हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिभाषाकी जांच १३७
लक्षण तो उनमें इतनी प्रधानताके साथ विद्यमान हैं कि उन्हें
हिन्दुओंके भी बीचके हिन्दू कहना चाहिये । सचमुच हमें तो एक
भी ऐसा उदाहरण नहीं दिखायी देता जिससे हमारी इस परि-
भाषामें किसी प्रकार अव्याप्तिका दोष आवे ।
एक ही बात ऐसी है, जिसमें कुछ कठिनाई भी मालूम
होती है । उदाहरणार्थ, भगिनी निवेदिता क्या हिन्दू कहला
सकती हैं ? अपवादसे नियम सिद्ध होता है, यह बात यदि सच
है तो वह बात यहां पूरे तौरपर घटती है । हमारी इस देशभक्त
और उदारहृदय बहनने इस आसिन्धु सिन्धुपर्यन्ता भूमिको अपनी
“पितृभू” माना था । इस देशको वे सचमुच ऐसा ही मानती थीं
और यदि हमारा राष्ट्र स्वतंत्र होता तो ऐसी पुण्यात्माको सबसे
पहले हम इस देशके नागरिकत्वका अधिकार भेंट करते । हमारी
परिभाषाके अन्तर्गत प्रथम लक्षण तो इस तरह भगिनी निवेदि-
ताके उदाहरणपर घटता है । पर ऐसे उदाहरणोंमें, परिभाषाके
अन्तर्गत जातीय रक्तका जो दूसरा लक्षण है वह कभी नहीं घट
सकता । तथापि इस कठिनाईमें विवाह-बन्धनका मार्ग खुला
रहता है । कारण यह स्पष्ट ही है कि विवाह-बन्धनसे कोई भी दो
व्यक्ति एक हो जाते हैं। भगिनी निवेदिताके संबंधमें इस प्रकारकी
कोई बात नहीं है, तौभी हिन्दुत्वकी परिभाषामें जो तीसरा लक्षण
है उससे उन्हें हिन्दू कहलानेका अधिकार प्राप्त हो सकता था ।
कारण, उन्होंने हमारी संस्कृतिको स्वीकार किया था और वे
इस भूमिको पुण्यभू मानकर इसकी पूजा करने यहां आयी थीं ।