प्रतीकारः ।
यह जीमें विचार कर चुपका-सा हो बैठा था । पीछे राजा हाथ जोड़ कर
बोला—'प्यारे ! यह मेरा अपराध हुआ । अब जैसे बची हुई सेनाके साथ लौट
कर विंध्याचल पहुँच जाऊँ वैसा उपाय बता ।' गिद्ध अपने जीमें सोचने
लगा,—'इसका कुछ ना कुछ उपाय करना चाहिये ।
यतः,—
देवतासु गुरौ गोषु राजसु ब्राह्मणेषु च ।
नियन्तव्यः सदा कोपो बालवृद्धातुरेषु च' ॥ १२० ॥
क्योंकि—देवता, गुरु, गाय, राजा, ब्राह्मण, बालक, बूढ़ा और रोगी
इन पर क्रोध रोकना चाहिये' ॥ १२० ॥
मन्त्री प्रहस्य ब्रूते—'देव ! मा भैषीः । समाश्वसिहि शृणु देव !
मंत्री ( यह अपने जीमें विचार कर ) हँस कर बोला—'महाराज ! मत डरिये
और धीरज धरिये, हे महाराज ! सुनिये,—

२०४ हितोपदेशः [ विग्रहः १२१-
मन्त्रिणां भिन्नसंधाने भिषजां सांनिपातिके ।
कर्मणि व्यज्यते प्रज्ञा सुस्थे को वा न पण्डितः ? ॥१२१॥
लड़ाईके समय शत्रुसे मेल करनेमें मंत्रियोंकी, सन्निपात(ज्वर) रोगमें वैद्योंकी
और कार्योंके साधनमें दूसरोंकी बुद्धि जानी जाती है, और यों बैठें ठाले
कौन पण्डित नहीं है ? ॥ १२१ ॥
अपरं च,—
आरभन्तेऽल्पमेवाज्ञाः कामं व्यग्रा भवन्ति च ।
महारम्भाः कृतधियस्तिष्ठन्ति च निराकुलाः ॥ १२२ ॥
और दूसरे-बुद्धिहीन, छोटे ही कामका आरम्भ करते हैं और अत्यन्त
व्याकुल हो जाते हैं । बुद्धिमान् बड़े बड़े काम करते हैं और कभी विकल नहीं
होते हैं ॥ १२२ ॥
तदत्र भवत्प्रतापादेव दुर्ग भङ्क्त्वा कीर्तिप्रतापसहितं त्वामचि-
रेण कालेन विन्ध्याचलं नेष्यामि।' राजाह—'कथमधुना स्वल्प-
बलेन तत्संपद्यते?' । गृध्रो वदति—'देव ! सर्वं भविष्यति ।
यतो विजिगीषोरदीर्घसूत्रता विजयसिद्धेरवश्यंभावि लक्षणम् ।
तत्सहसैव दुर्गावरोधः क्रियताम्।'
इसलिये यहाँ आपके पुण्यप्रतापसेही गढ़को तोड़ फोड़ यश और पराक्रम-
सहित आपको शीघ्र विंध्याचलको ले चलूँगा।' राजा बोला-'अब थोड़ीसी सेनासे
यह कैसे होगा ?' गिद्धने कहा-'महाराज ! सब कुछ हो जायगा । क्योंकि जय
चाहने वालेको दीर्घसूत्रता (कालक्षेप) न होना ही जयकी सिद्धिका अवश्य
होनहार लक्षण है । इसलिये एकाएक ही गढ़ चारों ओरसे घेर लीजिये।'
प्रहितप्रणिधिना बकेनागत्य हिरण्यगर्भस्य तत्कथितम्—'देव !
स्वल्पबल एवायं राजा चित्रवर्णो गृध्रस्य मन्त्रोपस्तम्भेन दुर्गावरोधं
करिष्यति । राजाह—'सर्वज्ञ, किमधुना विधेयम् ?' चक्रो ब्रूते—
'स्वबले सारासारविचारः क्रियताम्।' तज्ज्ञात्वा सुवर्णवस्त्रादिकं
यथार्हं प्रसादप्रदानं क्रियताम् ।
१ बात, पित्त और कफ इन तीन दोषोंके संनिपातसे होने वाला ज्वर या
अन्य रोग भयंकर प्राणघातक माने गये हैं।

