हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिभाषाकी जांच १२७
[न]हीं हो सकती; पर “हिन्दुत्व” और “हिन्दू-धर्म” इन दोनोंको
[ए]क ही वस्तु मानकर लोग भ्रममें पड़ जाते हैं। हम इन दोनों
कल्पनाओंके बीच जो भेद है उसे स्पष्ट रूपसे दिखला चुके हैं
और यह भी बतला चुके हैं कि हिन्दूधर्मको 'सनातनधर्म'
कहना या हिन्दुत्वको हिन्दूधर्म कहना ये—दोनों बातें ठीक नहीं
हैं। यह जो दोहरी गलती होती है कि हिन्दुत्वको हिन्दूधर्म
समझा जाता है और हिन्दुत्व तथा हिन्दूधर्मसे सनातनधर्म
संप्रदाय माना जाता है, इससे सनातनेतर धर्मसंप्रदाय चिढ़ते
हैं और कुछ लोग इस भ्रमका भण्डा फोड़नेके बदले एक दूसरी,
और वह भी बड़ी भारी, गलती करते हैं जो अपने हिन्दू होनेका
दावा ही उठा लेते हैं। हमें आशा है कि हमारी हिन्दुत्वकी इस
परिभाषासे इस तरहकी गलती करनेकी किसीके लिये भी गुंजा-
यश न रहेगी। उसी प्रकार यह परिभाषा सत्यके सुदृढ़ आधार-
पर खड़ी होनेसे इसे अखिल हिन्दू-समाजके समझदार लोग
मान लेंगे, परन्तु अबतक इस प्रश्नके सामान्य विवेचनमें हम कोई
किसी समाजका उदाहरण लेकर जांच न कर सके सो अब
करते हैं। सबसे पहले अपने सिखसंघका उदाहरण लीजिये।
कोई भी सिख इतना मूर्ख न होगा जो सिन्धुस्थानको—आसिंधु
सिंधुपर्यंता भारतभूको अपनी पितृ-भूमि न माने—जहां वैदिक
कालसे अबतक उसके पूर्वपुरुष जीये, जहां रहकर उन्होंने
भजन किये और जहां उनकी समाधि लगी। दूसरी बात, उनके
शरीरमें भी उतना ही हिन्दूरक्त है जितना मद्रास या बंगालके