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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

परिभाषाकी जांच १२३
उल्लेख किया जाता है तब उसमें दोनों ही तट आ जाते हैं और
इसलिये सिन्धु नदीके पश्चिम तटका सारा प्रदेश निसर्गतः ही
“सिन्धुस्थान” का ही अंश है और इसलिये वह हमारी परि-
भाषाके अन्दर आ जाता है। सिंधु नदीके इस पश्चिम तटप्रदेश-
पर जो लोग रहते हैं वे निःसन्देह प्राचीन सिंधुओंके वंशज हैं
और उन्होंने आजतक अपना और अपनी भूमिका प्राचीन नाम
नहीं बदला है-वे आज भी सहस्रों वर्ष पूर्वकी तरह "सिंधुदेश"
की संतान "सिन्धी" ही कहलाते हैं। दूसरी बात यह है कि मुख्य
भूमिके आस-पासकी भूमि भी मुख्य भूमिके नामसे ही पुकारी
जाती है और तीसरी बात यह है कि सिंधुके उस पार रहनेवाले
ये हिन्दू परम्परासे इस हिन्दुस्थानको ही अपनी पितृ-भू और
पुण्य-भू मानते आये हैं। उन्होंने कभी अपने रहनेके छोटेसे
प्रदेशको ही “पितृ-भू” और “पुण्य-भू” मान बैठनेकी मातृ-
घातक कल्पना करनेका पाप नहीं किया। प्रत्युत हमारी जो
काशी, कैलास और गंगोत्री है वही काशी, कैलास और गंगोत्री
उनकी भी है। वैदिक कालसे ही वे भारतवर्षके एक प्रधान अंग
हैं। रामायण और महाभारतमें “सिन्धु शिविसौवीरों” का उल्लेख
है और वे महान् हिन्दू जातीय संघ और राष्ट्रके अंग ही हैं। वे
हमारे राष्ट्र, जाति और संस्कृतिके ही हैं; इसलिये वे हिन्दू हैं
और हमारी परिभाषाके अन्दर आते हैं।
परन्तु यदि कोई इस बातको न भी माने कि किसी नदीका
अपनी हदके अन्दर होना उसके दोनों तटोंका उस सीमाके अंदर

१२४, हिन्दुत्व
होना है तो भी उससे हमारी परिभाषामें कोई दोष नहीं आता;
और, और भी कुछ कारण हैं जिनसे यह परिभाषा हमारे सिन्धी
भाइयोंपर पूरे तौरपर घटती है। सिंधु नदीके उस पार रहनेवाले
इन सिन्धी भाइयोंके अतिरिक्त, हमारे और भी बहुतसे हिन्दू
भाई हैं जो संसारके भिन्न भिन्न भागोंमें बसे हुए हैं। कोई समय
आ सकता है जब हमारे ये उपनिवेशवासी हिन्दू जो आज भी उन
उन उपनिवेशोंमें संख्या, व्यापार, योग्यता और बुद्धिमत्तामें बड़े
माने जाते हैं, किसी किसी प्रदेशके मालिक बन सकते हैं और
अपना स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर सकते हैं। परन्तु हिन्दुस्थानके
बाहर किसी अन्य देशमें जा बसनेसे ही कोई हिन्दू क्या अहिन्दू
हो जायगा ? कदापि नहीं; कारण, हिन्दुत्वका प्रथम लक्षण यह
नहीं है कि वह हिन्दुस्थानके बाहर रहनेवाला मनुष्य न हो, बल्कि
यह है कि वह और उसके वंशज जहां कहीं भी हों हिन्दुस्थान-
को अपनी पितृ-भूमि मानें। और यह केवल मानने न मानने-
का ही प्रश्न नहीं है। जिस किसीके पूर्वज हिन्दुस्थानसे जाकर
कहीं बाहर बसे होंगे उसको यह मानना ही पड़ेगा कि हमारी
पितृभूमि हिन्दुस्थान है। इस तरह हिन्दुत्वकी इस परिभाषामें
हिन्दू-जातिके चारों ओर फैलनेकी पूरी गुंजायश है। हमारे जो
लोग भिन्न भिन्न उपनिवेशोंमें बसे हुए हैं वे अपनी सारी सामर्थ्य
लगाकर 'भारत' को "महाभारत" या "हिन्दुस्थान" को "विराट
हिन्दुस्थान" निर्माण करनेका उद्योग बराबर करते रहें और
हिन्दू-संस्कृतिमें जो कुछ उत्तम है उसे मानव-जातिके उद्धारमें