-१२५ ] बगुलेका हिरण्यगर्भको निवेदन २०५
भेजे हुए दूत बगुलेने लौट कर राजा हिरण्यगर्भसे यह कहा-'महाराज !
राजा चित्रवर्णके पास थोड़ी ही सेना रह गई है, गिद्धके उपदेशसे गढ़ घेरेगा ।'
राजा बोला-'हे सर्वज्ञ ! अब क्या करना चाहिये ?' चकवा बोला-'अपनी
सेनामें निर्बल और प्रबलका विचार कर लीजिये । वह जान कर सुवर्ण कपड़े
आदि जो जिस योग्य हो उसे प्रसन्नताका दान ( अर्थात ) पारितोषिक दीजिये ॥
यतः,—
यः काकिनीमप्यपथप्रपन्नां
समुद्धरेन्निष्कसहस्रतुल्याम् ।
कालेषु कोटिष्वपि मुक्तहस्त-
स्तं राजसिंहं न जहाति लक्ष्मीः ॥ १२३ ॥
क्योंकि—जो राजा बुरे मार्गमें पडी हुई एक कौडीको भी हजार मोहरोंके
समान जान कर उठा लेता है और फिर किसी उचित समय पर करोड़ों रुपये
खर्च कर डालता है उस श्रेष्ठ राजा को लक्ष्मी कभी नहीं छोड़ती है ॥ १२३ ॥
अन्यच्च,—
ऋतौ विवाहे व्यसने रिपुक्षये
यशस्करे कर्मणि मित्रसंग्रहे ।
प्रियासु नारीष्वधनेषु बान्धवे-
ष्वतिव्ययो नास्ति नराधिपाष्टसु ॥ १२४ ॥
और दूसरे-महाराज ! यज्ञमें, विवाहमें, विपत्तिमें, शत्रुके नाश करनेमें, यश
बढ़ाने वाले कार्यमें, मित्रके आदरमें, प्रिय स्त्रियोंमें, निर्धन बान्धवोंमें इन
आठ बातोंमें व्यय वृथा नहीं कहाता है ॥ १२४ ॥
यतः,—
मूर्खः स्वल्पव्ययत्रासात्सर्वनाशं करोति हि ।
कः सुधीः संत्यजेद्भाण्डं शुल्कस्यैवातिसाध्वसात्' ॥ १२५ ॥
क्योंकि मूर्ख थोड़े व्ययके भयसे निश्चय करके सर्वनाश कर देता है, और
कौनसा बुद्धिमान् राज्यके भयसे अपनी दुकानके द्रव्य आदिको छोड़ देता
है ? ॥ १२५ ॥
राजाह-'कथमिह समयेऽतिव्ययो युज्यते ? उक्तं च-“आपदर्थे
धनं रक्षेत्” इति ।' मन्त्री ब्रूते-'श्रीमतः कथमापदः ?' । राजाह—

२०६ हितोपदेशः [ विग्रहः १२६-
'कदाचिच्चलते लक्ष्मीः ।' मन्त्री ब्रूते—'संचितापि विनश्यति ।
तद्देव ! कार्पण्यं विमुच्य दानमानाभ्यां स्वभटाः पुरस्क्रियन्ताम् ।
राजा बोला-'इस समय अधिक व्यय क्यों करना चाहिये ? कहा भी है-
"आपत्तिके नाशके लिये धनकी रक्षा करे" इत्यादि ।' मंत्री बोला-'लक्ष्मीवान्को
आपत्ति कहाँ ?' राजा बोला-'जो लक्ष्मी चली जाय तो ?' मंत्री बोला-'संचित
धन भी नष्ट हो जाय तो ? इसलिये महाराज ! कृपणताको छोड़ दान
और मानसे अपने शूर वीरोंका आदर कीजिये ।
तथा चोक्तम्,—
परस्परज्ञाः संहृष्टास्त्यक्तुं प्राणान्सुनिश्चिताः ।
कुलीनाः पूजिताः सम्यग्विजयन्ते द्विषद्बलम् ॥ १२६ ॥
जैसा कहा है-आपसमें एक दूसरेकी सहायता करनेवाले, प्रसन्नचित्त, प्राणोंको
( स्वामीके लिये संग्राममें ) झोंकने वाले, ( शत्रुके मारनेका निश्चय संकल्प
करने वाले, श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न हुए ) और अच्छे प्रकारसे सन्मान किये गये ऐसे
शूरवीर शत्रु की सेनाको विजय करते हैं ॥ १२६ ॥
अपरं च,—
सुभटाः शीलसंपन्नाः संहताः कृतनिश्चयाः ।
अपि पञ्चशतं शूरा निघ्नन्ति रिपुवाहिनीम् ॥ १२७ ॥
और दूसरे-अच्छे स्वभाव वाले, आपसमें मिले हुए, और बिना-मरें मारे नहीं
लड़ेंगे ऐसा निश्चय करने वाले, पाँच सौ भी बड़े बड़े शूर वीर योधा वैरीकी सेनाका
नाश कर देते हैं ॥ १२७ ॥
किं च,—
शिष्टैरप्यविशेषज्ञ उग्रश्च कृतनाशकः ।
त्यज्यते किं पुनर्नान्यैश्चाप्यात्मम्भरिर्नरः ॥ १२८ ॥
और महामूर्ख, दुष्ट प्रकृति वाला, कृतघ्न और स्वार्थी मनुष्यको सज्जन भी
छोड़ देते हैं; फिर दूसरोंका क्या कहना है ? अर्थात् ऐसेको सब त्याग देते
हैं ॥ १२८ ॥
यतः,—
सत्यं शौर्यं दया त्यागो नृपस्यैते महागुणाः ।
एभिर्मुक्तो महीपालः प्राप्नोति खलु वाच्यताम् ॥ १२९ ॥

