हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 233, कुल 302 में से
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-१४९ ] रणवीरों की प्रशंसा २१३
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विष्णुशर्मा बोले-'वह महात्मा सारस विद्याधरियोंके परिवारके साथ स्वर्गका
सुख भोगें ।
तथा चोक्तम्,—
आहवेषु च ये शूराः स्वाम्यर्थे त्यक्तजीविताः ।
भर्तृभक्ताः कृतज्ञाश्च ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ १४७ ॥
जैसा कहा है-जिन शूर वीरोंने संग्राममें अपने स्वामीके लिये प्राणत्याग किए
हैं वे स्वामीके भक्त तथा राजाके उपकारको मानने वाले मनुष्य स्वर्गको पाते हैं ॥
यत्र तत्र हतः शूरः शत्रुभिः परिवेष्टितः ।
अक्षयाँल्लभते लोकान् यदि क्लीब्यं न गच्छति ॥ १४८ ॥
और जिस किसी स्थानमें शत्रुओंसे घिर कर मरा हुआ शूर जो युद्धभूमि
छोड़ नहीं भागा तो वह अमर लोकोंको पाता है ॥ १४८ ॥
विग्रहः श्रुतो भवद्भिः ?' । राजपुत्रैरुक्तम्,—'श्रुत्वा सुखिनो भूता
वयम् ।'
'आपने विग्रह सुन लिया ।' राजपुत्रोंने कहा-'हम सुन कर बहुत संतुष्ट हुए ।'
विष्णुशर्माऽब्रवीत्—'अपरमप्येवमस्तु—
विग्रहः करितुरङ्गपत्तिभि-
र्नो कदापि भवतां महीभुजाम् ।
नीतिमन्त्रपवनैः समाहताः
संश्रयन्तु गिरिगह्वरं द्विषः' ॥ १४९ ॥
इति हितोपदेशे विग्रहो नाम तृतीयः कथासंग्रहः समाप्तः ।
विष्णुशर्मा बोले-'यह और भी हो-आपके समान महाराजाओंका कभी
हाथी घोड़े और पैदल आदि सेनासे संग्राम न हो और नीतिके मंत्ररूपी
पवनसे उड़ाये गये शत्रु पर्वतकी गुफामें ( जा कर ) आसरा लें' ॥ १४९ ॥
पं० रामेश्वरभट्टका किया हुआ हितोपदेश ग्रंथके विग्रह नामक तीसरे
भागका भाषा अनुवाद समाप्त हुआ. शुभम्.