घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
७० / घट रामायण
निरंकाल काल अस फाँदा, जीव जोति जग बाँधा हो।
आदि अनादि पंथ नहिं जानी, करि कुपंथ ठग ठानी हो॥३॥
तीरथ बरत नेम बिधि पाला, आस खानि फल डाला हो।
नर तन भटक भटक भटभेरा, बाँधा न भौजल बेड़ा हो॥४॥
तन सराय छूटत छिन माहीं, सेमरि सुवा पछिताई हो।
तुलसीदास चेत नर अंधा, परखि लखौ दुखदंदा हो॥५॥
अर्थ-जहाँ अग्नि तथा आकाश जल रहे हैं, उसके बीच एक कमल खिला हुआ है। दण्डी के ऊपर
कमल है, कमल पुष्प आकाश की नाड़ी है और उस पर 'रज' का विस्तार ब्रह्मा ने किया है॥१॥
उसी नाल ने शंकर का उद्धार किया है, संसार में विष्णु की विपत्ति को दूर किया है। तीनों ब्रह्मा,
विष्णु, महेश इन तीनों में मिलकर भी उस मर्म को नहीं समझा और वेद-पुराणों की रचना करते
रहे॥२॥
काल का पाश निरंकाल है (जिसका अनुमान सम्भव नहीं है) और यह जीव परमात्मा की ज्योति
में बँधा है। इन्होंने आदि-अनादि के ज्ञान मार्ग को नहीं जाना और कुपंथ तैयार करके जन समुदाय को
ठगने का निश्चय किया है॥३॥
तीर्थ, व्रत, नियम आदि विधियों को निर्दिष्ट किया तथा आशा की खानि का फल सबके सामने
डाल दिया। इन्होंने इस संसार के भौजल से मुक्ति की नौका न तैयार करके मनुष्य जाति के भटकने
का भटभेरा (सूखी लकड़ियों की बाँधकर अस्थिर नावें) बना दी॥४॥
तन रूपी यह विश्रामालय (सराय) क्षण में ही छूट जाता है, और सेमर फूल पर क्षुधित होते के
प्रहार से शुकगण जैसे निरन्तर पछताते रहते हैं। तुलसी साहब कहते हैं कि हे अंधे मनुष्य समझो-संसार
के दुःख द्वन्द्वों को परखकर मानव समाज के लिए मार्ग निर्धारित करो॥५॥
॥ चौपाई ॥
ये सब मन का भेद बताया। मन रचि कीन्हा खेल बनाया॥
धरती गगन चंद और सूरा। निरंकाल रच मन मत मूरा॥
सोइ मन अस बस विष रस माईं। भूला भरम खानि गति जाई॥
अर्थ-मैंने ये सारे मन के भेद बताए और मन ही का सारा रचा तथा बनाया हुआ खेल है। पृथ्वी,
आकाश, चन्द्रमा एवं सूर्य यह कालरहित मन की ही मूल रचना हैं। हे सखी! यही मन इस वासना रूप
विषय रस में बस जाता है। यह भ्रमवश अपनी मूलगति को भूल जाता है।
॥ सोरठा ॥
तुलसी तरक बिचार, सार पार गति ना लखै।
यह मन बिषम बिकार, ता की गति मति सब कही॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि अनेक तर्क तथा विचारों से सिद्ध है कि इस मन की गति का पार
नहीं दिखाई पड़ता, यह मन ही समस्त विषम (कष्टदायी) विकारों का कारण है, उसके ज्ञान का
वर्णन मैंने अपनी मति के अनुसार पूरी तरह से किया है।
॥ छन्द ॥
तुलसी मति न्यारी कहत बिचारी। जगत भिखारी जाल मई।
सुर नर मुनि नाचे कोंइ न बाचे। आदि अंत सब छार छई॥१॥
घट रामायण / ७१
संतन सोइ जाने सुरति समाने। जिन वा घर की राह लई।
मैं उनका चेरा किया निबेरा। सुरति सैल अज अधर गई ॥ २ ॥
मन की गति पाई सुरति छुड़ाई। रामायन घट माहिं कही।
ले लेख अलेखा सब बिधि देखा। संत चरन सत सार सही ॥ ३ ॥
चीन्हा वह द्वारा सुरति सम्हारा। नैन निहारा पार गई।
तुलसी बिधि गाई सबै सुनाई। संत सहाई राह दई ॥ ४ ॥
कुंजी अरु तारा खोल किवारा। निरखि निहारा सूर भई।
जाना सत नामा अगम ठिकाना। लखि असमाना तिमर गई ॥ ५ ॥
तुलसी रस ज्ञाना माहिं बखाना। धसि असमाना अगम लई।
अर्थ—इस मन की मति, तुलसी साहब कहते हैं, कि बड़ी विलक्षण है और मैं इसे विचारपूर्वक
कहता हूँ कि सम्पूर्ण संसार भिखारी की जाल बन गया है। देवता, मुनि, मनुष्य इस मन के वश में होकर
नृत्य करते रहते हैं, इससे कोई बचा नहीं है और इसी मन के वशीभूत होने से मनुष्य का आदि अन्त सब
जलकर राख जैसा हो उठा है ॥ १ ॥
संत जन इस रहस्य को समझकर अपने मन को सुरति ध्यान (ज्ञान) में समाविष्ट कर लेते हैं और
वे उस घर (परमात्मा) की राह पकड़ लेते हैं। मैं तो उन सबका चेला हूँ। इन सबका निपटारा किया
है—और मेरा मन तो सुरति पर्वत पर स्थित अन्तरात्मा में समा गया है ॥ २ ॥
मैंने तो मन का ज्ञान प्राप्त कर लिया है और उसे सुरति ज्ञान की मायाशक्ति से छुड़ा लिया घट में
स्थित रामायण का गान किया है। उस अलेख लेख को लेकर उसे प्रत्येक प्रकार से देखा और यही
निष्कर्ष निकाला कि सन्तों का चरण ही सबका सार तत्त्व है ॥ ३ ॥
मैं सुरति सम्हालकर, वह द्वार पहचाना और अन्तर्नेत्रों से देखकर उस पार चला गया। तुलसी साहब
सभी को सुनाकर उसे विधिपूर्वक गाकर कहते हैं कि सन्तों ने ही रक्षक (सहाई) होकर मार्ग
दिया ॥ ४ ॥
कुंजी द्वारा ताला खोला, किवाड़ खोले, उस तत्त्व को निरखकर देखा और सिद्ध (सूर) हो उठा।
उस 'सत्यनाम' को समझा, उसके अगम्य ठिकाने को जाना, शून्याकाश को देखा और समस्त अंधकार
दूर हो गया ॥ ५ ॥
तुलसी साहब कहते हैं कि उस रस का अनुभव मैंने ज्ञान के बीच किया है और शून्याकाश में
प्रविष्ट होकर मैंने अगम्य (ब्रह्म) प्राप्त कर लिया ॥ ६ ॥
॥ सोरठा ॥
यह बिधि निरमल ज्ञान, सत मत सुरति लखाइया।
जब पाया वह ठाम, आदि अंत सोइ सुधि भई॥
कीन्हा ग्रंथ बनाइ, पाइ गाइ गति अस कही।
भई गुरन पद पार, सार पदम पद लखि रही॥
अर्थ—इस प्रकार सत्य मत के अन्तर्गत सुरति द्वारा निर्मल ज्ञान दिखाया और मुझे जब वह स्थान
