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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

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१२४, हिन्दुत्व
होना है तो भी उससे हमारी परिभाषामें कोई दोष नहीं आता;
और, और भी कुछ कारण हैं जिनसे यह परिभाषा हमारे सिन्धी
भाइयोंपर पूरे तौरपर घटती है। सिंधु नदीके उस पार रहनेवाले
इन सिन्धी भाइयोंके अतिरिक्त, हमारे और भी बहुतसे हिन्दू
भाई हैं जो संसारके भिन्न भिन्न भागोंमें बसे हुए हैं। कोई समय
आ सकता है जब हमारे ये उपनिवेशवासी हिन्दू जो आज भी उन
उन उपनिवेशोंमें संख्या, व्यापार, योग्यता और बुद्धिमत्तामें बड़े
माने जाते हैं, किसी किसी प्रदेशके मालिक बन सकते हैं और
अपना स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर सकते हैं। परन्तु हिन्दुस्थानके
बाहर किसी अन्य देशमें जा बसनेसे ही कोई हिन्दू क्या अहिन्दू
हो जायगा ? कदापि नहीं; कारण, हिन्दुत्वका प्रथम लक्षण यह
नहीं है कि वह हिन्दुस्थानके बाहर रहनेवाला मनुष्य न हो, बल्कि
यह है कि वह और उसके वंशज जहां कहीं भी हों हिन्दुस्थान-
को अपनी पितृ-भूमि मानें। और यह केवल मानने न मानने-
का ही प्रश्न नहीं है। जिस किसीके पूर्वज हिन्दुस्थानसे जाकर
कहीं बाहर बसे होंगे उसको यह मानना ही पड़ेगा कि हमारी
पितृभूमि हिन्दुस्थान है। इस तरह हिन्दुत्वकी इस परिभाषामें
हिन्दू-जातिके चारों ओर फैलनेकी पूरी गुंजायश है। हमारे जो
लोग भिन्न भिन्न उपनिवेशोंमें बसे हुए हैं वे अपनी सारी सामर्थ्य
लगाकर 'भारत' को "महाभारत" या "हिन्दुस्थान" को "विराट
हिन्दुस्थान" निर्माण करनेका उद्योग बराबर करते रहें और
हिन्दू-संस्कृतिमें जो कुछ उत्तम है उसे मानव-जातिके उद्धारमें