हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें-६] आपत्ति में शीघ्र उपाय से सफलता २१७
फिर दूसरे प्रत्युत्पन्नमति नाम मच्छने कहा- 'होने वाले काममें निश्चय न होनेसे मैं
कहाँ जाऊँ ? इसलिये काम आ पड़ने पर जैसा होगा वैसा करूंगा।
तथा चोक्तम्, —
उत्पन्नामापदं यस्तु समाधत्ते स बुद्धिमान् ।
वणिजो भार्यया जारः प्रत्यक्षे निहुतो यथा' ॥ ६ ॥
जैसा कहा है— जो उत्पन्न हुई आपत्तिका उपाय करता है वह बुद्धिमान् है,
जैसे कि बनियेकी स्त्रीने प्रत्यक्षमें जारको छुपा लिया' ॥ ६ ॥
यद्द्रविष्यः पृच्छति— 'कथमेतत् ?' । प्रत्युत्पन्नमतिः कथ-
यति—
यद्द्रविष्य पूछने लगा-'यह कथा कैसी है?' प्रत्युत्पन्नमति कहने लगा।—
कथा ४
[ एक बनिया, उसकी व्यभिचारिणी स्त्री और उसके
यारकी कहानी ४]
'पुरा विक्रमपुरे समुद्रदत्तो नाम वणिगस्ति । तस्य रत्नप्रभा
नाम गृहिणी स्वसेवकेन सह सदा रमते । अथैकदा सा रत्नप्रभा
तस्य सेवकस्य मुखे चुम्बनं ददती समुद्रदत्तेनावलोकिता । ततः
सा बन्धकी सत्वरं भर्तुः समीपं गत्वाह — 'नाथ ! एतस्य सेवकस्य
महती निर्वृतिः । यतोऽयं चौरिकां कृत्वा कर्पूरं खादतीति
मयाऽस्य मुखमाघ्राय ज्ञातम् ।' तथा चोक्तम्- "आहारो
द्विगुणः स्त्रीणाम्” इत्यादि ।' तच्छ्रुत्वा सेवकेन प्रकुप्योक्तम्—
'नाथ ! यस्य स्वामिनो गृह एतादृशी भार्या तत्र सेवकेन कथं
स्थातव्यं यत्र प्रतिक्षणं गृहिणी सेवकस्य मुखं जिघ्रति ।' ततो-
ऽसावुत्थाय चलितः साधुना यत्नात्प्रबोध्य धृतः । अतोऽहं
ब्रवीमि-“उत्पन्नामापदम्” इत्यादि ॥'
'किसी समय विक्रमपुरमें समुद्रदत्त नाम एक बनिया रहता था । उसकी
रत्नप्रभा नाम स्त्री अपने सेवकके संग सदा व्यभिचार किया करती थी। पीछे एक
दिन उस रत्नप्रभाको उस सेवकका मुखचुम्बन करते हुए समुद्रदत्तने देख
लिया । फिर वह व्यभिचारिणी शीघ्र अपने पतिके पास जा कर बोली-