प्राप्त हो उठा तो मेरे आदि और अन्त की सुधि उस परमात्मा ने ली ॥
मैंने ग्रन्थ रचकर उस गति को पाकर और उसे गाकर इस प्रकार कहा है। गुरु की कृपा से उस पद
को पार कर लिया। उस पद कमल के सार तत्त्व को देखकर मैंने इसे प्रकार बताया है ॥
७२ / घट रामायण
॥ चौपाई ॥
आगे अगम लोक गति गाऊँ। सत्त नाम सत धाम लखाऊँ॥
जब नहिं निराकार और जोती। आदि अंत कछहू नहिं होती ॥
जब दयाल सत साहिब दाता। जब की सुनौ सकल बिख्याता ॥
मैं अजान कछु मरम न जानों। संत कृपा सत साखि बखानों॥
सतगुरु संध संत दरसाई। उन रज कही महूँ पुनि गाई ॥
मैं बुधिहीन अचीन्ह अनारी। कीन्ही कृपा सुरति मतवारी ॥
अर्थ—आगे मैं अगम्य लोक में चल रहा हूँ और 'सत्यनाम' से ढंका सत्यधाम को दिखाऊँगा
(वर्णन करूँगा)। जब न निरंकार ब्रह्म था, न ज्योति थी, और कहीं भी 'आदि-अन्त' का क्रम नहीं
व्यवस्थित हुआ था॥
तब दयालु, स्वामी एवं सबका दाता ब्रह्म ही था और उस समय की सारी प्रसिद्ध बातें सुनो। मैं
अज्ञानी कोई रहस्य नहीं जानता था—संत की कृपा है, यह मैं सत्य की साक्षी देकर कहता हूँ।
सतगुरु के समुद्र को सन्तों ने ही दिखाया, उनके चरणरजों ने बताया और उसी की कृपा से मैंने भी
कुछ गाया मैं बुद्धिहीन, अपरिचित तथा अनाड़ी मुझपर गुरुओं ने ही मतवाली सुरति भरी कृपा की है॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी मनहिं बिचारि, संत अंत गति लखि परी।
भाख्यों सरनि सिहार, सार पार जस जस भई॥
सत्त लोक सत नाम, और अनाम आगे कही।
सबहि संत ब्रत मान, मैं निकाम सरनै लई॥
अर्थ—तुलसी साहब कहते हैं कि मन में विचार करके देखो, सन्त की भी अन्तगति दिखाई पड़ी है—
उस परम तत्त्व के पार जैसे-जैसे होने लगा—मैंने उस परमात्मा की शरण में समर्पित होकर वर्णन किया॥
सत्य लोक का सत्य नाम है और जो कुछ भी अनाम है, उसे अब आगे कह रहा हूँ, सभी सन्तों के
व्रत को स्वीकार करता हुआ, मैं निष्काम उसकी शरण में समर्पित हुआ॥
॥ चौपाई ॥
अब कहूँ आदि अगाध अनामी। ताकी गति मति संत बखानी॥
जो कुछ सत्त सीत उन केरी। महूँ पाइ मति निरखि निबेरी॥
तुलसी जब जोड़ जस जस भाखा। आदौ बिरछ पेड़ पर साखा॥
पिरथम पुरुष अनाम अकाया। जास हिलोर भई सत माया॥
माया नाम भया इक ठौरा। सत मत नाम बँधा इक डोरा ॥
सत्त लोक सत साहिब साँई। सत्त मिले सत नाम कहाई॥
चौथा पद संतन सोइ भाखा। सो सत नाम कीन्ह अभिलाखा ॥
सत्तनाम से निरगुन आया। ता को बेद ब्रह्म बतलाया ॥
ता की अब मैं कहों लखाई। त्रिकुटी रावन ब्रह्म कहाई ॥
माया कुमति ब्रह्म इक ठौरा। भया राम मन चहुँ दिखि दौरा ॥
द्वितीय खण्ड: माया-भ्रम निवारण एवं सतगुरु महिमा
घट रामायण / ७३
पाँचौ इंद्री प्रकृति पचीसा। तीनि गुणन मिलि सरगुन ईसा॥
इन्द्री पिता भरत है भाई। गुन तन कुमति संग मन माहीं॥
इच्छ सँग रँग मन मति भूला। खस परा बंद भया अस्थूला॥
ता को सब जग राम बखाना। ईस कर्म मन भर्म भुलाना॥
निराकार मन भया अकारा। ज्योति मिली गुन तीनि पसारा॥
ब्रह्मा बिस्नु भये महादेवा। इनकी उतपति मन मत भेवा॥
सास्तर बेद संस्कृत बानी। ये सब मन मत गति उतपानी॥
दस औतार जगत जग माया। यह मन और अनेक उपाया॥
ऋषी मुनी जोगीसुर ज्ञानी। मन करता कर सब मिलि मानी॥
तीरथ बरत बेद ब्यौहारा। जग भूला मन जाल पसारा॥
जो से नाम भेद नहिं जानै। मनहिं राम को नाम बखानै॥
नाम गती है अगम अपारा। ब्रह्म राम दोउ पावैं न पारा॥
निरगुन ब्रह्म राम मन होई। नाम अगम गत अगत अघोई॥
ता का पटतर मन पर लावै। ता से नाम भेद नहिं पावै॥
अर्थ-अब मैं उस आदि अगाध एवं अनाम तत्त्व रूप ब्रह्म के ज्ञान का वर्णन संत मत के अनुसार
करता हूँ। जो कुछ सत्य है, वह उनका प्रभाव (सीत) है हमने भी उनका अलभ्य ज्ञान प्राप्त करके, उन्हें
देख करके (अनुभव करके) निराकरण (निबेरी) किया है।
तुलसी साहब कहते हैं कि जब जिसे जैसा वह समझ में आया उसने वैसा-वैसा वर्णन किया है-
आदि में उसे वृक्ष, पेड़, पत्ता, शाखाओं जैसा बताया है। वह प्रथम पुरुष (ब्रह्म) अनाम और अशरीर
है, जिसकी लहरों से सतमाया निर्मित हुई है॥
माया नाम से वह एक भावना में स्थित हुई और सत्यमत नाम भी एक डोरे में बँध गया।
सत्यलोक, स्वामी सत् साहब स्वामी सत से मिलने पर सतनाम से पुकारा जाने लगा॥
उसी को सन्तों ने चौथा पद (मुक्ति) के नाम से पुकारा है, वही सतनाम है, उसी की अभिलाषा
की जाती है। इस सतनाम से निर्गुण की उत्पत्ति हुई है-उसको वेद ने ब्रह्म बताया है॥
अब मैं उसका दृश्य वर्णन करता हूँ। त्रिकुटी रावण और ब्रह्म दोनों कही जाती है। यहाँ माया कुमति
है, ब्रह्म एक स्थान पर स्थित है-और यहीं राम रूपी मन का चारों दिशाओं में भ्रमण होता है॥
पाँच इन्द्रियाँ हैं, और उनकी पच्चीस प्रकृतियाँ हैं और उनमें तीन गुणों को मिलाकर सगुण ब्रह्म की
कल्पना की गई। इन्द्रियाँ पिता है, भरत भाई है। गुण और कुमति दोनों शरीर में साथ-साथ हैं॥
इच्छा की संगवासना से मन मति के साथ वास्तविकता को भूल गया। जैसे, खस के टटरे पर बूँद
फैलकर स्थूल हो उठती है। उसी को सभी 'राम' कहकर बखानते हैं। यह मन भ्रम वश ब्रह्म के धर्म
