हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें-१४४ ] सारसकी स्वामिभक्तिमें परायणता २११
परंतु,-मैं जानता हूँ कि नेक, सच्चा, चतुर और स्वामीको चाहने वाला
सेवक तो मिलना भी कठिन है ॥ १४० ॥
सारसो ब्रूते—'शृणु देव !
सारसने कहा-'महाराज ! सुनिये,—
यदि समरमपास्य नास्ति मृत्यो-
र्भयमिति युक्तमितोऽन्यतः प्रयातुम् ।
अथ मरणमवश्यमेव जन्तोः,
किमिति मुधा मलिनं यशः क्रियेत ? ॥ १४१ ॥
जो युद्धको छोड़ कर जानेमें मृत्युका भय न हो तो यहाँसे अन्य कोई स्थानमें
चले जाना ठीक है; पर प्राणीका मरण अवश्य ही है इसलिये जा कर क्यों
वृथा अपना यश मलिन करना चाहिये ? ॥ १४१ ॥
अन्यच्च,—
भवेऽस्मिन्पवनोद्भ्रान्तवीचिविभ्रमभङ्गुरे ।
जायते पुण्ययोगेन परार्थे जीवितव्ययः ॥ १४२ ॥
और दूसरे-वायुसे उठी हुई ल्हरियोंके खेलके समान क्षणभंगुर इस असार
संसारमें पराये उपकारके लिये प्राणोंका त्याग बड़े पुण्यसे होता है ॥ १४२ ॥
स्वाम्यमात्यश्च राष्ट्रं च दुर्गं कोशो बलं सुहृत् ।
राज्याङ्गानि प्रकृतयः पौराणां श्रेणयोऽपि च ॥ १४३ ॥
और स्वामी, मंत्री, राज्य, गढ़, कोश, सेना, मित्र और पुरवासियोंके समूह
ये राज्यके अंग हैं ॥ १४३ ॥
देव ! त्वं च स्वामी सर्वथा रक्षणीयः ।
और हे महाराज ! आप स्वामी हैं, आपकी सर्वथा रक्षा करनी चाहिये;
यतः,—
प्रकृतिः स्वामिनं त्यक्त्वा समृद्धापि न जीवति ।
अपि धन्वन्तरिर्वैद्यः किं करोति गतायुषि ? ॥ १४४ ॥
क्योंकि—स्वामीको त्याग कर प्रजा, सब ऐश्वर्यसे युक्त भी नहीं जी
सकती है, जैसे आयु का अंत होने पर धन्वन्तरि वैद्य भी क्या कर सकता
है? ॥ १४४ ॥