परिभाषाकी जांच • १२५
लगाते रहें, एक ध्रुवसे दूसरे ध्रुवतक इस समग्र पृथ्वीके
लोगोंको अपने सद्गुणोंसे सम्पन्न करें और अन्य देशोंमें जहां
जो कुछ उत्तम हो उसे लेकर उससे अपने देशको भी समृद्ध करें।
हिन्दुत्व हिमालयके गरुड़ोंके पंख नहीं काटता प्रत्युत उनकी
उड़ानकी शक्तिको बढ़ाता है। जबतक, हे हिन्दू भाइयो, तुम
अपने हिंदुस्थान देशको अपनी पितृ-भू और पुण्यभू मानते हो
और हिन्दू-जातिकी संस्कृति और हिंदू-जातिके रक्तका अभिमान
तुम्हारे अन्दर है, तबतक आगे बढ़े चलो, संसारमें अपने उप-
निवेश कायम किये चलो। हिंदुत्वकी भौगोलिक चतुःसीमा
पृथ्वीकी चतुःसीमा है।
अब हमारी परिभाषामें जाति-संबंधी जो लक्षण है, हम नहीं
समझते कि कोई भी उसपर कोई आपत्ति कर सकता है। जिस
प्रकार इंग्लैंडमें इबेरियन, केल्ट, आंग्ल, सैक्सन, डेन आदि भिन्न
भिन्न लोग, परस्पर विवाह-संबंधी जातीय प्रतिबंधोंके रहते
हुए भी, एक जाति बन गये हैं; उसी प्रकार प्राचीन आर्य, कोलार,
द्राविड़ तथा अन्य लोगोंमें परस्पर-विवाह-संबंधी जातीय प्रति-
बंधोंके रहते हुए भी वे एक जाति हुए हैं और अब वे प्रतिबन्ध
प्रतिबंध नहीं माने जा सकते। हम पिछले परिच्छेदोंमें इस विष-
यका विस्तारके साथ प्रतिपादन करके यह दिखला चुके हैं कि
विवाहके जिन प्रतिलोम और अनुलोम प्रकारोंको हमारे धर्म-
शास्त्रमें स्थान मिला हुआ है उन्हींसे यह प्रमाणित हो जाता
है कि उसी समय ये भिन्न भिन्न वंश एक दूसरेमें इस हदतक मिल

१२६ , हिन्दुत्व
गये थे कि संपूर्ण राष्ट्र-शरीरमें एक ही रक्त प्रवाहित होता
था। जहां रूढ़िने विरोध किया वहां स्वयं प्रकृतिने उन बांधोंको
तोड़ डाला। आर्योंमें अकेले भीमसेन ही नहीं हुए जिन्होंने हिडिं-
बासे प्रणय किया हो। भील और संथाल जातिकी दस-बीस लड़-
कियोंमेंसे भी यदि किसी लड़कीको उठाकर किसी कन्यापाठ-
शालामें छोड़ दें तो उसको आकृति या नैतिक संस्कारसे कोई
यह पता लगाना चाहे कि यह किस जातिकी है तो वह नहीं लगा
सकेगा। आर्य, कोलार, द्रविड़ आदि वंशोंके संमिश्रणसे जो
जाति उत्पन्न हुई वह ठीक ही है कि आर्य, कोलार या द्रविड़ न
कहलाकर, हिंदू-जाति कहलाती है—अर्थात् वह जाति जो एक
ही मातृ-भूमिकी संतति और एक ही पुण्यभूकी उपासक है।
इसलिये संथाल, धोवर, भील, पंचम, नमःशूद्र और ऐसी अन्य
सब जातियां हिंदू ही मानी जाती हैं। यह हिंदुस्थान जितना
आर्यों के पूर्वपुरुषोंका देश है उससे यदि अधिक नहीं तो कमसे
कम उतना ही वह उनका भी है। उनमें वही हिंदू-रक्त है, उनमें
वही हिन्दू-संस्कृति है। उनमें कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अभी
किसी कट्टर पुराणप्रिय हिंदू-सम्प्रदायके पूर्ण प्रभावके अन्दर
नहीं आये हैं तौभी वे ऐसे देवताओं और साधु-सन्तोंका नाम
लेते हैं, ऐसे ही "धर्म" का पालन करते हैं जो देवता, साधु
और धर्म-संप्रदाय केवल इसी देशसे सम्बद्ध हैं और इसलिये यह
भूमि उनकी केवल पितृभू नहीं, पुण्यभू भी है।
हिन्दुत्वका जो सांस्कृतिक पहलू है उसपर भी कोई आपत्ति
१७

परिभाषाकी जांच १२७

[न]हीं हो सकती; पर “हिन्दुत्व” और “हिन्दू-धर्म” इन दोनोंको
[ए]क ही वस्तु मानकर लोग भ्रममें पड़ जाते हैं। हम इन दोनों
कल्पनाओंके बीच जो भेद है उसे स्पष्ट रूपसे दिखला चुके हैं
और यह भी बतला चुके हैं कि हिन्दूधर्मको 'सनातनधर्म'
कहना या हिन्दुत्वको हिन्दूधर्म कहना ये—दोनों बातें ठीक नहीं
हैं। यह जो दोहरी गलती होती है कि हिन्दुत्वको हिन्दूधर्म
समझा जाता है और हिन्दुत्व तथा हिन्दूधर्मसे सनातनधर्म
संप्रदाय माना जाता है, इससे सनातनेतर धर्मसंप्रदाय चिढ़ते
हैं और कुछ लोग इस भ्रमका भण्डा फोड़नेके बदले एक दूसरी,
और वह भी बड़ी भारी, गलती करते हैं जो अपने हिन्दू होनेका
दावा ही उठा लेते हैं। हमें आशा है कि हमारी हिन्दुत्वकी इस
परिभाषासे इस तरहकी गलती करनेकी किसीके लिये भी गुंजा-
यश न रहेगी। उसी प्रकार यह परिभाषा सत्यके सुदृढ़ आधार-
पर खड़ी होनेसे इसे अखिल हिन्दू-समाजके समझदार लोग
मान लेंगे, परन्तु अबतक इस प्रश्नके सामान्य विवेचनमें हम कोई
किसी समाजका उदाहरण लेकर जांच न कर सके सो अब
करते हैं। सबसे पहले अपने सिखसंघका उदाहरण लीजिये।
कोई भी सिख इतना मूर्ख न होगा जो सिन्धुस्थानको—आसिंधु
सिंधुपर्यंता भारतभूको अपनी पितृ-भूमि न माने—जहां वैदिक
कालसे अबतक उसके पूर्वपुरुष जीये, जहां रहकर उन्होंने
भजन किये और जहां उनकी समाधि लगी। दूसरी बात, उनके
शरीरमें भी उतना ही हिन्दूरक्त है जितना मद्रास या बंगालके

