हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
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अपने अपने विशिष्ट और सांप्रदायिक प्रतिनिधित्वके लिये लड़ें,
यदि वे समझते हैं कि इसके बिना उनके समाजकी उन्नति नहीं
हो सकती। कारण, इन समाजोंकी उन्नति ही तो समग्र हिन्दू-
जातिकी उन्नति है। प्राचीन कालमें भी हमारे चार वर्णोंको राज-
सभा और स्थानिक संस्थाओंमें संप्रदायमूलक पृथक् प्रतिनिधित्व
प्राप्त था। सब वर्ण यह विशेष अधिकार भोगते थे, पर इसके
लिये उन्हें हिन्दुत्वसे पृथक् होनेकी आवश्यकता न होती थी।
सिख अपने धर्म-संप्रदायके नाते सिख बने रहें; पर जाति, राष्ट्र
और संस्कृतिके नाते वे हिन्दू हैं और उन्हें हिन्दू ही कहलाना
चाहिये।
जिन वीरोंने सैकड़ोंकी संख्यामें घातकके खड्गपर अपने सिर
कटा दिये पर अपने गुरुका वचन नहीं टाला—"धर्म हेत शाका
जिन किया। सिर दिया पर सिरर न दिया !" क्या वे अपना बीज
भुला देंगे, क्या अपने पूर्वजोंको ही धिक्कारेंगे और एक छोटीसी
चीजके लिये अपना जन्म-सिद्ध अधिकार बेंच देंगे ? ईश्वर ऐसा
न करें ! हिन्दू-जातिमें जो अल्पसंख्यक समाज हैं वे इस बातको
ध्यानमें रखें कि संघमें शक्ति है तो हिन्दुत्व ही वह दृढ़तम और
प्रियतम बन्धन है जिससे हमारी जातिका वास्तविक, चिरस्थायी
और शक्तिशाली संघ बन सकता है। आप यह समझते होंगे कि
अभी तो अलग रहनेमें ही फायदा है, पर इससे इस प्राचीन जाति
और सभ्यताकी अशेष हानि होगी—विशेषकर आपकी हानि
होगी। आपका हित आपके अन्य हिन्दू भाइयोंके हितमें