-१३४ ] उचित राजनीतिका निरूपण २०७
क्योंकि—सत्य, शूरता, दया और दान याने उदारता ये राजाके बड़े गुण
हैं, और इन गुणोंसे रहित राजा निश्चय करके वाच्यता(निन्दा)को पाता है ॥
ईदृशि प्रस्तावेऽमात्यास्तावदेव पुरस्कृतव्याः ।
ऐसे समय पर पहले मंत्रियोंका सत्कार होना चाहिये;
तथा चोक्तम्,—
यो येन प्रनिबद्धः स्यात्सह तेनोदयी व्ययी ।
स विश्वस्तो नियोक्तव्यः प्राणेषु च धनेषु च ॥ १३० ॥
जैसा कहा है,—जो जिससे बँधा हुआ है और उसीके साथ जिसका उदय
और ह्रास (क्षति) है ऐसे भरोसेके मनुष्यको प्राणोंकी रक्षाके कार्यमें लगाना
चाहिये ॥ १३० ॥
यतः,—
धूर्तः स्त्री वा शिशुर्यस्य मन्त्रिणः स्युर्महीपतेः ।
अनीतिपवनक्षिप्तः कार्याब्धौ स निमज्जति ॥ १३१ ॥
क्योंकि—जिस राजाके धूर्त, स्त्री अथवा बालक मंत्री हों वह अनीतिरूपी
पवनसे उड़ाया हुआ कार्यरूपी समुद्रमें डूबता है ॥ १३१ ॥
शृणु देव !—
हर्षक्रोधौ समौ यस्य शास्त्रार्थे प्रत्ययस्तथा ।
नित्यं भृत्यानुपेक्षा च तस्य स्याद्धनदा धरा ॥ १३२ ॥
महाराज ! सुनिये—जिसको हर्ष और क्रोध समान हैं, शास्त्रमें भरोसा है
और सेवकों पर अतिस्नेह है उसको पृथिवी सतत धन देनेवाली होती है ॥१३२॥
येषां राज्ञा सह स्यातामुच्चयापचयौ ध्रुवम् ।
अमात्या इति तान्राजा नावमन्येतकदाचन ॥ १३३ ॥
जिन्होंकी राजाके साथ निश्चय करके घटती और बढ़ती हो वे मंत्री कहाते हैं
और राजाको उनका कभी अपमान नहीं करना चाहिये ॥ १३३ ॥
यतः,—
महीभुजो मदान्धस्य संकीर्णस्येव दन्तिनः ।
स्खलतो हि करालम्बः सुहृत्सचिवचेष्टितम्' ॥ १३४ ॥
और मतवाले हाथीके समान गिरते हुए मदांध राजाको स्निग्ध अंतःकरणवाले
मंत्रीका अच्छा उपदेशही करावलंब अर्थात् हाथसे सहारा देनेके समान है' ॥

२०८ हितोपदेशः [ विग्रहः १३५-

अथागत्य प्रणम्य मेघवर्णो ब्रूते—'देव ! दृष्टिप्रसादं कुरु ।
इदानीं विपक्षो दुर्गद्वारि वर्तते । तद्देवपादादेशाद्बहिर्निःसृत्य
स्वविक्रमं दर्शयामि । तेन देवपादानामानृण्यमुपगच्छामि ।'
चक्रो ब्रूते—'मैवम् । यदि बहिर्निःसृत्य योद्धव्यं तदा दुर्गाश्रयण-
मेव निष्प्रयोजनम् ।

फिर मेघवर्णने आ कर प्रणाम करके कहा—'हे महाराज ! कृपा कर देख
लीजिये । अब शत्रु गढ़के द्वारमें आ पहुँचा है। इसलिये आपकी आज्ञासे बाहर
निकल कर अपना पराक्रम दिखलाऊँ जिससे महाराजके ऋणसे मैं उनंतर हो
जाऊँ।' चकवा बोला—'ऐसा मत कर, जो बाहर निकल कर हम लड़ेंगे तो
गढ़का आसरा ही वृथा है।

अपरं च,—
विषमो हि यथा नक्रः सलिलान्निर्गतोऽवशः ।
वनाद्विनिर्गतः शूरः सिंहोऽपि स्याच्छृगालवत् ॥ १३५ ॥

और दूसरे—जैसे भयंकर मगर पानीसे बाहर निकल कर विवश हो जाता है,
वैसे ही वनसे निकल कर पराक्रमी सिंह भी गीदड़के समान हो जाता है ॥१३५॥

देव ! स्वयं गत्वा दृश्यतां युद्धम् ।
महाराज ! आप चल कर युद्ध देखिये;

यतः,—
पुरस्कृत्य बलं राजा योधयेदवलोकयन् ।
स्वामिनाधिष्ठितः श्वापि किं न सिंहायते ध्रुवम् ?' ॥१३६॥

क्योंकि—राजा आप देखता हुआ सेनाको आगे करके लड़ावे, क्योंकि
स्वामीसे लहकाया हुआ कुत्ता भी क्या सचमुच सिंहकी भाँति बल नहीं दिखाता
है ? अर्थात् अवश्य ही दिखाता है ॥ १३६ ॥

अथ ते सर्वे दुर्गद्वारं गत्वा महाहवं कृतवन्तः । अपरेद्युश्चित्र-
वर्णो राजा गृध्रमुवाच—'तात ! स्वप्रतिज्ञातमधुना निर्वाहय ।'
गृध्रो ब्रूते—'देव ! शृणु तावत्;

१ 'नक्रः स्वस्थानमासाद्य गजेन्द्रमपि कर्षति'—मगर पानीमें रह कर बडे हाथी-
कोभी खींच सकता है, पर बाहर निकलनेसे तो विवश हो जाता है.