१२८ हिन्दुत्व
किसी हिन्दूमें। महाराष्ट्र और बंगालके हिन्दुओंमें आर्योंके
रक्तके साथ वहां बसनेवाली जातियोंका भी रक्त मिला हुआ
है। परन्तु सिख तो अभिमानके साथ यह दावा कर सकते हैं
कि हम तो उन्हीं प्राचीन सिन्धुओंके ही प्रत्यक्ष वंशज हैं, और
हिन्दू-जीवनकी यह गंगा नीचे आकर बहने लगनेके पूर्व ही उस
गंगाके उद्गम स्थानमें हमारा जन्म हुआ है। तीसरी बात, हिन्दू-
संस्कृतिकी संपत्ति बढ़ानेमें उनका भी हाथ है और इसलिये हिन्दू-
संस्कृतिके हमारी तरह वे भी अधिकारी हैं। कारण सरस्वती
विद्या और कलाकी अधिष्ठात्री देवी मानी जानेके पूर्व पञ्जाबमें
एक नदी थी। आज भी हिन्दुस्थानभरमें लाखों-करोड़ों हिन्दू वही
स्तुति गाते हैं जो, हे सिख भाइयों, तुम्हारे पूर्वज 'सिन्धू' उस
नदीके किनारे जहां हमारी संस्कृति और सभ्यताका बीज बोया
गया, गाते थे और गाकर अपनी कृतज्ञता ज्ञापन करते थे।
“अंबितमे नदीतमे। देवितमे सरस्वति !” यह सस्वर मंत्र-
पाठ आज भी होता है। वेद जैसे हमारे हैं वैसे ही सिखोंके भी
हैं। वे वेदोंको अपौरुषेय न मानते हों जैसे हम मानते हैं, यह
बात दूसरी है। पर वेदोंमें भी प्रकृतिकी शक्तियोंको स्वकार्य-
साधनमें लगानेके मनुष्यके प्रथम प्रचंड प्रयत्नका वर्णन है—
स्वर्गीय सुधाको अन्धकारमें कैद कर रखनेवाले और इस तरह
आत्मज्योतिकी किरणोंका प्रकाश मानवी मनसे रोककर चैतन्यको
अचेतन बना रखनेवाले अज्ञानके साथ मनुष्यके तुमुल संग्रामका
वर्णन है;इस नाते वेद उनके लिये भी पूज्य हैं। सिखोंका इतिहास
भी अन्य सब हिन्द-समाजोंके समान. यथार्थमें वेदोंसे ही आरंभ

परिभाषाकी जांच १२६
होकर, अयोध्याके राजमहलों और लंकाकी समर-भूमिसे होता हुआ
लहुसे लाहोरकी नींव पड़ती देखता और कपिलवस्तुसे प्रस्थान
करते सिद्धार्थके दर्शन करता, त्रितापदग्ध मनुष्यकी मुक्तिका
उपाय ढूंढनेके लिये गुफाओंमें जा छिपता है। हमारे साथ सिख
भी पृथ्वीराजकी हारपर अश्रुपात करते हैं और हिन्दूके नाते
हिन्दुओंके दुर्भाग्य और दुःखोंका अनुभव करते हैं। उदासी,
निर्मले, गहनगंभीर और सिन्धी सिख संस्कृत भाषाको केवल
अपने पूर्वजोंकी भाषा ही नहीं मानते प्रत्युत उसे अपने देशकी
पवित्र भाषा-देववाणी मानते हैं। अन्य सिखोंको भी इसे अपने
पूर्वजोंकी भाषा और उन गुरुमुखी और पञ्जाबीकी जननी मान-
कर पूजना ही पड़ता है जो गुरुमुखी और पञ्जाबी अभी अपनी
बाल्यावस्थामें हैं और जो जननीके स्तनोंसे ही अपने जीवनका
पोषक रस पान करती हैं। अन्तिम बात यह है कि यह “आसिंधु
सिंधु-पर्यंता” भूमि न केवल उनकी पितृभू है, बल्कि पुण्यभू भी
है। गुरु नानक और गुरु गोविन्द, श्री बंदा और रामसिंह हिन्दु-
स्थानमें ही पैदा हुए और पवित्र हिन्दुस्थानके ही सरोवर अमृतसर
और मुक्तसर हैं, हिन्दुस्थानकी ही भूमि गुरुद्वार और गुरु-
गृह है। सचमुच ही यदि किसी जातिके हिन्दू होनेमें कुछ भी
कोर-कसर नहीं है तो वह सिख-जाति ही है। कारण, ये सिख
सप्तसिन्धुके तटपर रहनेवाले आदि निवासी हैं और “सिन्धु”
अथवा “हिन्दु” के प्रत्यक्ष वंशज हैं। आज जो सिख है वह कल
हिन्दू था और आजका हिन्दू कलका सिख हो सकता है। शेषमें,