(कर्म) को भूल जाता है॥
सगुण के रूप में निराकर मन साकार हो उठता है-वह ज्योति तत्त्व (ब्रह्म) इन तीनों गुणों (रज,
सत्त्व, तम) में फैलकर मिल जाता है, तब उनसे ब्रह्म, विष्णु एवं शिव बनते हैं, उनकी उत्पत्ति के विषय
में विद्वानों के मन में मतभेद हैं॥
शास्त्र वेद तथा संस्कृत भाषा में सब मन एवं मतों की गतियों से उत्पन्न हैं। ब्रह्म के दसों अवतार
संसार एवं सृष्टि में मायावत् है यह मन पृथक् है और ये सभी इसके उपाय हैं॥
७४ / घट रामायण
ऋषि, मुनि, योगेश्वर एवं ज्ञानी, सबने मिलकर कर्त्तारूप मन को स्वीकार किया है, तीर्थ, व्रत,
देव व्यवहार-इन सबका जाल मन ने फैला दिया और उसी में संसार भूल गया ॥
जिससे नाम भेद समझ में न आए, और मन निरन्तर राम का बखान ही करता रहे-यही नाम उस
अगम-अपार ब्रह्म की गति है और ब्रह्म तथा राम दोनों उसको पाने में असमर्थ हैं ॥
निर्गुण ब्रह्म के मन राम हैं, और वह नाम अगम्य एवं गत एवं अगत (ज्ञात तथा अज्ञात) एवं
सम्पूर्ण (अघौड़) है। उस ब्रह्म के समानान्तर इस ब्रह्म को लाने की चेष्टा में लोग रत हैं। अतः वे इसके
कारण नाम का रहस्य नहीं समझ पाते ॥
॥ दोहा ॥
यहिं विधि आदि अनादि, लखा भेद भिनि भिनि कहयौ।
सुत निःनाम अधार, जाना जिन अन्दर कहयौ ॥
अर्थ-इस प्रकार, वह आदि एवं अनादि ब्रह्म है, मैंने उसके भेदों को देखकर भिन्न-भिन्न रूपों में
बताया है। वह केवल शब्दों से सुना जाता है, निष्काम है तथा सृष्टि का आधार है। उसको वही जानता
है, जिन्होंने अन्तरात्मा को बताया है, या समझा है ॥
॥ छन्द ॥
है निःनामी अकथ अनामी। दस दिसि लसि सर सैल कही।
भाखा सतनामा ब्रह्म अकामा। माया मिलि मन जार लई ॥ १॥
काया अस्थूला मन सहै सूला। इंद्री बस भौं खानि मई।
काया गति धारी कर्म बिचारी। भूल भटक भौ भार सही ॥ २ ॥
अर्थ-वह निष्काम है, अकथ है, अनाम है, दसों दिशाओं में सरोवर तथा पर्वत आदि पर उसे
शोभित बताया जाता है। मैंने उस निष्काम ब्रह्म को 'सत्यनाम' के रूप में बताया है, माया में मिलकर
वह मन रूपी जाल को भ्रमित कर देता है ॥ १ ॥
स्थूल शरीर में मन नाना प्रकार के कष्टों को सहता है, और वह भव की खानि इन्द्रिय के वश में
होकर शरीर से संचालित कर्म जगत के साथ निर्वाह करने लगता है और इस प्रकार यह (मन) भूलता
भटकता हुआ भवसागर का भार सहता रहता है ॥ २ ॥
॥ सोरठा ॥
काया रचन बिचार, जाही से ये जग भया।
सो बिधि कहौं सँवार, बूझै जो जिन घट लखा ॥
अर्थ-शरीर की रचना का सत्य यही है कि इसी से यह सृष्टि हुई है। इसका वर्णन मैंने इस विधि से
सँवार कर कहा है-इसे वही बूझेगा, जिसने इस घट का मर्म समझा है।
॥ चौपाई ॥
उतपति जोनि खानि मन दीन्हा। गर्भ भीतर बालक को चीन्हा ॥
उतपति कारज बीरज डौठा। यह मन बात लागि मद मीठा ॥
यह कर लेखा कहों बनाई। तब जग हिरदे सत्त समाई ॥
सुनौ गर्भ की बात बिचारा। मात पिता रज बीर्ज सँवारा ॥
उलटा उरधमुखी दुख पावै। तन भीतर काको गोहराबै ॥
घट रामायण / ७५
भया बिकल मुख नरक समाना। जठर अगिन तन तपन जराना॥
आजिज भया बिकल बहु भारी। अति दुख में रहा बिकल दुखारी॥
तब साहिब से अरज पुकारी। बदौंछोर मोहिं लेव उबारी॥
निस दिन बँदगी करों तुम्हारी। अब मोहिं काढ़ौ महा दुखारी॥
अब तोहिं नेक न बिसरौ साँईं। बार बार सुमिरौं चित लाई॥
दीन दुखी से मन नहिं लाऊँ। आठ पहर तुम्हरा गुन गाऊँ॥
अर्थ-उत्पत्ति की ही दशा में नारी योनि के भीतर ही उस ब्रह्म ने उसे मन दे दिया और इस मन ने
गर्भ के भीतर ही शिशु को पहचान लिया। उत्पत्ति का कारण वीर्य है-यह बात मन को भली अवश्य
लगती है॥
इसका वर्णन मैं बनाकर (व्यवस्थित करके) इस प्रकार कहता हूँ-और तभी (मेरी बात सुनने के
बाद ही) हृदय में सत्य का समावेश होगा अर्थात् बात समझ में आ पाएगी॥
गर्भ की बात को विचार करते हुए सुनो-वह माता-पिता के 'रज -वीर्य' के संभोग का फल है
किन्तु शिशु गर्भ में ऊर्ध्वमुखी उल्टा रहकर दुःखों को भोगता है-और वह कष्ट मुक्ति के लिए माँ के
उदर में किसे बुलावे? वह वहाँ नितान्त व्याकुल एवं नरक सदृश जीवन यापन करता है। वह वहाँ
जठराग्नि से उसकी शरीर की आग की तपन से तप्त रही है॥
अत्यधिक व्याकुल एवं आजिज होकर अत्यन्त पीड़ा में वह व्याकुल उस साहब (ब्रह्म) को आर्त
होकर पुकारता है कि इस जटिल बन्धन से मुक्त करने वाले प्रभु! (बन्दिछोर) मुझे उबार लें। मैं रात-
दिन तुम्हारी बन्दगी करता रहूँगा और अब उस महादुखारी को शीघ्र मुक्त कर दें॥ हे स्वामी! अब एक
क्षण के लिए आपको नहीं भूलूँगा और बार-बार चित्त लगाकर आपका स्मरण करूँगा। अब अपनी
दीनता से तथा अपने दुःख में मन न लगाकर, आठों प्रहर आपका ही गुणगान करता रहूँगा॥
॥सोरठा॥
इतना किया करार, जब गर्भ में बाहिर भया।
भूला सिरजनहार, तुलसी भौ जग जाल में॥
अर्थ-तुलसीसाहब कहते हैं कि जब वह गर्भ से बाहर आता है, तब उसने जितनी प्रतिज्ञा कर रखी
भवजाल में फँसकर उस बनाने वाले प्रभु को वह भूल गया॥
॥चौपाई॥
अब बाहिर का लागा रंगा। माता मोह पिता के संगा॥
लरिकाई लट पट जग खेला। तोतरि बात मात सँग बोला॥
भाई बंद सकल परिवारा। ठुमठुम पाँव चलै तेहि लारा॥