-१३८ ] गढ़ जीतनेके उपायका कथन २०९
पीछे उन सभीने गढ़के द्वार पर जा कर बड़ा घनघोर युद्ध किया । दूसरे
दिन राजा चित्रवर्णगिद्धसे बोला—'प्यारे ! अब अपनी प्रतिज्ञाका पालन कर ।'
गिद्ध बोला—'महाराज ! पहले सुन लीजिये, —
अकालसहमत्यल्पं मूर्खव्यसनिनायकम् ।
अगुप्तं भीरुयोद्धं च दुर्गव्यसनमुच्यते ॥ १३७ ॥
बहुत काल तक घेरा न सहने वाला अर्थात् कच्चा, अत्यंत स्वल्प सैन्य-
युक्त, मूर्ख और मद्यपानादि दोषयुक्त नायक जिसका हो, जिसकी अच्छे प्रकारसे
रक्षा नहीं की गई हो और जिसमें कायर और डरपोक योद्धा हों वह गढ़की
विपत्ति कही गई है ॥ १३७ ॥
तत्तावदत्र नास्ति ।
सो बात तो यहाँ नहीं है ।
उपजापश्चिरारोधोऽवस्कन्दस्तीव्रपौरुषम् ।
दुर्गस्य लङ्घनोपायाश्चत्वारः कथिता इमे ॥ १३८ ॥
गढ़की भीतरी सेनामें किसी भेदियेको भेज कर फूट करा देना, बहुत काल
तक चारों ओरसे घेरे पड़े रहना, बार बार शत्रु पर चढ़ाई करना और अत्यन्त
साहस दिखलाना ये चार गढ़के जीतनेके उपाय हैं ॥ १३८ ॥
अत्र यथाशक्ति क्रियते यत्नः ( कर्णे कथयति । ) एवमेवम् ।'
ततोऽनुदित एव भास्करे चतुर्ष्वपि दुर्गद्वारेषु वृत्ते युद्धे दुर्गा-
भ्यन्तरगृहेष्वेकदा काकैरग्निर्निक्षिप्तः । ततः 'गृहीतं गृहीतं दुर्गम्'
इति कोलाहलं श्रुत्वा सर्वतः प्रदीप्ताग्निमवलोक्य राजहंस-
सैनिका दुर्गवासिनश्च सत्वरं हृदं प्रविष्टाः ।
इसमें शक्तिके अनुसार उपाय किया जाता है। (कानमें कहने लगा) इस
प्रकार इस प्रकार ।' फिर एक दिन सूर्यके विना ही निकले गढ़के चारों द्वारों पर
घनघोर युद्ध होने पर गढ़के भीतरके डेरोंमें कौओंने आग लगा दी । फिर
तो “गढ़को ले लिया ले लिया” यह हुर्रा सुन कर चारों ओर आगको धधकती
हुई देख कर राजहंसकी सेनाके शूर वीर और गढ़के रहने वाले शीघ्र सरोवरमें
घुस गये ।
हि० १४

युद्ध और जी ले कर भागना इन बातोंको जैसा बन पड़े अपनी शक्तिके अनुसार

२१० हितोपदेशः [ विग्रहः १३९-

यतः,—
सुमन्त्रितं सुविक्रान्तं सुयुद्धं सुपलायितम् ।
कार्यकाले यथाशक्ति कुर्यान्न तु विचारयेत्' ॥ १३९ ॥
अवसरके आ पड़ने पर अच्छा उपाय, अच्छी भाँति पराक्रम, भली भाँति
युद्ध और जी ले कर भागना इन बातोंको जैसा बन पड़े अपनी शक्तिके अनुसार
करना ही चाहिये और सोचना नहीं चाहिये' ॥ १३९ ॥
राजहंसः स्वभावान्मन्दगतिः सारसद्वितीयश्च चित्रवर्णस्य
सेनापतिना कुक्कुटेनागत्य वेष्टितः । हिरण्यगर्भः सारसमाह-
'सारस सेनापते ! ममानुरोधादात्मानं कथं व्यापादयिष्यसि ?
त्वमधुना गन्तुं शक्तः । तद्गत्वा जलं प्रविश्यात्मानं परिरक्ष ।
अस्मत्पुत्रं चूडामणिनामानं सर्वज्ञसंमत्या राजानं करिष्यसि ।'
सारसो ब्रूते—'देव ! न वक्तव्यमेवं दुःसहं वचः । यावच्चन्द्रार्कौ
दिवि तिष्ठतस्तावद्विजयतां देवः । अहं देवदुर्गाधिकारी । मन्मां-
सासृग्विलिप्तेन द्वारवर्त्मना प्रविशतु शत्रुः ।
राजहंस तो स्वभावहीसे धीरे चलने वाला था और उसके साथी सारसको
चित्रवर्णके सेनापति मुर्गेने आ कर घेर लिया । हिरण्यगर्भने सारससे कहा-'हे
सेनापति सारस ! हमारे पीछे अपनेको क्यों मारता है ? तू अभी जा सकता है;
इसलिये जा कर, जलमें घुस और अपनी रक्षा कर । मेरे चूड़ामणि नाम बेटेको
सर्वज्ञकी संमतिसे राजा कर दीजिये ।' सारसने कहा-'महाराज ! इस प्रकार
कठोर वचन नहीं कहना चाहिये । जब तक आकाशमें सूर्य और चन्द्रमा ठहरे
हुए हैं तब तक महाराजकी जय हो । महाराज ! मैं गढ़का अधिकारी हूँ,
मेरे मांस और लोहूसे सने हुए द्वारके मार्गसे भलेही शत्रु घुस जाय;
अपरं च,—
दाता क्षमी गुणग्राही स्वामी दुःखेन लभ्यते ।'
और दूसरे-दाता, क्षमावान्, गुणग्राही स्वामी दुःखसे मिलता है ।'
राजाह—'सत्यमेवैतत् ।
राजा बोला-'यह तो ठीक ही है;
किंतु,—
शुचिर्दक्षोऽनुरक्तश्च जाने भृत्योऽपि दुर्लभः' ॥ १४० ॥