१३० हिन्दुत्व
रहन-सहनमें, नित्यके जीवनकी किसी बातमें कोई परिवर्तन हो
जानेसे ही किसीका रक्त या बीज नहीं बदल जाता न इतिहास ही
मिट सकता है।
लाखों सिखोंका हिन्दुत्व स्वयंसिद्ध ही है। सहजधारी,
उदासी, निर्मले, गहनगंभीर और सिंधी सिखोंको, जाति और
राष्ट्रके विचारसे, अपने हिन्दू होनेका पूर्ण अभिमान है। उनके
गुरु जब हिन्दू-सन्तान थे तब उन्हें कोई अहिन्दू कहकर उनका
क्रोध-भाजन हुए बिना कैसे रह सकता है? गुरुग्रन्थको पूज्य
मानकर सनातनी भी पढ़ते हैं और सिख भी। दोनोंके पर्व और
त्योहार एकसे हैं। “तत्खालसा” पन्थके सिख भी अधिकांशमें
अपनेको हिन्दू ही मानते हैं और हिन्दुओंमें हिन्दुओंकी तरह ही
रहते हैं। उनसे जाकर यदि कोई कहे कि आप लोग हिन्दू नहीं
हैं तो वे चकित स्तम्भित हो जायंगे—उनके हृदयको बड़ा भारी
धक्का लगेगा। हमारी जातीय एकता इतनी संशय-रहित, प्रत्यक्ष
और पूर्ण है कि सिख और सनातनियोंमें विवाह-सम्बन्ध भी
होते हैं।
अब यह बात है कि कभी कभी कुछ सिख-नेता यह कहा
करते हैं कि हम हिन्दू नहीं हैं। इसका कारण क्या है? कारण
यह है कि “हिन्दू-धर्म” का अर्थ गलतीसे “सनातनधम” माना
जाने लगा। यदि इन शब्दोंके अर्थके सम्बन्धमें ऐसी गड़बड़ न
होती तो उनकी यह आवाज भी किसीको न सुनायी देती कि
“हम हिन्दू नहीं हैं”। “हिन्दू-धर्म” के अर्थके सम्बन्धमें भ्रम और

परिभाषाकी जांच १३१
उसके अयथार्थ प्रयोगकी इस गड़बड़ीसे यह आत्मघात करनेवाली
प्रवृत्ति उत्पन्न हुई जो समय समयपर भाई भाईमें बैर कराती
है। हम यह स्पष्ट रूपसे दिखला चुके हैं कि हिन्दुत्वकी कसौटी
कोई धार्मिक कल्पना नहीं है। यहां हम फिर वही बात कहते
हैं कि सिख यदि चाहें तो "सनातनधर्म" की उन सब बातोंको,
यहां तक कि वेदोंके अपौरुषेयत्वको भी अन्धविश्वास कहकर
अस्वीकार कर सकते हैं। ऐसा करनेसे वे सनातनी नहीं रहेंगे,
पर तौभी हिन्दुत्वपर उनका पूरा अधिकार रहेगा। हिन्दुत्वकी
हमारी जो परिभाषा है उसी परिभाषाके अनुसार सिख हिन्दू हैं,
किसी धार्मिक कल्पनाके अनुसार नहीं। सम्प्रदायतः वे सिख
हैं, जैसे जैन जैन हैं, लिंगायत लिंगायत हैं या वैष्णव वैष्णव हैं।
पर जाति, राष्ट्र और संस्कृतिके नाते ये सब एक अखण्ड जाति
और राष्ट्र हैं और सनातनसे ही ये सब हिन्दू कहलाते चले आते
हैं। यही हिन्दू नाम ही इनके लिये यथार्थ है। और कोई दूसरा
नाम हमारी जातीय एकताको अभिव्यक्त नहीं कर सकता। भार-
तीय शब्दसे भी वह संपूर्ण भाव नहीं प्रकट होता, यह हम पिछले
परिच्छेदोंमें दिखला ही चुके हैं। भारतीय शब्द इससे अधिक
व्यापक है, उससे भारत या हिन्दुस्थानमें रहनेवाले व्यक्तिमात्रका
बोध होता है—हम सब हिन्दुओंकी जातीय एकताका नहीं। हम
सिख हैं, हिन्दू हैं और भारतीय हैं। हम एक साथ तीनों हैं,
अलग अलग कुछ भी नहीं।
हमारे कुछ सिख भाई जो अपनेको हिन्दुओंसे पृथक् गिनाने

१६२ हिन्दुत्व
लगे, उसका एक कारण तो यह हुआ कि उन्हें यह भय था
कि अपनेको हिन्दू कहनेसे हम सनातनी समझे जायंगे; इसके
साथ ही एक और दूसरा कारण भी हुआ और वह
कारण राजनीतिक है। यहां "विशेष प्रतिनिधित्व" के गुण-
दोषोंकी चर्चा करना उचित न होगा। सिख अपने समाजके
विशिष्ट अधिकारोंकी रक्षा चाहते थे, और यदि मुसलमान अपने
लिये विशिष्ट और सांप्रदायिक प्रतिनिधित्वका अधिकार पा
सकते हैं तो कोई कारण नहीं है कि भारतवर्षके अन्य अल्प-
संख्यक समाज वैसा ही अधिकार न मांगें। परन्तु यह जरूर
है कि सिखोंको अपनी मांगकी पुष्टिके लिये ऐसी निराधार और
आत्मघात करनेवाली दलीलका सहारा न लेना चाहिये था कि
हम हिन्दू नहीं हैं। सिख अपने सांप्रदायिक स्वार्थों की रक्षाके
लिये एक महत् अल्पसंख्यक समाजके नाते विशिष्ट सांप्रदायिक
प्रतिनिधित्व मांग सकते थे और उसमें उन्हें यश भी मिलता,
जैसा कि अब्राह्मणों और अन्य समाजोंको मिला है। इसके लिये
वे हिन्दुत्वका अपना जन्मसिद्ध अधिकार क्यों छोड़ें ? हमारे सिख
भाईयोंका समाज मुसलमानोंके समाजसे किसी प्रकारसे भी कम
महत्त्वका नहीं है—हम हिन्दुओंके लिये तो हिन्दुस्थानके किसी
भी अहिन्दू समाजसे यह समाज अधिक महत्त्वका है। विशिष्ट
और सांप्रदायिक प्रतिनिधित्वसे होनेवाली हानि उतनी बड़ी
नहीं होती जितनी जातीय अलगावकी मनोभावनासे होती है।
सिख, जैन, लिंगायत, अब्राह्मण और ब्राह्मण भी यदि चाहें तो