लरिकाई ऐसी विधि खोई। तरुन भये तरुनी सँग मोही॥
मन की मौज करै रस रंगा। भूला ज्ञान भया चित भंगा॥
अब साहिब की याद बिसारी। माया मोह बँधा संसारी॥
मद में मस्त कछू नहिं सूझै। साध संत को कछु न बूझै॥
खान पान निस दिन मद माता। कामिन संग रहै रँगराता॥
जिन यह घट का साज बनाया। ताहि बिसारि जगत मन लाया॥
७६ / घट रामायण
यह जग झूठॅं सराय बसेरा। भोर गये उठि सूना डेरा॥
ऐसे या जग का ब्योहारा। जनम जुवा जस बाजी हारा॥
नेक न साहिब से मन लाया। बिरध भया तब अति दुख पाया॥
ऐसे सकल जनम गयो बीती। नेक न जानी साहिब रीती॥
अंत समय जम आनि सतावा। मुसकिल कष्ट महा दुख पावा॥
मार परै जब कौन बचावै। कठिन काल बिकराल सतावै॥
अर्थ-अब उसे बाहर का प्रभाव लगा और वह पिता के साथ मोह में पागल (माता) रो उठा।
बाल्यावस्था में वह लटपटाता हुआ संसार में खेला तथा अपनी तोतली बातों में माता से बोलता रहा।
भाई, बंधु एवं समस्त परिवार के बीच वह ठुमक-ठुमक चला तथा सभी ने उसे प्यार किया।
बाल्यावस्था को उसने इस प्रकार नष्ट कर दिया। और युवक होने पर तरुणियों के साथ मुग्ध हो उठा।
इस युवावस्था में मन की मौज में आनन्द की गंगा में बहता रहा, आत्मबोध नष्ट हो उठा और चित्त
माया में लिप्त होने के कारण भूल ज्ञान से टूट गया। वह अब परमात्मा का याद भूल गया तथा माया
के मोह में बँध कर संसारी हो उठा।
वह अपने अहम् भाव में मस्त था तथा उसे कुछ सुझाई नहीं पड़ता था। साधुओं तथा सन्तों को वह
कुछ नहीं समझता था। रात-दिन वह खान पान के मद में मस्त रहता था और कामिनियों के साथ नाना
प्रकार की विलास क्रीड़ाओं में मस्त रहता था।
जिसने इस शरीर की रचना करके सुन्दर स्वरूप प्रदान किया है तुम्हें भूलकर वह सांसारिक प्रपंचों
में मन लगा लिया। वह संसार असत्य है सराय के बसेरे की तरह (आज है, कल नहीं), सबेरा होने पर
समस्त डेरा सूना हो उठता है।
इस संसार का मिथ्यात्मक व्यवहार ऐसा ही है, जन्म रूपी जुआ में बाजी हारने जैसा, यहाँ का सारा
कार्य है। अपने स्वामी ईश्वर से नेक काम भी मन नहीं लगाया और जब वृद्ध हुआ तो अत्यधिक दुःख
प्राप्त हुआ।
अन्तिम समय में जम यातनाएँ मिलने लगेंगी तो कौन बचा सकता है और उस समय तो विकराल
(भयंकर) कष्ट के कारण अत्यन्त दुःख प्राप्त किया॥
जब मनुष्य के ऊपर समय की मार पड़ने लगती है तो उसे कौन बचा सकता है। उस समय भयंकर
काल विकराल रूप में कष्ट देता है।
॥ दोहा ॥
ऐसा नर तन पाइ के बादइ जनम गँवाई।
सो अस अंधा जग भया परै नरक में जाइ॥
अर्थ-इस प्रकार का श्रेष्ठ मनुष्य शरीर प्राप्त करके व्यक्ति व्यर्थ ही अपना जीवन नष्ट करता है।
इसी के फलस्वरूप यह संसार अंधा हो उठा फलस्वरूप बाद में जाकर नरक में जा पड़ता है॥
॥ छन्द ॥
ऐसा जग भूला सहै जम सूला। धर्मराय तन त्रास दई॥
निज नाम न जाना बहु पछिताना। जिन नित काल को मार सही॥
ता से नर चेतौ छांड़ि अचेतौ। नर तन गति ये जाति बही॥
तुलसी कही साची कोउ न बाची। बिन सतसंगति पार नहीं॥
घट रामायण / ७७
अर्थ—इस परमात्मा को संसार इस प्रकार भूलकर यम के द्वारा दिये हुए कष्टों को सहता रहता है।
धर्मराज (यम) उसे नाना प्रकार के संकट देते रहते हैं॥
वह अपना नाम भी नहीं जानता और बराबर पछताता रहता है और वह प्रतिदिन काल की मार सहता रहता है।
हे मनुष्यों! इससे तो अब होश में आओ (अज्ञान को छोड़ो), मानव शरीर की यह दुर्गति होती है,
जबकि वही जाति है (जो ऋषि आदि की है)। तुलसी साहब सत्य कहते हैं। यम की यातना से कोई
नहीं बच पाता। अतः समझो कि बिना सत्संगति के इस भवसागर से उद्धार सम्भव नहीं है॥
॥ सोरठा ॥
काया रचन विचार, जाही से ये जग भया।
सो विधि कहौं सँवार, बूझै जो जिन घट लखा॥
अर्थ—इस शरीर रचना पर तो जरा विचार करो, इसी से यह संसार उत्पन्न हुआ है, मैं अत्यन्त
सँवार-सजाकर विधिपूर्वक उसका वर्णन करूँगा जिससे कि वह जिसने पिंड के भीतर परमात्मा का
अनुभव किया है, वह भलीभाँति उसे समझे॥
॥ चौपाई ॥
निःनामी निःअच्छर भाखों। अब निज सुरति नाम से राखौं॥
ता से जीव होइ निरवारा। भवसागर से उतरै पारा॥
संत कृपा सत संगति होई। सतगुरु मिलि होइ नाम सनेही॥
अब मैं कहों आदि गति न्यारी। घट देखै सो लेइ बिचारी॥
सब गति भिन्न-भिन्न कहों भाखा। जानै जीव मिटै अभिलाखा॥
पिंड माहिं ब्रह्मांड बताऊँ। भिन्न भिन्न ता को दरसाऊँ॥
जो बाहिर सोइ पिंड दिखाई। देखा जाइ पिंड के माहीं॥
तुलसी ताहि पाइ धसि देखा। घट भीतर भिनि भिन्न बिबेका॥
जस जस संत कहा घट लेखा। तस तस तुलसी नैनन देखा॥
अब मैं या की कहों लखाई। जो घट भीतर दीन्ह दिखाई॥
तुलसि निकाम संत कर बंदा। जित जित जोओं जग सब अंधा॥
कोइ न मानै बात सत मेरी। फिरि फिरि कर्म बँधै भौ बेरी॥
भिन्न भिन्न संतन गोहरावा। काहू हिरदे चेत न आवा॥
घट में सुरति सैल जस कीन्हा। कागभसुण्ड भाखि तस दीन्हा॥
कागभसुण्ड कितहुँ नहिं भयेऊ। तुलसी सुरति सैल तन कहेऊ॥
कागभसुण्ड काया के माहीं। राम रमा मुख पैठा जाई॥
तुलसी ता की गति मति जानी। रामायन में कीन्ह बखानी॥
यह सब घट में भाखि सुनाई। अंधे जिव अंतै लै जाई॥