-१४४ ] सारसकी स्वामिभक्तिमें परायणता २११
परंतु,-मैं जानता हूँ कि नेक, सच्चा, चतुर और स्वामीको चाहने वाला
सेवक तो मिलना भी कठिन है ॥ १४० ॥
सारसो ब्रूते—'शृणु देव !
सारसने कहा-'महाराज ! सुनिये,—
यदि समरमपास्य नास्ति मृत्यो-
र्भयमिति युक्तमितोऽन्यतः प्रयातुम् ।
अथ मरणमवश्यमेव जन्तोः,
किमिति मुधा मलिनं यशः क्रियेत ? ॥ १४१ ॥
जो युद्धको छोड़ कर जानेमें मृत्युका भय न हो तो यहाँसे अन्य कोई स्थानमें
चले जाना ठीक है; पर प्राणीका मरण अवश्य ही है इसलिये जा कर क्यों
वृथा अपना यश मलिन करना चाहिये ? ॥ १४१ ॥
अन्यच्च,—
भवेऽस्मिन्पवनोद्भ्रान्तवीचिविभ्रमभङ्गुरे ।
जायते पुण्ययोगेन परार्थे जीवितव्ययः ॥ १४२ ॥
और दूसरे-वायुसे उठी हुई ल्हरियोंके खेलके समान क्षणभंगुर इस असार
संसारमें पराये उपकारके लिये प्राणोंका त्याग बड़े पुण्यसे होता है ॥ १४२ ॥
स्वाम्यमात्यश्च राष्ट्रं च दुर्गं कोशो बलं सुहृत् ।
राज्याङ्गानि प्रकृतयः पौराणां श्रेणयोऽपि च ॥ १४३ ॥
और स्वामी, मंत्री, राज्य, गढ़, कोश, सेना, मित्र और पुरवासियोंके समूह
ये राज्यके अंग हैं ॥ १४३ ॥
देव ! त्वं च स्वामी सर्वथा रक्षणीयः ।
और हे महाराज ! आप स्वामी हैं, आपकी सर्वथा रक्षा करनी चाहिये;
यतः,—
प्रकृतिः स्वामिनं त्यक्त्वा समृद्धापि न जीवति ।
अपि धन्वन्तरिर्वैद्यः किं करोति गतायुषि ? ॥ १४४ ॥
क्योंकि—स्वामीको त्याग कर प्रजा, सब ऐश्वर्यसे युक्त भी नहीं जी
सकती है, जैसे आयु का अंत होने पर धन्वन्तरि वैद्य भी क्या कर सकता
है? ॥ १४४ ॥