परिभाषाकी जांच १३३
अपने अपने विशिष्ट और सांप्रदायिक प्रतिनिधित्वके लिये लड़ें,
यदि वे समझते हैं कि इसके बिना उनके समाजकी उन्नति नहीं
हो सकती। कारण, इन समाजोंकी उन्नति ही तो समग्र हिन्दू-
जातिकी उन्नति है। प्राचीन कालमें भी हमारे चार वर्णोंको राज-
सभा और स्थानिक संस्थाओंमें संप्रदायमूलक पृथक् प्रतिनिधित्व
प्राप्त था। सब वर्ण यह विशेष अधिकार भोगते थे, पर इसके
लिये उन्हें हिन्दुत्वसे पृथक् होनेकी आवश्यकता न होती थी।
सिख अपने धर्म-संप्रदायके नाते सिख बने रहें; पर जाति, राष्ट्र
और संस्कृतिके नाते वे हिन्दू हैं और उन्हें हिन्दू ही कहलाना
चाहिये।
जिन वीरोंने सैकड़ोंकी संख्यामें घातकके खड्गपर अपने सिर
कटा दिये पर अपने गुरुका वचन नहीं टाला—"धर्म हेत शाका
जिन किया। सिर दिया पर सिरर न दिया !" क्या वे अपना बीज
भुला देंगे, क्या अपने पूर्वजोंको ही धिक्कारेंगे और एक छोटीसी
चीजके लिये अपना जन्म-सिद्ध अधिकार बेंच देंगे ? ईश्वर ऐसा
न करें ! हिन्दू-जातिमें जो अल्पसंख्यक समाज हैं वे इस बातको
ध्यानमें रखें कि संघमें शक्ति है तो हिन्दुत्व ही वह दृढ़तम और
प्रियतम बन्धन है जिससे हमारी जातिका वास्तविक, चिरस्थायी
और शक्तिशाली संघ बन सकता है। आप यह समझते होंगे कि
अभी तो अलग रहनेमें ही फायदा है, पर इससे इस प्राचीन जाति
और सभ्यताकी अशेष हानि होगी—विशेषकर आपकी हानि
होगी। आपका हित आपके अन्य हिन्दू भाइयोंके हितमें

१३४ हिन्दुत्व
ऐसा मिला हुआ है कि उसे उससे अलग नहीं कर सकते।
अतीतकालकी तरह भविष्यकालमें भी जहां कहीं विदेशियोंका
हिन्दू सभ्यतापर आक्रमण होगा, वहांपर वह आपके लिये भी
उतना ही प्राणान्तक होगा जितना अन्य किसी भी हिन्दू-समाज-
के लिये। अतीतकालकी तरह भविष्यकालमें भी जब कभी यह
समग्र हिन्दू-जाति किसी शिवाजी या रणजीतके नायकत्वमें,
रामचन्द्र या युधिष्ठिरके नायकत्वमें, अथवा किसी अशोक या
अमोघवर्षके नायकत्वमें पूर्ण चैतन्य लाभ कर,विक्रम और गौरव-
के शिखरपर आरोहण करेगी तब उसकी प्रभा आपपर भी उतनी
ही पड़ेगी जितनी हिन्दू-जातिके अन्य किसी भी समाजपर।
इसलिये, प्यारे भाइयो, छोटी छोटी बातोंके लोभमें पड़कर या
इतिहासका विपरीत अर्थ ग्रहण कर हतबुद्धि मत हो। एक बार
एक ग्रन्थीसे मेरी भेंट हुई। था तो ग्रन्थी, पर एक ब्राह्मणके
घरपर डाका डालनेके अपराधमें इसे सजा हुई थी। उस
ब्राह्मणका यह कर्जदार था और इसने उसका खून किया था।
इस ग्रन्थीने मुझसे कहा कि सिख हिन्दू नहीं हैं और किसी
ब्राह्मणको मारनेमें कोई पाप नहीं है; क्योंकि गुरु गोविन्दसिंहके
बेटोंके साथ एक ब्राह्मण रसोइयेने दगा की थी। सौभाग्यवश
वहां एक और सिख महाशय थे। ये भी ग्रन्थी थे और यथार्थमें
ग्रन्थी थे। बड़े बड़े सिख विद्वान इन्हें मानते थे। इन्होंने उस
ग्रन्थीकी बातका खंडन किया। मतिदास आदि ब्राह्मणोंने गुरु
गोविन्दसिंहको आश्रय दिया था और अनेक ब्राह्मणोंने सिखोंकी