भरत छत्रगुन लछिमन भाई। यह घट माहिं कहेउ समझाई॥
सुमिंतरा केकई कौसिल्या। ये तन भीतर घट में मिलिया॥
७८ / घट रामायण
सीता दसरथ राम कहाये। ये सब घट भीतर दरसाये॥
सरजू सुरति अवध दस द्वारा। ये घट भीतर देखि निहारा॥
रावन कुम्भ लंकपति राई। त्रिकुटी ब्रह्म बसे तेहि माहीं॥
रावन ब्रह्म कहा हम जोई। त्रिकुटी लंक ब्रह्म है सोई॥
मन्दोदरी भभीषन भाई। इन्द्रजीत सुत त्रिकुटी माहीं॥
ये संबाद कहा घट माहीं। रामायन घट माहिं बनाई॥
जो कोइ अंध जीव नहिं मानै। पुनि पुनि परै नरक की खानै॥
संतन की गति कोइ न जानै। पिंड माहिं ब्रह्मांड बखानै॥
उनकी गति मति कोइ कोइ जानै। बिन सतसंग नहीं पहिचानै॥
उनकी कृपा दृष्टि जब होइ। तब अदृष्ट को बूझै सोई॥
पिंड ब्रह्मांड सैल कोइ पावै। तब सतगुरु सत दया लखावै॥
अब ब्रह्माण्ड की कहौं लखाई। कोइ कोइ साधू बिरले पाई॥
जो कोइ भये अधर में लीना। जिन को आया संत अकीना॥
जिन जिन सुरति सैल घट कीन्हा। ता की गति मति बिरलै चीन्हा॥
अब मैं अपनी कहौं दृढ़ाई। सुरति सैल घट माहिं लखाई॥
रावन राम सकल परिवारा। ये घट भीतर चुनि चुनि मारा॥
और अनेक कहे बहु भाँती। ये सब माया की उतपाती॥
ये मत सत्त सत्त जिन माना। उनका आवागवन नसाना॥
या में कोई भर्म जो लावै। बार-बार चौरासी पावै॥
मैं अपने अस देख बखानी। संत कृपा से महुँ पुनि जानी॥
अब ब्रह्मांड पिंड कर लेखा। भाखा जोड़ निज नैनन देखा॥
अर्थ-अब मैं उस निष्कामी तथा अक्षर शून्य परम तत्त्व का वर्णन करता हूँ। अपनी सुरति ज्ञान से
जुड़े नाम का वर्णन करता हूँ। जिसको समझने या साधना करने से जीव माया से मुक्त हो कर इस
भवसागर से पार हो उठता है॥
संतों की कृपा से सत्संगति होती है और वह सतगुरु से मिलकर 'राम' नाम का स्नेही हो उठता है।
अब मैं उस आदि ब्रह्म की विलक्षण गति का वर्णन करता हूँ जो स्वयं पिंड देखकर (उसमें स्थित ब्रह्म
का) स्वयं विचार कर लेता हूँ॥
मैं जीव से सम्बद्ध सम्पूर्ण गतियों का भिन्न-भिन्न रूप से वर्णन कर रहा हूँ ताकि जीव उन्हें समझ
ले और उसकी भौतिक अभिलाषाएँ समाप्त हो उठें। अब मैं पिंड में स्थित ब्रह्मांड का वर्णन करता हूँ
और भिन्न-भिन्न रूप में उसे दिखाऊँगा॥
जो पिंड के बाहर है, वह पिंड के अन्तर्गत दिखाई पड़ता है, मैंने तो स्वयं समझकर सब कुछ पिंड
के अन्तर्गत देखा है। तुलसी साहब कहते हैं कि उसे पाकर पिंड में प्रविष्ट होकर (अनुभूति द्वारा उसे)
देखा है। इस पिंड के भीतर भिन्न-भिन्न अनेक सारे विवेक हैं॥
जैसे-जैसे संतों ने पिंड (घट) के विषय में जानकारी दी हैं, तुलसी साहब कहते हैं कि वैसा-वैसा
घट रामायण / ७२
मैंने उन्हें अपने नेत्रों से देखा है। अब मैं इसकी दृश्य रचना ( लखाई ) के बारे में कहता हूँ, जो घट के
भीतर मुझे दिखाई पड़ा है ॥
मैं तो निष्काम ब्रह्म ( गुरु ) का शिष्य हूँ। जिधर-जिधर विचार करके देखता हूँ, यह संसार अंधा ही
दिखाई पड़ता है। मेरी सच्ची बात कोई नहीं मानता है और वह पुनः पुनः भवसागर में कर्मबन्धन की
बेड़ी में फँसता जाता है ॥
भिन्न-भिन्न सम्प्रदाय के सन्तों को मैंने बुलाया, और उन्हें समझाया ) किन्तु किसी के हृदय में ज्ञान
नहीं आया। स्वयं कागभुशुण्डि ने ऐसा बताया है कि पिंड में ही सुरति ने ज्ञान का सैल ( आश्रय ) बना
रखा है॥
कागभुशुंडि कोई नहीं हुआ था। स्वयं तुलसी ने इस शरीर को सुरति ज्ञान का विश्राम गृह बताया है।
कागभुशुण्डि श्रीराम की काया के मध्य गया और वह श्रीराम के मुख द्वारा प्रविष्ट हुआ था ॥
उसके ज्ञान और उसकी बुद्धि को तुलसी ने समझा था और उसका वर्णन रामायण में किया है। इस
माया संसक्त जीव को अन्त में ले जाकर यह सब ( पिंड में ब्रह्मांड रहस्य ) घट के भीतर ही कहकर
बताया है॥
सुमित्रा, कैकेई एवं कौसल्या ये सभी इस पिंड के भीतर मिली हैं। जो सीता, दशरथ तथा राम कहे
गए हैं, ये सभी घट के भीतर दिखाए गए हैं ॥
सरयू नदी और सुरति रूपी अयोध्या के दसों दरवाजे, मैंने सभी को घट के भीतर निहार कर देख
लिया है। कुंभकर्ण एवं लंका के स्वामी रावण ब्रह्म के पास त्रिकुटी में निवास करते हैं॥
हमने जिसे रावण कहा है वह त्रिकुटी रूपी लंका में स्थित ब्रह्म है। मंदोदरी तथा रावण का भाई
विभीषण, पुत्र मेघनाद सभी इसी त्रिकुटी में हैं ॥
मैं यह सब संवाद घट के बीच का कहता हूँ। रामायण तो घट के मध्य की कथा की ही बनी है।
यदि कोई व्यक्ति अंधा है तो वह इसे न स्वीकार करे और न स्वीकार करने के कारण पुनः नरक में
पड़ेगा ॥
सन्तों की गति कोई नहीं जानता। वे इसी पिंड में ही ब्रह्मांड बखानते हैं। उनके ज्ञान और उनकी
बुद्धि को कोई नहीं जानता क्योंकि बिना सत्संग के यह नहीं पहचाना जा सकता ॥
जब प्रभु की कृपा होती है तभी अदृष्ट ( अंधे ) को सब कुछ दिखाई पड़ने लगता है। तभी कोई
साधक इस पिंड में ब्रह्मांड एवं सुरति शैल पा लेता है क्योंकि तभी ( पाने के क्षण ही ) सत्गुरु की कृपा
होती है ॥
अब मैं ब्रह्मांड के दृश्य का वर्णन करता हूँ जो किसी-किसी विरले संत को दिखाई पड़ता है। ये
सन्त अन्तरात्मा में लीन हो जाते हैं, इन्हीं सन्तों पर विश्वास होता है॥