२१२ हितोपदेशः [ विग्रहः १४५-

अपरं च,—
नरेशे जीवलोकोऽयं निमीलति निमीलति ।
उदेत्युदीयमाने च रवाविव सरोरुहम्' ॥ १४५ ॥
और दूसरे-सूर्यके उदय तथा अस्त होनेसे कमलके समान, राजाके मरने पर
यह जीवलोक मरता है और उदय होने (जीने) पर जीता है' ॥ १४५ ॥
अथ कुक्कुटेनागत्य राजहंसस्य शरीरे खरतरनखाघातः कृतः ।
तदा सत्वरमुपसृत्य सारसेन स्वदेहान्तरितो राजा जले क्षिप्तः ।
अथ कुक्कुटैर्नखप्रहारजर्जरीकृतेन सारसेन कुक्कुटसेना बहुशो
हताः । पश्चात्सारसोऽपि चञ्चुप्रहारेण विभिद्य व्यापादितः ।
अथ चित्रवर्णो दुर्गं प्रविश्य दुर्गावस्थितं द्रव्यं ग्राहयित्वा बन्दि-
भिर्जयशब्दैरानन्दितः स्वस्कन्धावारं जगाम ॥
फिर मुर्गेने आ कर राजहंसके शरीर पर बड़े तीखे तीखे नोहट्टे मारे । तब
सारसने तुरन्त पास जा कर और अपनी देहसे छिपा कर राजाको जलमें फेंक
दिया । फिर मुर्गोंके नोहट्टोंसे व्याकुल हुए सारसने मुर्गोंकी सेनाको बहुत मारा ।
पीछे सारस भी चोंचोंके प्रहारसे छिद कर मारा गया । फिर चित्रवर्ण गढ़में
घुस कर गढ़में धरे हुए द्रव्यको लिवा कर बंदिजनोंके जय जय शब्दसे प्रसन्न
होता हुआ अपने डेरेमें चला गया ।
अथ राजपुत्रैरुक्तम्—'तस्मिन् राजबले स पुण्यवान् सारस एव,
येन स्वदेहत्यागेन स्वामी रक्षितः ।
फिर राजकुमारोंने कहा-'उस राजाकी सेनामें एक सारस ही पुण्यात्मा था
जिसने अपनी देहको त्याग करके स्वामीकी रक्षा की ।
उक्तं चैतत्,—
जनयन्ति सुतान् गावः सर्वा एव गवाकृतीन् ।
विषाणोल्लिखितस्कन्धं काचिदेव गवां पतिम्' ॥ १४६ ॥
और ऐसा कहा है कि-सभी गायें गौके आकारके समान बछड़ोंको जनती हैं,
परन्तु दोनों सींगोंसे ऊंचे दीखते हुए कंधे वाले साँड़को विरलीही जनती है' १४६
विष्णुशर्मोवाच—'स तावद्विद्याधरीपरिजनः स्वर्गसुखमनुभवतु
महासत्त्वः ।

[Page Header]
-१४९ ] रणवीरों की प्रशंसा २१३

[Page Content]
विष्णुशर्मा बोले-'वह महात्मा सारस विद्याधरियोंके परिवारके साथ स्वर्गका
सुख भोगें ।
तथा चोक्तम्,—
आहवेषु च ये शूराः स्वाम्यर्थे त्यक्तजीविताः ।
भर्तृभक्ताः कृतज्ञाश्च ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ १४७ ॥
जैसा कहा है-जिन शूर वीरोंने संग्राममें अपने स्वामीके लिये प्राणत्याग किए
हैं वे स्वामीके भक्त तथा राजाके उपकारको मानने वाले मनुष्य स्वर्गको पाते हैं ॥
यत्र तत्र हतः शूरः शत्रुभिः परिवेष्टितः ।
अक्षयाँल्लभते लोकान् यदि क्लीब्यं न गच्छति ॥ १४८ ॥
और जिस किसी स्थानमें शत्रुओंसे घिर कर मरा हुआ शूर जो युद्धभूमि
छोड़ नहीं भागा तो वह अमर लोकोंको पाता है ॥ १४८ ॥
विग्रहः श्रुतो भवद्भिः ?' । राजपुत्रैरुक्तम्,—'श्रुत्वा सुखिनो भूता
वयम् ।'
'आपने विग्रह सुन लिया ।' राजपुत्रोंने कहा-'हम सुन कर बहुत संतुष्ट हुए ।'
विष्णुशर्माऽब्रवीत्—'अपरमप्येवमस्तु—
विग्रहः करितुरङ्गपत्तिभि-
र्नो कदापि भवतां महीभुजाम् ।
नीतिमन्त्रपवनैः समाहताः
संश्रयन्तु गिरिगह्वरं द्विषः' ॥ १४९ ॥
इति हितोपदेशे विग्रहो नाम तृतीयः कथासंग्रहः समाप्तः ।
विष्णुशर्मा बोले-'यह और भी हो-आपके समान महाराजाओंका कभी
हाथी घोड़े और पैदल आदि सेनासे संग्राम न हो और नीतिके मंत्ररूपी
पवनसे उड़ाये गये शत्रु पर्वतकी गुफामें ( जा कर ) आसरा लें' ॥ १४९ ॥
पं० रामेश्वरभट्टका किया हुआ हितोपदेश ग्रंथके विग्रह नामक तीसरे
भागका भाषा अनुवाद समाप्त हुआ. शुभम्.

