हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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है इसलिये यह उसीका काम दीख पड़ता है।' राजाने क्षण भर सोच कर
कहा-'यह मेरी प्रारब्ध ही फूटी है;
तथा चोक्तम्,—
अपराधः स दैवस्य न पुनर्मन्त्रिणामयम् ।
कार्यं सुचरितं कापि दैवयोगाद्विनश्यति'॥ २ ॥
जैसा कहा है—वह प्रारब्धका दोष है, मंत्रियोंका कुछ दोष नहीं है, क्योंकि
कहीं अच्छे प्रकारसे किया हुआ काम भी भाग्यके वशसे बिगड़ जाता है' ॥२॥
मन्त्री ब्रूते—'उक्तमेवैतत्,—
मंत्री बोला—ऐसा भी कहा है,—
विषमां हि दशां प्राप्य दैवं गर्हयते नरः ।
आत्मनः कर्मदोषांश्च नैव जानात्यपण्डितः ॥ ३ ॥
मूर्ख मनुष्य बुरी दशाको पा कर भाग्यकी निन्दा करता है और यह अपने
कर्मका दोष ऐसा नहीं मानता ॥ ३ ॥
अपरं च,—
सुहृदां हितकामानां यो वाक्यं नाभिनन्दति ।
स कूर्म इव दुर्बुद्धिः काष्ठाद्भ्रष्टो विनश्यति'॥ ४ ॥
और दूसरे-जो मनुष्य हितकारी मित्रोंका वचन नहीं मानता है वह मूर्ख
काठसे गिरे हुए कछुएके समान मरता है' ॥ ४ ॥
राजाह—'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति—
राजा बोला-'यह कथा कैसी है ?' मंत्री कहने लगा ।—
कथा २
[ दो हंस और उनका स्नेही कछुएकी कहानी २ ]
‘अस्ति मगधदेशे फुल्लोत्पलाभिधानं सरः । तत्र चिरं संकट-
विकटनामानौ हंसौ निवसतः । तयोर्मित्रं कम्बुग्रीवनामा कूर्मश्च
प्रतिवसति । अथैकदा धीवरैरागत्य तत्रोक्तम्-‘तदत्रास्माभिर-
द्योषित्वा प्रातर्मत्स्यकूर्मादयो व्यापादयितव्याः ।' तदाकर्ण्य कूर्मो
हंसावाह—'सुहृदौ ! श्रुतोऽयं धीवरालापः; अधुना किं मया कर्त-