हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें-११५ ] राज्य पाने पर राजाका कर्तव्यकर्तव्य २०१
इसलिये उस प्रमादीकी सेनाको जा कर जैसा अवसर मिले रातदिन हमारे
सेनापति लूट खसोट कर मारे । ऐसा करनेसे चित्रवर्णकी सेना और बहुतसे
सेनापति मारे गये; फिर चित्रवर्ण विकल हो कर अपने मंत्री दूरदर्शीसे कहने
लगा—'प्यारे ! किसलिये हमारा अनादर करता है ? क्या कभी मैंने तेरा
अनादर किया है ?
तथा चोक्तम्,—
न राज्यं प्राप्तमित्येवं वर्तितव्यमसांप्रतम् ।
श्रियं ह्यविनयो हन्ति जरा रूपमिवोत्तमम् ॥ ११२ ॥
जैसा कहा है—राज्य मिल गया, यह जान कर अनुचित व्यवहार नहीं करना
चाहिये । क्योंकि कठोरता निश्चय करके लक्ष्मीको ऐसे नाशमें मिला देती है जैसे
सुन्दर रूप-रंगको बुढ़ापा ॥ ११२ ॥
अपि च,—
दक्षः श्रियमधिगच्छति पथ्याशी कल्यतां सुखमरोगी ।
अभ्यासी विद्यान्तं धर्मार्थयशांसि च विनीतः ॥ ११३ ॥
और भी-चतुर पुरुष लक्ष्मीको, सुन्दर और हलका भोजन करने वाला
नीरोगताको, रोगहीन सुखको, अभ्यासी विद्याके अंतको, और सुशील अर्थात्
नम्रतादिगुणोंसे युक्त मनुष्य धर्म, धन और यशको पाता है ॥ ११३ ॥
गृध्रोऽवदत्—'देव ! शृणु,—
गिद्ध बोला—'महाराज ! सुनिये,—
अविद्वानपि भूपालो विद्यावृद्धोपसेवया ।
परां श्रियमवाप्नोति जलासन्नतस्तरुर्यथा ॥ ११४ ॥
मूर्ख राजा भी पण्डितोंकी सेवासे जलके समीपके वृक्षके समान उत्तमोत्तम
संपत्तिको पाता है ॥ ११४ ॥
अन्यच्च,—
पानं स्त्री मृगया द्यूतमर्थदूषणमेव च ।
वाग्दण्डयोश्च पारुष्यं व्यसनानि महीभुजाम् ॥ ११५ ॥
और दूसरे-मद्य आदिका पीना, परस्त्रीका संग, आखेट, जुआ, अन्यायसे
पराया धन लेना, और वचन तथा दंडमें रुखाई और कठोरता ये राजाओंके
अवगुण कहे हैं; अर्थात् उनका त्याग करना अवश्य है ॥ ११५ ॥