जिन्होंने घट की सुरति शैल पर विश्रामालय बना लिया है, उनके ज्ञान तथा उनकी मति की पहचान
बिरले ही करते हैं। अब मैं घट में सुरति के शैल को दिखाकर अपनी चिन्तनगत दृढ़ता को स्पष्ट करता हूँ।
राम और रावण घट के भीतर सभी परिवार के रूप में हैं और उन्होंने इस घट के भीतर ही उनको
चुन-चुन कर मारा है और रावण की भांति इसी घट में ही अनेक उत्पाती राक्षस हुए हैं (और वे भी मारे
गए हैं) ॥
हमारे इस सत्य मत को जिसने सत्य माना है, उनका इस लोक में आवागमन समाप्त हो उठा है। इस
तथ्य में जो व्यक्ति भ्रम उत्पन्न करता है, वह बार-बार नरक की चारों योनियों में पड़ता है॥
मैंने उसे इस प्रकार स्वयं देखा है, और उन्हें मैंने सन्तों की कृपा से जाना भी है। अब इस पिंड तथा
ब्रह्मांड का वर्णन वही-वही करता है-जिसको अपने नेत्रों से देख लिया है॥
॥ दोहा ॥
पिंड सैल ब्रह्माण्ड की, जस जस गति मति मोर।
जो सत मत संतन कही, देखा घट गढ़ तोर॥
८० / घट रामायण
अर्थ-पिंड ही ब्रह्मांड का पर्वत शिखर है, जैसी कि मेरी समझ है, सत्य के मत का जो वर्णन सन्तों
: किया है, उसे इस घट के अन्दर मैंने देखा है॥
॥ छन्द ॥
गाया घट लेखा अगम अलेखा। जिन जिन देखा सार सही॥
महुँ पुनि भाखी देखा आँखी। सूरति धसि दस द्वार गई॥ १॥
संतन जोइ गाई महुँ पुनि पाई। आदि अंत गति कहनि कही॥
जो जो घट माहीं सब दरसाई। जो रचना ब्रह्मांड मई॥ २॥
जिन जिन निज जानी देख बखानी। जिन नहिं मानी भर्म सही॥
पंडित गति ज्ञानी भर्म भुलानी। भेष भेद भौ माहिं कही॥ ३॥
छत्री और ब्राह्मन बैस अपावन। सूद्र मती छर छार भई॥
का को गोहराई आदि न पाई। तुलसी सब देखा भर्म मई॥ ४॥
अर्थ-मैंने यहाँ अगम तथा न दिखाई पड़ने वाले अलक्ष्य घट के प्रकरण (लेखा) का वर्णन किया।
जिन-जिन महात्माओं ने उसे देखा है (अनुभव किया है) वही उसका सही निचोड़ है। मैंने उसका पुनः
आँखों से देखकर वर्णन किया है, और मेरी सुरति (ज्ञान) दसों द्वारों में प्रविष्ट होकर वहाँ पहुंची
हैं॥ १॥
जिसे सन्तों ने गाया है (बताया है, वर्णन किया है) मैंने भी उसी को प्राप्त किया है और उसकी
आदि अन्त का उस रूप में वर्णन किया है। जो-जो घट के अन्तर्गत है, मैंने सबके विषय में बताया है,
यह सारी रचना ब्रह्मांडमयी है॥ २॥
जिन-जिन ने इसे जाना है, उसको देखकर वर्णित किया है-जिन्होंने नहीं माना है, वह पूरी तरह से
भ्रम में हैं। पंडित तथा ज्ञानी (ज्ञान एवं पांडित्य के गर्वभ्रम में) अपने भ्रम में भुलाए रहे और ईश्वर के
वेष तथा भेद को संसार (सृष्टि) के अन्तर्गत बताया (ब्रह्मांड के अन्तर्गत नहीं) ॥ ३॥
क्षत्रिय तथा ब्राह्मण, वैश्य एवं शूद्र सभी की मति (ज्ञान) जलकर राख हो गई। इस मनुष्य समाज
में किसको बुलावें किन्तु वे इसके मूल रहस्य का ज्ञान नहीं प्राप्त कर रखा है, तुलसी साहब कहते हैं
कि सभी को मैंने भ्रम में पड़ा हुआ देखा है॥
॥ सोरठा ॥
ब्राह्मन अरु पुनि सूद्र, ये बूड़े सब उद्र को।
बैस्य बसा भौ बास, कस अकास डोरी गहै॥
अर्थ-ब्राह्मण तथा दलित ये सभी अपने पेट भरने में ही डूब गए। वैश्य का निकृष्ट स्थान पर
निवास हो उठा और शून्याकाश की डोर को ये तीनों किस प्रकार पकड़ सकते हैं सम्भव नहीं हैं॥
॥ चौपाई ॥
सब ये घट की सैल बखाना। पिंड माहिं ब्रह्मांड दिखाना॥
आगे घट का भेद बताई। अब जो सुनो कहों समझाई॥ १॥
तिल परमाने लगे कपाटा। मकर तार जहाँ जिव की बाटा॥
इतना भेद जानि जिन कोई। तुलसीदास साध है सोई॥ २॥
आगे अदबुद ज्ञान अपारा। पिरथम घट का कहों बिचारा॥
घट रामायण / ८१
अर्थ—यह सब मैंने घट की यात्रा (सैल) वर्णन किया और मुझे पिंड में ही ब्रह्मांड दिखाई दिया।
आगे, घट के भेदों को बताऊँगा—मैं समझाकर कहता हूँ—अब उसे सुनो॥
चित्त की चेतना के द्वार पर तिल के समान छोटा कपाट लगा हुआ है। जीव का रास्ता वहाँ मकर
तार जैसा सूक्ष्म है। जिसने इतना भेद समझ लिया है—तुलसीदास कहते हैं, वही साधु है॥ २॥
आगे अपार अद्भुत ज्ञान है, अब इस पृथ्वी घट पर विचार कह रहा हूँ॥
॥ अर्थ घट का भेद और ठिकाना ॥
( सवाल )
१. पृथ्वी का माथा कहाँ है?
२. सुर का तेज कहाँ है?
३. चंद्र की जोति कहाँ है?
४. पानी का मूल कहाँ है?
५. कँवल का फूल कहाँ है?
६. वायु की नाभि कहाँ है?
७. गनेस की स्वाबी कहाँ है?
८. समुद्र का सोत कहाँ है?
९. आकाश का पोत कहाँ है?
१०. सुरति सहदानी कहाँ है?
११. जीव की बानी कहाँ है?
१२. जीव का नाम कहाँ है?
१३. सुरति का ठाम कहाँ है?
१४. ध्यान की सुरति कहाँ है?
१५. ज्ञान की मूरति कहाँ है?
१६. सुरति की निरति कहाँ है?
१७. सुमेर की जड़ कहाँ है?
१८. तिल भर हाड़ काया में कहाँ
है?
१९. गगन का कलेजा कहाँ है?
२०. मन का मुख कहाँ है?
२१ काम का आदि कहाँ है?
२२. देही का नूर कहाँ है?
२३. बदन का पिंजर कहाँ है?
२४. सिव का ध्यान कहाँ है?
२५. बेद का भेद कहाँ है?
२६. गुनी का गुन कहाँ है?
२७. राग का रस कहाँ है?
२८. सुर का आकार कहाँ है?
२९. आकार का आदि कहाँ है?
३०. अंत की समाधि कहाँ है?
३१. माया की धुनि कहाँ है?
३२. धुनि की सुन्न कहाँ है?
३३. सुन्न का शब्द कहाँ है?
३४. ज्ञान का मूल कहाँ है?
