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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 223

-१२१] बची सेनाके साथ विंध्याचल जानेकी तैयारी २०३
और दूसरे-दुःख-हर्षको, हिमऋतु शरदको, सूर्य अँधेरेको, कृतघ्नता उपकार
अथवा पुण्यको, अभीष्टका लाभ शोकको, नीति आपत्तिको और अनीति
अतिसमृद्ध ( बड़ी हुई ) संपत्तिको भी नाश कर देती है ॥ ११८ ॥
ततो मयाप्यालोचितम्—'प्रज्ञाहीनोऽयं राजा । नो चेत्कथं
नीतिशास्त्रकथाकौमुदीं वागुल्काभिस्तिमिरयति ?
तब मैंने भी सोच लिया था कि यह राजा बुद्धिहीन है; नहीं तो कैसे
नीतिशास्त्रकी कथारूपी चाँदनीको वाणीरूपी उल्कापातोंसे धुँधली करता ?
यतः,—
यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ? ।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ?' ॥ ११९ ॥
क्योंकि—जिस मनुष्यको अपनी बुद्धि नहीं है उसको शास्त्र क्या करता है ?
जैसे दोनों आँखोंसे रहित अन्धे मनुष्यको दर्पण क्या करेगा ?' ॥ ११९ ॥
इत्यालोच्य तूष्णीं स्थितः । अथ राजा बद्धाञ्जलिरह—'तात !
अस्त्ययं ममापराधः । इदानीं यथावशिष्टबलसहितः प्रत्यावृत्य
विन्ध्याचलं गच्छामि तथोपदिश ।' गृध्रः स्वगतं चिन्तयति—
'क्रियतामत्र प्रतीकारः ।
यह जीमें विचार कर चुपका-सा हो बैठा था । पीछे राजा हाथ जोड़ कर
बोला—'प्यारे ! यह मेरा अपराध हुआ । अब जैसे बची हुई सेनाके साथ लौट
कर विंध्याचल पहुँच जाऊँ वैसा उपाय बता ।' गिद्ध अपने जीमें सोचने
लगा,—'इसका कुछ ना कुछ उपाय करना चाहिये ।
यतः,—
देवतासु गुरौ गोषु राजसु ब्राह्मणेषु च ।
नियन्तव्यः सदा कोपो बालवृद्धातुरेषु च' ॥ १२० ॥
क्योंकि—देवता, गुरु, गाय, राजा, ब्राह्मण, बालक, बूढ़ा और रोगी
इन पर क्रोध रोकना चाहिये' ॥ १२० ॥
मन्त्री प्रहस्य ब्रूते—'देव ! मा भैषीः । समाश्वसिहि शृणु देव !
मंत्री ( यह अपने जीमें विचार कर ) हँस कर बोला—'महाराज ! मत डरिये
और धीरज धरिये, हे महाराज ! सुनिये,—