हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
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लगे, उसका एक कारण तो यह हुआ कि उन्हें यह भय था
कि अपनेको हिन्दू कहनेसे हम सनातनी समझे जायंगे; इसके
साथ ही एक और दूसरा कारण भी हुआ और वह
कारण राजनीतिक है। यहां "विशेष प्रतिनिधित्व" के गुण-
दोषोंकी चर्चा करना उचित न होगा। सिख अपने समाजके
विशिष्ट अधिकारोंकी रक्षा चाहते थे, और यदि मुसलमान अपने
लिये विशिष्ट और सांप्रदायिक प्रतिनिधित्वका अधिकार पा
सकते हैं तो कोई कारण नहीं है कि भारतवर्षके अन्य अल्प-
संख्यक समाज वैसा ही अधिकार न मांगें। परन्तु यह जरूर
है कि सिखोंको अपनी मांगकी पुष्टिके लिये ऐसी निराधार और
आत्मघात करनेवाली दलीलका सहारा न लेना चाहिये था कि
हम हिन्दू नहीं हैं। सिख अपने सांप्रदायिक स्वार्थों की रक्षाके
लिये एक महत् अल्पसंख्यक समाजके नाते विशिष्ट सांप्रदायिक
प्रतिनिधित्व मांग सकते थे और उसमें उन्हें यश भी मिलता,
जैसा कि अब्राह्मणों और अन्य समाजोंको मिला है। इसके लिये
वे हिन्दुत्वका अपना जन्मसिद्ध अधिकार क्यों छोड़ें ? हमारे सिख
भाईयोंका समाज मुसलमानोंके समाजसे किसी प्रकारसे भी कम
महत्त्वका नहीं है—हम हिन्दुओंके लिये तो हिन्दुस्थानके किसी
भी अहिन्दू समाजसे यह समाज अधिक महत्त्वका है। विशिष्ट
और सांप्रदायिक प्रतिनिधित्वसे होनेवाली हानि उतनी बड़ी
नहीं होती जितनी जातीय अलगावकी मनोभावनासे होती है।
सिख, जैन, लिंगायत, अब्राह्मण और ब्राह्मण भी यदि चाहें तो