हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दू जातिकी शक्ति १४१
अपने एक हाथसे आठ खंड पृथ्वीको एक ओर ठेलकर दूसरे
हाथसे वहां समुद्रपर समुद्र जल छोड़ रहे हैं ! यह हिन्द-महासागर
और इसके ये उपसागर ही हमारी परिखा हैं।
ऐसी हमारी चतुःसीमा है और इससे हमें पृथ्वी और जल
(सागर-तट) दोनोंका लाभ मिल रहा है।
हमारी मातृभूमि ईश्वरकी सबसे लाड़ली कन्या है। इसे उसने
अपने महान् ऐश्वर्यसे सुसंपन्न किया है। इसकी नदियां गंभीर
हैं और उनका प्रवाह अखंड है। इसकी भूमिमें इतनी मृदुता
है कि हलसे वह जोती जाती है और उसके खेत हरे-भरे रहते हैं।
इसकी आवश्यकताएं अत्यन्त अल्प हैं और इसकी प्रकृति इसके
प्रत्येक अभावको पूर्ण करनेके लिये सदा प्रस्तुत है। वनस्प-
तियों और फलफूलोंकी कोई कमी नहीं—स्वयं सूर्यनारायण
प्रकाश और उष्णता प्रदान कर उसे वैभवसंपन्न किये हुए हैं।
उसे हिमाच्छादित देशोंकी लालसा नहीं है—वे उन्हींको मुबारक
हों जो वहां रहते हैं। यहां यदि कभी ऐसी गरमी भी पड़ती है
कि जी घबरा जाय तो वहां इतनी सरदी पड़ती है कि हाथ-पैर
ठिठुर जायं। वहां सरदीसे यदि शारीरिक श्रम अधिक होता
है तो यहां गरमीसे उसकी आवश्यकता ही कम हो जाती है।
उष्ण आहारसे गला भून डालनेकी अपेक्षा, शीतल जलसे तृषा
शांत करनेमें ही इसे अधिक आनंद मिलता है। जिन्हें यह
आनन्द नहीं मिलता वे उसे प्राप्त करनेके प्रयत्नका आनन्द लें
परन्तु जिन्हें यह आनन्द प्राप्त है वे उससे आनन्दित क्यों न हों