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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 236, कुल 302 में से

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पृष्ठ 236

२१६ हितोपदेशः [ संधिः ५-
व्यम् ?।' हंसावाहतुः—'ज्ञायताम् । पुनस्तावत्प्रातर्यदुचितं तत्कर्त्त-
व्यम् ।' कूर्मो ब्रूते—'मैवम् । यतो दृष्टव्यतिकरोऽहमत्र ।
'मगध देशमें फुल्लोत्पल नाम एक सरोवर है । वहाँ बहुत कालसे संकट और
विकट नामक दो हंस रहा करते थे और उन दोनोंका मित्र एक कम्बुग्रीव नाम
कछुआ रहता था । फिर एक दिन धीवरोंने वहाँ आ कर कहा कि—आज हम
यहाँ रह कर प्रातःकाल मछली कछुआ आदि मारेंगे' यह सुन कर कछुआ हंसोंसे
कहने लगा—'मित्रो ! धीवरोंकी यह बात मैने सुनी । अब मुझे क्या करना
उचित है ? हंसोंने कहा-'समझलो । फिर प्रातःकाल जो उचित हो सो करना।'
कछुआ बोला-'ऐसा मत कहो, क्योंकि मैं यहाँ पर भय देख चुका हूं।
तथा चोक्तम्,—
अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिस्तथा ।
द्वावेतौ सुखमेधेते यद्भविष्यो विनश्यति ॥ ५ ॥
जैसा कहा है-अनागतविधाता याने आगे होने वाली बातको प्रथमही सोचने
वाला और प्रत्युत्पन्नमति अर्थात् अवसर जान कर कार्य करने वाला इन दोनोंने
आनंद भोगे हैं और यद्भविष्य मारा गया' ॥ ५ ॥
तावाहतुः—'कथमेतत् ?' । कूर्मः कथयति—
वे दोनों बोले-'यह कथा कैसे है ?' कछुआ कहने लगा ।—
कथा ३
[ दूरदर्शी दो मच्छ और यद्भविष्य मच्छकी कहानी ३ ]
'पुरास्मिन्नेव सरस्येवंविधेषु धीवरेषूपस्थितेषु मत्स्यत्रयेणालो-
चितम् । तत्रानागतविधाता नामैको मत्स्यः । तेनालोचितम्—
'अहं तावज्जलाशयान्तरं गच्छामि' इत्युक्त्वा हृदान्तरं गतः ।
अपरेण प्रत्युत्पन्नमतिनाम्ना मत्स्येनाभिहितम्—' भविष्यदर्थे प्रमा-
णाभावात् कुत्र मया गन्तव्यम् ? तदुत्पन्ने यथाकार्यं तदनुष्ठेयम् ।
'पहले इसी सरोवर पर जब ऐसे ही धीवर आये थे तब तीन मछलियोंने विचार
किया । और उनमें अनागतविधाता नाम एक मच्छ था, उसने विचार किया-'मैं
तो दूसरे सरोवरको जाता हूँ।' इस प्रकार कह कर वह दूसरे सरोवरको चला गया ।