पुनः कथारम्भकाले राजपुत्रैरुक्तम्—‘आर्य ! विग्रहः श्रुतो-

हितोपदेशः
संधिः ४
पुनः कथारम्भकाले राजपुत्रैरुक्तम्—‘आर्य ! विग्रहः श्रुतो-
ऽस्माभिः, संधिरधुनाऽभिधीयताम् ।’
फिर कथाके आरम्भमें राजपुत्रोंने कहा-‘हे गुरुजी ! हम विग्रह सुन चुके;
अब सन्धि सुनाइये ।’
विष्णुशर्मणोक्तम्—‘श्रूयताम्; संधिमपि कथयामि यस्या-
यमाद्यः श्लोकः—
वृत्ते महति संग्रामे राज्ञोर्निहतसेनयोः ।
स्थेयाभ्यां गृध्रचक्राभ्यां वाचा संधिः कृतः क्षणात्’ ॥ १ ॥
विष्णुशर्माने कहा-‘सुनिये, संधि भी कहता हूँ कि जिसके आदिका यह
वाक्य है—दोनों राजाओंकी सेनाके मरने पर और घनघोर युद्ध होने पर
गिद्ध और चकवेने पंच बन कर शीघ्र मेल करा दिया’ ॥ १ ॥
राजपुत्रा ऊचुः—‘कथमेतत् ?’ । विष्णुशर्मा कथयति—
राजपुत्र बोले-‘यह कथा कैसी है ?’ विष्णुशर्मा कहने लगे ।—
कथा १
[ हंस और मोरके मेलके लिए कहानी १ ]
ततस्तेन राजहंसेनोक्तम्—‘केनास्मद्दुर्गे निक्षिप्तोऽग्निः ? किं पार-
क्येण किं वाऽस्मद्दुर्गवासिना केनापि विपक्षप्रयुक्तेन ?’ । चक्रो
ब्रूते—‘देव ! भवतो निष्कारणबन्धुरसौ मेघवर्णः सपरिवारो न
दृश्यते। तन्मन्ये तस्यैव विचेष्टितमिदम् ।’ राजा क्षणं विचि-
न्त्याह—‘अस्ति तावदेव मम दुर्दैवमेतत् ।
फिर उस राजहंसने कहा-‘हमारे किलेमें किसने आग लगाई है ? शत्रुने
अथवा शत्रुसे सिखाये हुए किसी हमारे गढ़के रहनेवालेने ?’ चकवा बोला—
महाराज ! आपका अकृत्रिम बन्धु वह मेघवर्ण अपने परिवारसहित नहीं दीखता

कहीं अच्छे प्रकारसे किया हुआ काम भी भाग्यके वशसे बिगड़ जाता है' ॥२॥

-४ ] हितकारी वचन को मानना लाभदायक है २१५

है इसलिये यह उसीका काम दीख पड़ता है।' राजाने क्षण भर सोच कर
कहा-'यह मेरी प्रारब्ध ही फूटी है;
तथा चोक्तम्,—
अपराधः स दैवस्य न पुनर्मन्त्रिणामयम् ।
कार्यं सुचरितं कापि दैवयोगाद्विनश्यति'॥ २ ॥
जैसा कहा है—वह प्रारब्धका दोष है, मंत्रियोंका कुछ दोष नहीं है, क्योंकि
कहीं अच्छे प्रकारसे किया हुआ काम भी भाग्यके वशसे बिगड़ जाता है' ॥२॥
मन्त्री ब्रूते—'उक्तमेवैतत्,—
मंत्री बोला—ऐसा भी कहा है,—
विषमां हि दशां प्राप्य दैवं गर्हयते नरः ।
आत्मनः कर्मदोषांश्च नैव जानात्यपण्डितः ॥ ३ ॥
मूर्ख मनुष्य बुरी दशाको पा कर भाग्यकी निन्दा करता है और यह अपने
कर्मका दोष ऐसा नहीं मानता ॥ ३ ॥
अपरं च,—
सुहृदां हितकामानां यो वाक्यं नाभिनन्दति ।
स कूर्म इव दुर्बुद्धिः काष्ठाद्भ्रष्टो विनश्यति'॥ ४ ॥
और दूसरे-जो मनुष्य हितकारी मित्रोंका वचन नहीं मानता है वह मूर्ख
काठसे गिरे हुए कछुएके समान मरता है' ॥ ४ ॥
राजाह—'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति—
राजा बोला-'यह कथा कैसी है ?' मंत्री कहने लगा ।—
कथा २
[ दो हंस और उनका स्नेही कछुएकी कहानी २ ]
‘अस्ति मगधदेशे फुल्लोत्पलाभिधानं सरः । तत्र चिरं संकट-
विकटनामानौ हंसौ निवसतः । तयोर्मित्रं कम्बुग्रीवनामा कूर्मश्च
प्रतिवसति । अथैकदा धीवरैरागत्य तत्रोक्तम्-‘तदत्रास्माभिर-
द्योषित्वा प्रातर्मत्स्यकूर्मादयो व्यापादयितव्याः ।' तदाकर्ण्य कूर्मो
हंसावाह—'सुहृदौ ! श्रुतोऽयं धीवरालापः; अधुना किं मया कर्त-

