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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 302 में से

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पृष्ठ 219

-१०७ ] शत्रु की जांच करनेकी युक्ति १९९
अयोध्यामें चूड़ामणि नाम एक क्षत्रिय रहता था। उस धनके अभिलाषीने
बड़े क्लेशसे भगवान् महादेवजीकी बहुत काल तक आराधना की। फिर जब वह
क्षीणपाप हो गया तब महादेवजीकी आज्ञासे कुबेरने स्वप्नमें दर्शन दे कर आज्ञा
दी कि-जो तुम आज प्रातःकाल और क्षौर कराके लाठी हाथमें ले कर घरमें
एकांतमें छुप कर बैठोगे तो इसी आँगनमें एक भिखारीको आया हुआ देखोगे।
जब तुम उसे निर्दय हो कर लाठीकी प्रहारोंसे मारोगे तब वह सुवर्णका कलश हो
जायगा । उससे तुम जीवनपर्यन्त सुखसे रहोगे ।' फिर वैसा करने पर वही
बात हुई । वहाँ क्षौर करनेके लिये बुलाया हुआ नाई सोचने लगा-‘अरे ! धन
पानेका यही उपाय है, मैं भी ऐसा क्यों न करूँ ?' फिर उस दिनसे नाई वैसे ही
लाठी हाथमें लिये हमेशा छिप कर भिखारीके आनेकी राह देखता रहता था।
एक दिन उसने भिखारीको पा लिया और लाठीसे मार डाला । अपराधसे
उस नाईको भी राजाके पुरुषोंने मार डाला । इसलिये मैं कहता हूं, "किसीको
पुण्यसे मिल गई" इत्यादि ।'
राजाह—
‘पुरावृत्तकथोद्गारैः कथं निर्णीयते परः ।
स्यान्निष्कारणबन्धुर्वा किं वा विश्वासघातकः ॥ १०६ ॥
राजा बोला-‘पहले हो गई कथाओंके कहनेसे नवीन आया हुआ कैसे
निश्चय किया जाय कि यह अकृत्रिम बांधव है अथवा विश्वासघाती है ॥१०६॥
यातु । प्रस्तुतमनुसंधीयताम् । मलयाधित्यकायां चेच्चित्रवर्णस्त-
दधुना किं विधेयम् ?' मन्त्री वदति—'देव ! आगतप्रणिधिमुखा-
न्मया श्रुतं तन्महामन्त्रिणो गृध्रस्योपदेशे, यच्चित्रवर्णेनानादरः
कृतः । ततोऽसौ मूढो जेतुं शक्यः ।
इसे जाने दो। अब जो उपस्थित है उसका विचार करो। मलय पर्वतके
ऊपर जो चित्रवर्ण ठहरा है इसलिये अब क्या करना चाहिये ?' मंत्री बोला-‘हे
महाराज ! लौट कर आये हुए दूतके मुँहसे मैंने यह सुना है कि उस महामंत्री
गृध्रके उपदेश पर चित्रवर्णने अनादर किया है। फिर उस मूर्खको जीत सकते हैं।
तथा चोक्तम्,—
लुब्धः क्रूरोऽलसोऽसत्यः प्रमादी भीरुरस्थिरः ।
मूढो योधावमन्ता च सुखच्छेद्यो रिपुः स्मृतः ॥ १०७ ॥