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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 230, कुल 302 में से

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पृष्ठ 230

२१० हितोपदेशः [ विग्रहः १३९-

यतः,—
सुमन्त्रितं सुविक्रान्तं सुयुद्धं सुपलायितम् ।
कार्यकाले यथाशक्ति कुर्यान्न तु विचारयेत्' ॥ १३९ ॥
अवसरके आ पड़ने पर अच्छा उपाय, अच्छी भाँति पराक्रम, भली भाँति
युद्ध और जी ले कर भागना इन बातोंको जैसा बन पड़े अपनी शक्तिके अनुसार
करना ही चाहिये और सोचना नहीं चाहिये' ॥ १३९ ॥
राजहंसः स्वभावान्मन्दगतिः सारसद्वितीयश्च चित्रवर्णस्य
सेनापतिना कुक्कुटेनागत्य वेष्टितः । हिरण्यगर्भः सारसमाह-
'सारस सेनापते ! ममानुरोधादात्मानं कथं व्यापादयिष्यसि ?
त्वमधुना गन्तुं शक्तः । तद्गत्वा जलं प्रविश्यात्मानं परिरक्ष ।
अस्मत्पुत्रं चूडामणिनामानं सर्वज्ञसंमत्या राजानं करिष्यसि ।'
सारसो ब्रूते—'देव ! न वक्तव्यमेवं दुःसहं वचः । यावच्चन्द्रार्कौ
दिवि तिष्ठतस्तावद्विजयतां देवः । अहं देवदुर्गाधिकारी । मन्मां-
सासृग्विलिप्तेन द्वारवर्त्मना प्रविशतु शत्रुः ।
राजहंस तो स्वभावहीसे धीरे चलने वाला था और उसके साथी सारसको
चित्रवर्णके सेनापति मुर्गेने आ कर घेर लिया । हिरण्यगर्भने सारससे कहा-'हे
सेनापति सारस ! हमारे पीछे अपनेको क्यों मारता है ? तू अभी जा सकता है;
इसलिये जा कर, जलमें घुस और अपनी रक्षा कर । मेरे चूड़ामणि नाम बेटेको
सर्वज्ञकी संमतिसे राजा कर दीजिये ।' सारसने कहा-'महाराज ! इस प्रकार
कठोर वचन नहीं कहना चाहिये । जब तक आकाशमें सूर्य और चन्द्रमा ठहरे
हुए हैं तब तक महाराजकी जय हो । महाराज ! मैं गढ़का अधिकारी हूँ,
मेरे मांस और लोहूसे सने हुए द्वारके मार्गसे भलेही शत्रु घुस जाय;
अपरं च,—
दाता क्षमी गुणग्राही स्वामी दुःखेन लभ्यते ।'
और दूसरे-दाता, क्षमावान्, गुणग्राही स्वामी दुःखसे मिलता है ।'
राजाह—'सत्यमेवैतत् ।
राजा बोला-'यह तो ठीक ही है;
किंतु,—
शुचिर्दक्षोऽनुरक्तश्च जाने भृत्योऽपि दुर्लभः' ॥ १४० ॥

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