परिभाषाकी जांच १३५
सहायता करते करते अपने प्राण अपर्ण किये थे इत्यादि उदाहरण
देकर उन्होंने इसका मुंह बन्द किया। शिवाजी महाराजके साथ
उनके अपने लोगोंने और उनके पोते शाहू महाराजके साथ पिसाल
जो हिन्दू था उसने दगा की। पर इससे क्या शिवाजीने अपनी
जातिको छोड़ दिया या हिन्दुत्वसे नाता तोड़ा ? वीर बंदाके साथ
कितने ही सिखोंने विश्वासघात किया। उसी तरह अंगरेजोंके साथ
खालसाका जो अन्तिम युद्ध हुआ उसमें भी अनेक सिखोंने अपने
पन्थके साथ दगा की। स्वयं गुरु गोविन्दसिंहको उस घमासान
युद्धमें अकेला छोड़कर अनेक सिख भाग गये और उसीसे उस
नराधम “ब्राह्मण” को गुरुके बेटोंके साथ विश्वासघात करनेका
मौका मिला। परन्तु इस ब्राह्मणके पापके कारण हम लोग हिन्दू-
त्वसे ही नाता तोड़ें तो उन विश्वासघातक सिखोंके कारण सिख-
पन्थसे भी नाता तोड़ना पड़ेगा।
हिन्दू-जातिके अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक समाज कुछ
आकाशमें नहीं टपक पड़े हैं। ये सब समाज एक ही ऐसे वृक्षके
फल हैं जिसकी जड़ें एक ही संस्कृति और एक ही भूमिमें बहुत
दूरतक चली गयी हैं। किसी मेमनेको पकड़कर उसे कच्छ
और कृपाण धारण कराके आप उसे सिंह नहीं बना सकते ! गुरु
गोविन्दसिंह जो शहीदों और योद्धाओंकी एक सेना खड़ी कर
सके उसका कारण यही है कि उनके वीर खालसाको जिस
जातिने उत्पन्न किया उसमें यह सामर्थ्य थी। सिंहके बीजसे ही
सिंह पैदा होते हैं। पौधेकी डारपर खिला हुआ फूल यह नहीं

१३६ हिन्दुत्व
कह सकता कि, "देखो मैं कैसे खिलता हूँ, हंसता हूँ और
सुगन्ध देता हूँ, और यह सब इस डंठेसे निकलनेकी बदौलत !
पौधेकी जड़से तो मैं नहीं निकला—उससे मेरा क्या संबंध ?"
जब आप किसी सिखकी ओर संकेत करके कहते हैं कि यह
गुरुका सच्चा अनुयायी था तब आप बिना कहे ही यह कहते हैं
कि यह हिन्दू अपने गुरुका सच्चा अनुयायी निकला, क्योंकि सिख
होनेके पहले वह हिन्दू था और सिख होनेके बाद भी वह हिन्दू ही
रहता है। जबतक सिख अपने सिख-धर्मको सच्चाईके साथ मानते
रहेंगे तबतक वे हिन्दू ही बने रहेंगे; क्योंकि तबतक यह भारत-
भूमि (आसिन्धु सिन्धु-पर्यन्ता) उनकी पितृभू और पुण्यभू
रहेगी। जब वे सिख-धर्मसे ही च्युत हो जायेंगे तभी वे शायद
हिन्दुत्वसे भी च्युत हो सकते हैं।
सिख लोगोंके संबंधमें हमने किसी कदर विस्तारके साथ ही
यहां तक विचार किया। कारण, इस विचारमें जो जो बातें और
दलीलें अपनी परिभाषाको सिखोंके हिन्दुत्वपर घटानेमें पेश की
गयीं वे सब ऐसे ही अन्य सभी अवैदिक पन्थों और संप्रदायोंपर
घटनेवाली हैं। उदाहरणार्थ, देवसमाजी निरीश्वरवादी हैं। परन्तु
निरीश्वरवाद या नास्तिकवादसे हिन्दुत्वका क्या लेना-देना है ?
देवसमाजी इस भूमिको अपने पूर्वपुरुषोंकी भूमि—पितृभू मानते
हैं। उसी प्रकार पुण्यभू भी मानते हैं। इसलिये वे हिन्दू हैं। अब
इतना सब कह चुकनेके बाद यह कहनेकी आवश्यकता ही नहीं
रहती कि आर्यसमाजी भाई भी हिन्दू ही हैं। कारण, हिन्दुत्वके

परिभाषाकी जांच १३७
लक्षण तो उनमें इतनी प्रधानताके साथ विद्यमान हैं कि उन्हें
हिन्दुओंके भी बीचके हिन्दू कहना चाहिये । सचमुच हमें तो एक
भी ऐसा उदाहरण नहीं दिखायी देता जिससे हमारी इस परि-
भाषामें किसी प्रकार अव्याप्तिका दोष आवे ।
एक ही बात ऐसी है, जिसमें कुछ कठिनाई भी मालूम
होती है । उदाहरणार्थ, भगिनी निवेदिता क्या हिन्दू कहला
सकती हैं ? अपवादसे नियम सिद्ध होता है, यह बात यदि सच
है तो वह बात यहां पूरे तौरपर घटती है । हमारी इस देशभक्त
और उदारहृदय बहनने इस आसिन्धु सिन्धुपर्यन्ता भूमिको अपनी
“पितृभू” माना था । इस देशको वे सचमुच ऐसा ही मानती थीं
और यदि हमारा राष्ट्र स्वतंत्र होता तो ऐसी पुण्यात्माको सबसे
पहले हम इस देशके नागरिकत्वका अधिकार भेंट करते । हमारी
परिभाषाके अन्तर्गत प्रथम लक्षण तो इस तरह भगिनी निवेदि-
ताके उदाहरणपर घटता है । पर ऐसे उदाहरणोंमें, परिभाषाके
अन्तर्गत जातीय रक्तका जो दूसरा लक्षण है वह कभी नहीं घट
सकता । तथापि इस कठिनाईमें विवाह-बन्धनका मार्ग खुला
रहता है । कारण यह स्पष्ट ही है कि विवाह-बन्धनसे कोई भी दो
व्यक्ति एक हो जाते हैं। भगिनी निवेदिताके संबंधमें इस प्रकारकी
कोई बात नहीं है, तौभी हिन्दुत्वकी परिभाषामें जो तीसरा लक्षण
है उससे उन्हें हिन्दू कहलानेका अधिकार प्राप्त हो सकता था ।
कारण, उन्होंने हमारी संस्कृतिको स्वीकार किया था और वे
इस भूमिको पुण्यभू मानकर इसकी पूजा करने यहां आयी थीं ।