॥ जबाब ॥
१. पृथ्वी का माथा मैनागिरी पर्वत में है।
२. सूर का तेज उदयागिरि पर्वत पर हैं।
३. चंद्र का तेज चंदागिरि पर्वत पर हैं।
४. पानी का मूल निरंजन की दीपें में है।
५. कमल का फूल अछेद्दीप में है।
६. वायु की नाभि रंभा के पेड़ में हैं।
७. गणेश की स्वाबी मानसरोवर में है।
८. समुद्र का स्त्रोत समीवृक्ष में है।
९. आकाश का पोत वाराह के माथे पर है।
१०. सुरति सहदानी शब्द में हैं।
११. जीव (हंस) की बानी अष्ट कमल में है—
जीव अरूपी द्वादश कमल में है।
१२. जीव का नाम शून्य कमल में है।
१३. सुरति का स्थान दो दल वाले कमल में
है।
१४. ध्यान की सुरति गगन के ऊपर नयन
नासिका के अग्रवीच में हैं।
१५. ज्ञान की मूर्ति ब्रह्मांड कमल में है।
८२ / घट रामायण
१६. सुरति की निरति साहब (परमात्मा के २६. गुनी का गुन षटदल कमल में है।
शब्द) में है। २७. राग का रस पुरुष के शब्द में है।
१७. सुमेर की जड़ नाग के कलेजे में है। २८. सुर का आकार शून्य में है।
१८. तिल भर हाड़ पाँच इन्द्रियों में है। २९. आकार का आदि अनाहत नाद में है।
१९. गगन का कलेजा राग के आकार में है। ३०. अन्त की समाधि ब्रह्मलोक (साहब के
२०. मन का मुख षट्दल कमल में है। लोक) में है।
२१. काम की आदि शिव (शंकर) की सुरति ३१. माया की ध्वनि चतुर्दल कमल में है।
में है। ३२. ध्वनि की शून्य वे ज्ञान के मूल में है।
२२. देही का नूर हरि के पास है। ३३. शून्य का शब्द निरन्तर में है।
२३. बदन का पिंजर पृथ्वी के भीतर है। ३४. ज्ञान का मूल नाम में है।
२४. शिव का ध्यान हरि के शब्द कमल में है।
२५. वेद का भेद चार दल कमल में है।
॥ सोरठा ॥
इतना देहु बताइ, जीव कहों समझाइ कै।
अगम निगम घर पाइ, तब तुलसी सब बिधि लखै॥
अर्थ-मैं जीवों को समझा कर कहता हूँ कि तुम इतने प्रश्नों का उत्तर दे दो। इस अगम्य एवं अज्ञेय
का घट पाकर तुम इसे भलीभाँति देखते, तुलसीदास कहते हैं कि (इस शरीर को) इन प्रश्नों के प्रकाश
में इसे भलीभाँति क्यों नहीं देखते?
॥ जवाब चौपाई ॥
आगे उलटा भेद बताऊँ। अगम निगम घट भेद सुनाऊँ॥
अब या का अरथंत सुनाऊँ। घट में टीका ठौर बताऊँ॥
जो कोई साध सैल घट कीन्हा। सुन करि अर्थ होइ लौ लीना॥
अर्थ-आगे अब मैं इसका उल्टा भेद बता रहा हूँ। इससे सम्बद्ध इसे अगम्य एवं अज्ञेय तत्त्व का मैं
भेद बताऊँगा। अब मैं इसका अर्थान्तर (प्रश्नों का अर्थ) सुनाता हूँ। इसी घट में इनका उचित निवास
तथा पहचान (टीका ठौर) बताता हूँ। जिस साधु ने इस पिंड (घट) में शैल (विश्रान्ति स्थली) कर ली
है-इसके अर्थ को सुनकर वही उसकी समाधि में लीन हो उठेगा॥
॥ दोहा ॥
ये अस्थान बताइया, साधू सुनौ बखान।
कहै तुलसी घट भीतरे, सूरति से पहिचान॥
अर्थ-मैंने वर्णन करके इन स्थानों के विषय में बतला दिया, हे साधु जन! इस वर्णन को सुनें।
तुलसी साहब कहते हैं कि इस शरीर के भीतर सुरति ज्ञान द्वारा इनकी पहचान करो।
॥ सोरठा ॥
रामायण घट सार सुरति शब्द में लखि परै।
गगन कँज कर बास ऊपर चढ़ि जिन देखिया॥
अर्थ-यह मेरी रामायण पिंड का निचोड़ तत्त्व है और इसे सुरति समाधि से ही देखा जा सकता है।
सुरति में स्थित कमल दल पर निवास करते हुए उसके ऊपर चढ़कर जिन्होंने इसे देखा है (वही इसके
प्रमाण हैं।)॥
घट रामायण / ८३
॥ चौपाई ॥
अब सुनियौ ब्रह्मंडी लेखा। कोटिन परलै घट बिच देखा॥
भीतर गुफा एक जो कीन्हा। कोटि प्रलै उबार जिव लीन्हा१॥
सब्द निरंतर सत है भाई। गहै जीव पहुँचे जब जाई॥
घट का मथन सुरति से१ साधै। बा को काल कभी नहिं बाँधै॥
कोटिन सूर ब्रह्मांड के माहीं। कोटिन कोटि देखि सब ठाहीं॥
घट बिचार घट ही के माहीं। ता में ब्रह्मा बिस्नु रहाई॥
सिव संकर सब घट में फंदा। घट में नदी अठारा गंडा॥
घट में देखे सात समुन्दर। जिन से जल पहुँचे नभ अंदर॥
घट में तीरथ बरत मँझारी। घट में देखा कृष्न मुरारी॥
घट में जोधा सामन्त होई। घट में राजा परजा सोई॥
घट में हिंदू तुर्क दोइ जाती। घट में कुला कर्म की पाती॥
घट में नेम दया अरु धर्मा। घट में पाप पुन्य बहु कर्मा॥
घट में डंड बंध दोउ भाई। जो कछु बाहिर सो घट माई॥
घट में बास बसन जग लागा। घट में कामिनि खेलै फागा॥
घट में षट पलास सोइ फूला। घट में लोग प्रजा झकझूला॥
घट में स्वर्ग नर्क हैं दोई। घट में जनम मरन पुनि होई॥
घट में कथा पुरान सुनावै। घट में माया करम करावै॥
घट में चोरी चोर अपारा। घट में करता सिरजनहारा॥
घट में राजा राज कराई। घट में चौकी पहरा भाई॥
घट ही में सब न्याव चुकावै। घट में रागी तान सुनावै॥
घट में नाच कूद रे भाई। घट में राग अलाप सुनाई॥
घट में साह महाजन होई। घट में सब्द सुन्न है सोई॥
घट में राजा है बलि बावन। घट में सीता रघुपति रावन॥
घट में लंका सा गढ़ भाई। घट में छानवे मेघा छाई॥
घट में बैठे पाँचौ नादा। घट में लागी सहज समाधा॥
ऊँच नीच परबत झक झाई। निस दिन झरना बहत रहाई॥
मगरमच्छ घट माहिं मँझारा। घट में बस्ती और उजारा॥
घट में सुकदेव ब्यास अरु नारद। घट में ऋषी मुनी अरु सारद॥
घट में राजा बरन कुबेरू। घट में माँडे आठ समेरू॥
१. मुं० दे० प्र० की पुस्तक में दूसरी चौपाई इस तरह है—''भीतर गुफा एक है भाई। उबरे जीव पार जब
जाई''; और चौथी चौपाई में 'सुरति से' की जगह 'जीव कोइ' है।
८४ / घट रामायण
कहँ लगि घट का कहौं पसारा। घट में अनेक बिधान सँवारा॥
जो सब घट कहि बरनि सुनाई। जौ जग कागद मिलै न स्याही॥
अर्थ-अब ब्रह्मांड का वृत्तान्त सुनिये। इस पिंड (घट) के बीच करोड़ों प्रलय देखा है। अपने पिंड