२१६ हितोपदेशः [ संधिः ५-
व्यम् ?।' हंसावाहतुः—'ज्ञायताम् । पुनस्तावत्प्रातर्यदुचितं तत्कर्त्त-
व्यम् ।' कूर्मो ब्रूते—'मैवम् । यतो दृष्टव्यतिकरोऽहमत्र ।
'मगध देशमें फुल्लोत्पल नाम एक सरोवर है । वहाँ बहुत कालसे संकट और
विकट नामक दो हंस रहा करते थे और उन दोनोंका मित्र एक कम्बुग्रीव नाम
कछुआ रहता था । फिर एक दिन धीवरोंने वहाँ आ कर कहा कि—आज हम
यहाँ रह कर प्रातःकाल मछली कछुआ आदि मारेंगे' यह सुन कर कछुआ हंसोंसे
कहने लगा—'मित्रो ! धीवरोंकी यह बात मैने सुनी । अब मुझे क्या करना
उचित है ? हंसोंने कहा-'समझलो । फिर प्रातःकाल जो उचित हो सो करना।'
कछुआ बोला-'ऐसा मत कहो, क्योंकि मैं यहाँ पर भय देख चुका हूं।
तथा चोक्तम्,—
अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिस्तथा ।
द्वावेतौ सुखमेधेते यद्भविष्यो विनश्यति ॥ ५ ॥
जैसा कहा है-अनागतविधाता याने आगे होने वाली बातको प्रथमही सोचने
वाला और प्रत्युत्पन्नमति अर्थात् अवसर जान कर कार्य करने वाला इन दोनोंने
आनंद भोगे हैं और यद्भविष्य मारा गया' ॥ ५ ॥
तावाहतुः—'कथमेतत् ?' । कूर्मः कथयति—
वे दोनों बोले-'यह कथा कैसे है ?' कछुआ कहने लगा ।—
कथा ३
[ दूरदर्शी दो मच्छ और यद्भविष्य मच्छकी कहानी ३ ]
'पुरास्मिन्नेव सरस्येवंविधेषु धीवरेषूपस्थितेषु मत्स्यत्रयेणालो-
चितम् । तत्रानागतविधाता नामैको मत्स्यः । तेनालोचितम्—
'अहं तावज्जलाशयान्तरं गच्छामि' इत्युक्त्वा हृदान्तरं गतः ।
अपरेण प्रत्युत्पन्नमतिनाम्ना मत्स्येनाभिहितम्—' भविष्यदर्थे प्रमा-
णाभावात् कुत्र मया गन्तव्यम् ? तदुत्पन्ने यथाकार्यं तदनुष्ठेयम् ।
'पहले इसी सरोवर पर जब ऐसे ही धीवर आये थे तब तीन मछलियोंने विचार
किया । और उनमें अनागतविधाता नाम एक मच्छ था, उसने विचार किया-'मैं
तो दूसरे सरोवरको जाता हूँ।' इस प्रकार कह कर वह दूसरे सरोवरको चला गया ।

-६] आपत्ति में शीघ्र उपाय से सफलता २१७
फिर दूसरे प्रत्युत्पन्नमति नाम मच्छने कहा- 'होने वाले काममें निश्चय न होनेसे मैं
कहाँ जाऊँ ? इसलिये काम आ पड़ने पर जैसा होगा वैसा करूंगा।
तथा चोक्तम्, —
उत्पन्नामापदं यस्तु समाधत्ते स बुद्धिमान् ।
वणिजो भार्यया जारः प्रत्यक्षे निहुतो यथा' ॥ ६ ॥
जैसा कहा है— जो उत्पन्न हुई आपत्तिका उपाय करता है वह बुद्धिमान् है,
जैसे कि बनियेकी स्त्रीने प्रत्यक्षमें जारको छुपा लिया' ॥ ६ ॥
यद्द्रविष्यः पृच्छति— 'कथमेतत् ?' । प्रत्युत्पन्नमतिः कथ-
यति—
यद्द्रविष्य पूछने लगा-'यह कथा कैसी है?' प्रत्युत्पन्नमति कहने लगा।—
कथा ४
[ एक बनिया, उसकी व्यभिचारिणी स्त्री और उसके
यारकी कहानी ४]
'पुरा विक्रमपुरे समुद्रदत्तो नाम वणिगस्ति । तस्य रत्नप्रभा
नाम गृहिणी स्वसेवकेन सह सदा रमते । अथैकदा सा रत्नप्रभा
तस्य सेवकस्य मुखे चुम्बनं ददती समुद्रदत्तेनावलोकिता । ततः
सा बन्धकी सत्वरं भर्तुः समीपं गत्वाह — 'नाथ ! एतस्य सेवकस्य
महती निर्वृतिः । यतोऽयं चौरिकां कृत्वा कर्पूरं खादतीति
मयाऽस्य मुखमाघ्राय ज्ञातम् ।' तथा चोक्तम्- "आहारो
द्विगुणः स्त्रीणाम्” इत्यादि ।' तच्छ्रुत्वा सेवकेन प्रकुप्योक्तम्—
'नाथ ! यस्य स्वामिनो गृह एतादृशी भार्या तत्र सेवकेन कथं
स्थातव्यं यत्र प्रतिक्षणं गृहिणी सेवकस्य मुखं जिघ्रति ।' ततो-
ऽसावुत्थाय चलितः साधुना यत्नात्प्रबोध्य धृतः । अतोऽहं
ब्रवीमि-“उत्पन्नामापदम्” इत्यादि ॥'
'किसी समय विक्रमपुरमें समुद्रदत्त नाम एक बनिया रहता था । उसकी
रत्नप्रभा नाम स्त्री अपने सेवकके संग सदा व्यभिचार किया करती थी। पीछे एक
दिन उस रत्नप्रभाको उस सेवकका मुखचुम्बन करते हुए समुद्रदत्तने देख
लिया । फिर वह व्यभिचारिणी शीघ्र अपने पतिके पास जा कर बोली-