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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 220

२०० हितोपदेशः [ विग्रहः १०८-
वैसा कहा है—लोभी, कपटी, आलसी, झूठा, कायर, अधीर, मूर्ख और
योद्धाओंका अनादर करने वाला शत्रु सहजमें नाश किया जा सकता हैं ॥१०७॥
ततोऽसौ यावदस्मद्दुर्गद्वाररोधं न करोति तावन्नद्यद्रिवनवर्त्मसु
तद्बलानि हन्तुं सारसादयः सेनापतयो नियुज्यन्ताम् ।
फिर वह जब तक हमारे गढ़का द्वार न रोके तब तक पर्वत और वनके
मार्गोंमें उसकी सेनाको मारनेके लिये सारस आदिको सेनापति नियुक्त कर दीजिये ।
तथा चोक्तम्,—
दीर्घवर्त्मपरिश्रान्तं नद्यद्रिवनसंकुलम् ।
घोराग्निभयसंत्रस्तं क्षुत्पिपासादितं तथा ॥ १०८ ॥
वैसा कहा है—राजाको लंबे मार्गसे थकी हुई, नदी, पर्वत और वनके
कारण रुकी हुई भयंकर अग्निसे डरी हुई तथा भूख-प्याससे व्याकुल हुई ॥१०८॥
प्रमत्तं भोजनव्यग्रं व्याधिदुर्भिक्षपीडितम् ।
असंस्थितमभूयिष्ठं वृष्टिवातसमाकुलम् ॥ १०९ ॥
( मद्यपानादिसे ) मतवाली, भोजनमें आसक्त, रोग तथा अकालसे पीडित तथा
आश्रयरहित, थोड़ीसी, तथा वर्षा और ( शीतल ) वायुसे घबराई हुई ॥ १०९ ॥
पङ्कपांशुजलाच्छन्नं सुव्यस्तं दस्युविद्रुतम् ।
एवंभूतं महीपालः परसैन्यं विघातयेत् ॥ ११० ॥
कीचड़, धूलि और जलसे व्याप्त, आपत्तिसे निकलनेके यत्नमें व्याकुल, चौर
आदिके उपद्रवोंसे युक्त ऐसी शत्रु की सेनाको नाश करना चाहिये ॥ ११० ॥
अन्यच्च,—
अवस्कन्दभयाद्राजा प्रजागरकृतश्रमम् ।
दिवासुप्तं समाहन्यान्निद्राव्याकुलसैनिकम् ॥ १११ ॥
और दूसरे—घिर जानेकी शंकाके कारण रातके अधिक जागनेसे थकी हुई,
दिनमें सोती हुई, निद्रासे व्याकुल शत्रु की सेनाको राजा मार डाले ॥ १११ ॥
अतस्तस्य प्रमादिनो बलं गत्वा यथावकाशं दिवानिशं घ्नन्त्वस्म-
त्सेनापतयः ।' तथानुष्ठिते चित्रवर्णस्य सैनिकाः सेनापतयश्च
बहवो निहताः । ततश्चित्रवर्णो विषण्णः स्वमन्त्रिणं दूरदर्शिनमाह—
'तात ! किमित्यस्मदुपेक्षा क्रियते किं काप्यवानयो ममास्ति ?