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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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२१२ हितोपदेशः [ विग्रहः १४५-

अपरं च,—
नरेशे जीवलोकोऽयं निमीलति निमीलति ।
उदेत्युदीयमाने च रवाविव सरोरुहम्' ॥ १४५ ॥
और दूसरे-सूर्यके उदय तथा अस्त होनेसे कमलके समान, राजाके मरने पर
यह जीवलोक मरता है और उदय होने (जीने) पर जीता है' ॥ १४५ ॥
अथ कुक्कुटेनागत्य राजहंसस्य शरीरे खरतरनखाघातः कृतः ।
तदा सत्वरमुपसृत्य सारसेन स्वदेहान्तरितो राजा जले क्षिप्तः ।
अथ कुक्कुटैर्नखप्रहारजर्जरीकृतेन सारसेन कुक्कुटसेना बहुशो
हताः । पश्चात्सारसोऽपि चञ्चुप्रहारेण विभिद्य व्यापादितः ।
अथ चित्रवर्णो दुर्गं प्रविश्य दुर्गावस्थितं द्रव्यं ग्राहयित्वा बन्दि-
भिर्जयशब्दैरानन्दितः स्वस्कन्धावारं जगाम ॥
फिर मुर्गेने आ कर राजहंसके शरीर पर बड़े तीखे तीखे नोहट्टे मारे । तब
सारसने तुरन्त पास जा कर और अपनी देहसे छिपा कर राजाको जलमें फेंक
दिया । फिर मुर्गोंके नोहट्टोंसे व्याकुल हुए सारसने मुर्गोंकी सेनाको बहुत मारा ।
पीछे सारस भी चोंचोंके प्रहारसे छिद कर मारा गया । फिर चित्रवर्ण गढ़में
घुस कर गढ़में धरे हुए द्रव्यको लिवा कर बंदिजनोंके जय जय शब्दसे प्रसन्न
होता हुआ अपने डेरेमें चला गया ।
अथ राजपुत्रैरुक्तम्—'तस्मिन् राजबले स पुण्यवान् सारस एव,
येन स्वदेहत्यागेन स्वामी रक्षितः ।
फिर राजकुमारोंने कहा-'उस राजाकी सेनामें एक सारस ही पुण्यात्मा था
जिसने अपनी देहको त्याग करके स्वामीकी रक्षा की ।
उक्तं चैतत्,—
जनयन्ति सुतान् गावः सर्वा एव गवाकृतीन् ।
विषाणोल्लिखितस्कन्धं काचिदेव गवां पतिम्' ॥ १४६ ॥
और ऐसा कहा है कि-सभी गायें गौके आकारके समान बछड़ोंको जनती हैं,
परन्तु दोनों सींगोंसे ऊंचे दीखते हुए कंधे वाले साँड़को विरलीही जनती है' १४६
विष्णुशर्मोवाच—'स तावद्विद्याधरीपरिजनः स्वर्गसुखमनुभवतु
महासत्त्वः ।