१३८ हिन्दुत्व
वे अपने अन्तःकरणमें यह अनुभव करती थीं कि मैं हिन्दू हूं, और
यही एकही बात और सब बातोंसे बढ़कर है और हिन्दुत्व परख-
नेकी सच्ची कसौटी है। पर इस बातको भूलनेसे काम न चलेगा
कि हम हिन्दुत्वके लक्षण बहुजन समाजके संस्कारोंकी बुनियाद-
पर ही स्थिर करते हैं। और इसलिये हमें यह कहना पड़ेगा कि
अहिन्दू माता-पितासे उत्पन्न कोई मनुष्य तभी हिन्दू हो सकता
है जब इस देशको स्वदेश मानकर इस देशमें अपना रक्त-संबंध
करे और इस तरह इसे यथार्थमें पितृभू मानकर पूजे, और हमारी
संस्कृतिको मानकर इस देशको अनन्य भावसे अपनी पुण्यभू
माने। इस प्रकारके सम्बंधसे आगे होनेवाली सन्तति निश्चय ही
हिन्दू होगी। इसके आगे अब हम नहीं बढ़ सकते।
परन्तु, हिन्दूके किसी धर्म-सम्प्रदायको माननेसे कोई भी
विदेशी मनुष्य सनातनी, सिख या जैन कहला सकता है और ये
सब धर्म-सम्प्रदाय हिन्दूद्वारा ही प्रवर्त्तित होनेसे ये सब हिन्दू-
धर्म भी माने जाते हैं और इसलिये इनमेंसे किसी भी सम्प्रदायमें
सम्मिलित मनुष्य धर्म-सम्प्रदायके नाते "हिन्दू" कहला भी
सकता है। परन्तु ध्यानमें रखनेकी बात यह है कि इस प्रकारसे
धार्मिक विश्वास और संस्कार-संस्कृतिसे हिन्दू बना हुआ विदेशी
मनुष्य हिन्दुत्वके तीन लक्षणोंमेंसे केवल इस एक ही लक्षणसे
युक्त है अर्थात् केवल किसी हिन्दू-धर्म-सम्प्रदायको माननेसे ही
वह हिन्दू नहीं माना जाता। हमारी मातृ-भूमि और संस्कृतिकी
जो अमूल्य सेवा भगिनी निवेदिता या एनी बेसंट जैसी विदुषियों-

Uploaded By Rajesh Tanti.
हिन्दूजातिकी शक्ति १३६
द्वारा होती है उसके लिये हमारे हृदयमें इतनी कृतज्ञता है, हिन्दू-
जाति किसीके प्रेम-स्पर्शसे इतनी मृदुलहृदय हो जाती है कि
भगिनी निवेदिता अथवा उनके जैसी कोई स्त्री या पुरुष अपने
जीवनको हिन्दू-जातिके जीवनसे समरस कर दें तो हिन्दू-जातिमें
आप ही उनका बेमालूम समावेश हो जाता है । परन्तु इसे सामान्य
नियमका अपवाद ही समझना चाहिये । और कोई सामान्य
नियम बहुत कठोर भी नहीं हो सकता और बहुत मुलायम भी
नहीं हो सकता । जिन कसौटियोंपर हमने हिन्दुत्वकी परिभाषा-
को अबतक कसा उनसे यह स्पष्ट हो गया होगा कि इस परि-
भाषामें ये दोनों बातें हैं और उसमें न अव्याप्तिका दोष है और
न अतिव्याप्तिका ।
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(८)
हिन्दूजातिकी शक्ति
—-❖-—
यहां तक हमने हिन्दुत्व क्या है, इस बातका तटस्थ रहकर
विचार किया और उसमें उपयुक्तताका विचारतक न आने दिया ।
अब सम्पूर्ण विवेचन जब हो चुका है तब इस बातका विचार
करना अप्रासंगिक न होगा कि हिन्दुत्वके इन लक्षणोंसे हमारी
जातिकी शक्ति, अखण्डता और उन्नतिमें कहां तक सहायता मिल
सकती है । क्या ये लक्षण इतनी विस्तृत, इतनी गहरी ओर

