हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
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रहन-सहनमें, नित्यके जीवनकी किसी बातमें कोई परिवर्तन हो
जानेसे ही किसीका रक्त या बीज नहीं बदल जाता न इतिहास ही
मिट सकता है।
लाखों सिखोंका हिन्दुत्व स्वयंसिद्ध ही है। सहजधारी,
उदासी, निर्मले, गहनगंभीर और सिंधी सिखोंको, जाति और
राष्ट्रके विचारसे, अपने हिन्दू होनेका पूर्ण अभिमान है। उनके
गुरु जब हिन्दू-सन्तान थे तब उन्हें कोई अहिन्दू कहकर उनका
क्रोध-भाजन हुए बिना कैसे रह सकता है? गुरुग्रन्थको पूज्य
मानकर सनातनी भी पढ़ते हैं और सिख भी। दोनोंके पर्व और
त्योहार एकसे हैं। “तत्खालसा” पन्थके सिख भी अधिकांशमें
अपनेको हिन्दू ही मानते हैं और हिन्दुओंमें हिन्दुओंकी तरह ही
रहते हैं। उनसे जाकर यदि कोई कहे कि आप लोग हिन्दू नहीं
हैं तो वे चकित स्तम्भित हो जायंगे—उनके हृदयको बड़ा भारी
धक्का लगेगा। हमारी जातीय एकता इतनी संशय-रहित, प्रत्यक्ष
और पूर्ण है कि सिख और सनातनियोंमें विवाह-सम्बन्ध भी
होते हैं।
अब यह बात है कि कभी कभी कुछ सिख-नेता यह कहा
करते हैं कि हम हिन्दू नहीं हैं। इसका कारण क्या है? कारण
यह है कि “हिन्दू-धर्म” का अर्थ गलतीसे “सनातनधम” माना
जाने लगा। यदि इन शब्दोंके अर्थके सम्बन्धमें ऐसी गड़बड़ न
होती तो उनकी यह आवाज भी किसीको न सुनायी देती कि
“हम हिन्दू नहीं हैं”। “हिन्दू-धर्म” के अर्थके सम्बन्धमें भ्रम और