१४० हिन्दुत्व
इतनी मजबूत नींव बन सकते हैं कि इस नींवपर हिन्दू-जाति
अपना वह भविष्य-निर्माण कर सकेगी जिससे उसपर होनेवाले
आक्रमणोंका निवारण हो जाय, या हिन्दू-जातिने यह बालूकी
भीत खड़ी की है ?
कुछ प्राचीन राष्ट्रोंने अपने समग्र देशको ही दुर्गकी तरह
सुरक्षित करनेके लिये बड़ी बड़ी दीवारें खड़ी कीं। आज वे
दीवारें टूट-फूट गयी हैं और यत्र-तत्र दिखायी देनेवाले उनके
अवशिष्ट चिह्नोंसे ही उनकी पहचान होती है; और जिन जातियों-
की रक्षाके लिये ये दीवारें खड़ी की गयीं उनका तो कहीं पता
ही नहीं है ! हमारे पुराने पड़ोसी चीनियोंने पीढ़ी-दर-पीढ़ी
परिश्रम करके अपने विशाल साम्राज्यके एक छोरसे दूसरे छोर-
तक एक इतनी बड़ी, इतनी ऊंची और इतनी मजबूत दीवार
खड़ी की कि संसार उसे मानवी प्रयत्नका एक आश्चर्य समझता
है। यह आश्चर्य भी, अपने ही बोझके नीचे दब गया। सभी
मानवी आश्चर्योंकी अन्तमें यही गति होती है ! परन्तु प्राकृतिक
आश्चर्योंको देखो ! जिसकी सब इच्छाएं परितृप्त हो चुकी हों
ऐसे अचल स्थितप्रज्ञ साधुकी तरह यह हिमालय ज्योंका त्यों
खड़ा है। वैदिक कालमें ऋषियोंने इसका जो रूप देखा वही
आज हम भी देख रहे हैं। यह हिमालय ही हमारा कोट (प्राचीर)
है, जिसने इस विशाल देशको एक अभेद्य गढ़ बना दिया है।
आप खाई खनकर गगरियोंसे उनमें पानी भरते हैं और
उसे परिखा कहते हैं। पर देखिये, यहां प्रत्यक्ष वरुण-देव ही

हिन्दू जातिकी शक्ति १४१
अपने एक हाथसे आठ खंड पृथ्वीको एक ओर ठेलकर दूसरे
हाथसे वहां समुद्रपर समुद्र जल छोड़ रहे हैं ! यह हिन्द-महासागर
और इसके ये उपसागर ही हमारी परिखा हैं।
ऐसी हमारी चतुःसीमा है और इससे हमें पृथ्वी और जल
(सागर-तट) दोनोंका लाभ मिल रहा है।
हमारी मातृभूमि ईश्वरकी सबसे लाड़ली कन्या है। इसे उसने
अपने महान् ऐश्वर्यसे सुसंपन्न किया है। इसकी नदियां गंभीर
हैं और उनका प्रवाह अखंड है। इसकी भूमिमें इतनी मृदुता
है कि हलसे वह जोती जाती है और उसके खेत हरे-भरे रहते हैं।
इसकी आवश्यकताएं अत्यन्त अल्प हैं और इसकी प्रकृति इसके
प्रत्येक अभावको पूर्ण करनेके लिये सदा प्रस्तुत है। वनस्प-
तियों और फलफूलोंकी कोई कमी नहीं—स्वयं सूर्यनारायण
प्रकाश और उष्णता प्रदान कर उसे वैभवसंपन्न किये हुए हैं।
उसे हिमाच्छादित देशोंकी लालसा नहीं है—वे उन्हींको मुबारक
हों जो वहां रहते हैं। यहां यदि कभी ऐसी गरमी भी पड़ती है
कि जी घबरा जाय तो वहां इतनी सरदी पड़ती है कि हाथ-पैर
ठिठुर जायं। वहां सरदीसे यदि शारीरिक श्रम अधिक होता
है तो यहां गरमीसे उसकी आवश्यकता ही कम हो जाती है।
उष्ण आहारसे गला भून डालनेकी अपेक्षा, शीतल जलसे तृषा
शांत करनेमें ही इसे अधिक आनंद मिलता है। जिन्हें यह
आनन्द नहीं मिलता वे उसे प्राप्त करनेके प्रयत्नका आनन्द लें
परन्तु जिन्हें यह आनन्द प्राप्त है वे उससे आनन्दित क्यों न हों

१४२ हिन्दुत्व
हिमाच्छादित टेम्स नदीमें चाहे जितनी तेजीके साथ अपना प्रपंच
रचिये; यहां तो पतितपावनी गङ्गाके किनारे चन्द्रमाके शीतल
शुभ्र प्रकाशमें घाट घाट नौकाओंद्वारा विहार करनेमें ही अधिक
आनन्द आता है। हमारा यह हल, यह मयूर, यह कमल, यह
हाथी और यह गीता बनी रहे, फिर चाहे हिमाच्छन्न देशोंमें जो कुछ
आनन्द हो वह न मिले तो आर्यमाताको कोई परवा नहीं।
सब कुछ अपने मन जैसा हो यह नहीं होता। इसके उद्यानोंमें
हरियाली छायी हुई है, इसके खलिहान भरे हुए हैं, इसकी
सर-सरिताओंका जल स्फटिकके समान स्वच्छ है, इसके पुष्प
सौरभमत्त हैं, इसके फल सरस हैं और इसकी जड़ी-बूटियोंमें
रोग-निवारणकी अद्भुत शक्ति है। इसकी चित्रकलाकी तूलिका
उषाके रंगोंमें रंगी हुई और उसकी वीणाका गीत गोकुलके
संगीतसे मिला हुआ है। सचमुच ही हिंदमाता परमेश्वरकी
सकल ऐश्वर्य-संपन्न कन्या है।
क्या इंग्लेण्ड और क्या फ्रांस—चीनियों और कदाचित्
अमेरिकनोंको छोड़कर—कोई देश ऐसा नहीं है जो नैसर्गिक बल
और वैभवमें सिन्धुस्थानकी बराबरी कर सके। एक देश—
एक घरका होना स्थायी और सुदृढ़ राष्ट्रके होनेके लिये, सबसे
पहली बात है। संसारमें जितने देश हैं उनमें कोई ऐसा देश नहीं
है जो इस विषयमें हिन्दुस्थानसे बढ़कर हो—हिन्दुस्थान-
की भूमिकी रचना एक महान् राष्ट्रकी समृद्धिके लिये जितनी
उपयुक्त है उससे अधिक उपयुक्त प्राकृतिक रचना और किसी भी