के भीतर जो एक विशिष्ट गुफा है, उसने जीव को उन कोटि प्रलयों से बचा लिया है॥
हे भाई! शब्द (निरंकार) निरन्तर सत्य है। जीव जब वहाँ पहुँचता है तो वह उसको ग्रहण कर लेता
है (उसकी रक्षा करने लगता है)। इस घट का मंथन सुरति समाधि से साधो-सुरति से शब्द (निरंकार)
को साधने वालों को काल कभी भी नहीं बाँध पाता॥
ब्रह्माण्ड के बीच कोटि-कोटि सूर्य हैं। इन कोटि-कोटि सूर्यों को देखकर सभी स्थिर हो जाते हैं।
घट का विचार घट के मध्य ही किया जा सकता है, बाहर नहीं-जिसके अन्दर ब्रह्मा, विष्णु आदि रहा
करते हैं॥
शिवशंकर तो इस घट के फंदे हैं। इस घट के अन्दर ९० नदियाँ ( १८ × ५ = ९० = एक गंडा
पाँच के बराबर होता है) हैं। इस घट में मैंने सात समुद्रों को देखा है, जिनका जल शून्याकाश के बीच
पहुँचता है॥
इस घट में तीर्थ एवं व्रत के स्थान हैं और इसी घट में मैंने मुरारी कृष्ण को भी देखा है। इसी घट
के अन्तर्गत समस्त योद्धागण एवं सामन्तगण हैं-लोक में दिखाई पड़ने वाले राजा प्रजा सभी घट में
हैं॥५॥
इसी घट में हिन्दू-तुर्क (मुसलमान) दो जातियाँ हैं-इस घट में सम्पूर्ण कर्मों की पंक्तियाँ
(स्थितियाँ) हैं। इसी घट में ही नियम, दया एवं धर्म हैं। इसी घट के अन्तर्गत पाप-पुण्य से संयुक्त
समस्त कर्म हैं॥
इस घट के दो भाई है-एक दण्ड है और दूसरा बंधन है। इसलिए जो कुछ बाहर है, वही यहाँ भी
है। इसी घट में ही लोगों के सारे निवास हैं, और इसी घट में नवयुवतियाँ होली खेलती हैं॥
इसी घट के अन्तर्गत छः दलों का पलास फूला हुआ है-इसी घट में ही लोग प्रजा को झकझोरते
रहते हैं। इसी घट में स्वर्ग तथा नरक दोनों हैं और इसी घट में जन्म और जन्म के बाद पुनः मरण होता
है॥
इसी घट के अन्दर ही साधु जन कथा-पुराण सुनाते हैं और इसी घट में ही माया नाना प्रकार के
कर्मों को कराती रहती है। घट में ही चोरी करने वाले अनन्त चोर हैं। इसी घट में ही संसार का
रचनाकर्त्ता सृजनहार ईश्वर भी है॥
इसी घट में राजा राज्य करता है, इसी घट में चौकी और पहरा भी है? इसी घट में ही सारे न्याय
चुकाए जाते हैं इसी घट में ही राग रागिनियों का ज्ञाता (रागी) नाना प्रकार की संगीत की ताने सुनाता
रहता है॥
सम्पूर्ण नाच-कूद इसी घट में है-इसी घट में ही राग तथा आलाप सुनाई पड़ता है। इसी घट में साहु
तथा महाजन रहते हैं और इसी घट में ही वह शून्य शब्द भी है॥
इसी घट में राजा बलि और वामनावतार भी हैं, इसी घट में सीता, रावण तथा राम है। इसी घट में
वह घट लंका भी है, इसी घट में ९६ प्रकार के मेघ छाये रहते हैं॥
इसी घट में पाँचों प्रकार के नाद स्थित हैं और इसी घट में ही सहज समाधि लगी रहती है। इसे घट
में चारों वेद रह रहे हैं और इसी घट में असंख्य ब्रह्म समाविष्ट हैं॥
घट में ही सन्तों का स्वर्ग तथा पाताल हैं, इसी घट में भयंकर काल बैठा हुआ है-जो सब बाहर है,
वही सब अन्दर भी है-घट का भेद घट के ही अन्दर है॥
इसी घट में सारे अड़सठ तीर्थ हैं और इसी घट में गंगा की धारा भी बहती है। इसी घट में ही लोग
स्नान करते हैं और इसी घट में ही तीनों लोक समाये रहते हैं॥
घट रामायण / ८५
घट की थाह कोई नहीं जान पाया—इसी घट में पिंड तथा ब्रह्मांड समाये हुए हैं। इसी घट में ही
हाट-बाजार लगाया हुआ है-घट में ही वह दामिनि (विद्युत लेखा) है और यही मन अपने पति को प्राप्त
करता है॥
इस घट में अपार पर्वत तथा वृक्ष हैं और घट में ही विष्णु के दशावतार बैठे हुए हैं। इसी घट में
हाथी और घोड़े हैं और इसी में समस्त हिरण स्थित हैं॥
इसी घट में ऊँचे, नीचे, पर्वत, खोह (झल) और झाड़ियाँ (झाईं) हैं और यहीं रात-दिन झरने बहते
रहते हैं। इसी घट के अन्दर ही मगरमच्छ है-इसी घट में बस्तियाँ तथा उजाले हैं॥
घट में ही शुकदेव, व्यास, एवं मुनि नारद हैं-इसी घट में ऋषि, मुनि एवं सरस्वती देवी रहती है।
इसी घट में वरुण राजा (बरन) एवं कुबेर रहते हैं और इसी घट में आठों सुमेरु पर्वत सुशोभित
(मौडे-मण्डित) होते हैं॥
इस घट के विस्तार का कहाँ तक वर्णन करूँ। घट में अनेक प्रकार की रचनाएँ सजाई गई हैं। उन
सम्पूर्ण बातों का जो घट में स्थित है, मैं उल्लेख कर चुका हूँ। यह वर्णन इतना अधिक है कि उसके
निमित्त स्याही और कागज भी कम पड़ गए है॥
॥ दोहा ॥
घट भीतर जो देखिया सो भाखा विस्तार।
बेदी भेद जनाइया तुलसी देखि विचार॥
अर्थ—घट के भीतर जो देखा, उसका मैंने विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। तुलसी साहब कहते है कि
मैंने भेद का कारण एवं उसके अनेक भेदरूपों का अन्तर स्पष्ट कर दिया-उसे तुम देखो तथा विचार
करो॥
॥ छन्द ॥
सब ठीक बखाना घट परमाना। घट घट में सब ठाम ठई॥
बाहिर सोइ अंदर सब घट मन्दर। देखि हिये बस बास कही॥ १॥
बूझै कोई ज्ञानी अंतरजामी। मूरख मूढ़ न चेत भई॥
आगे पुनि गाऊँ बरनि सुनाऊँ। इन सब के अस्थान मई॥ २॥
तुलसी तन तारा खोलि किवारा। पैठि मँझारा सार लई॥
अर्थ—घट को प्रमाण के रूप में रखकर मैंने सारी बातें ठीक-ठीक कही हैं। घट में ही सभी के होने
के ठीक-ठीक स्थान हैं। जो बाहर है, वह सब घट रूपी मन्दिर के अन्दर है, हृदय के निवास को वहाँ
देखकर ये बातें कही हैं॥ १॥
इसे कोई अर्न्तयामी ज्ञानी ही बूझ सकते है-मूढ़ एवं मूर्ख के मन में इसका ख्याल नहीं आता। मैं
पुनः इस प्रसंग का आगे गान करके वर्णन करके सुनाता हूँ-जहाँ इनके स्थान हैं।
तुलसी साहब कहते हैं-इस शरीर के किवाड़ों के ताले को खोलो और सार तत्त्व को ग्रहण करके
इसी में बैठो॥ २॥
॥ सोरठा ॥
या विधि तन मन ग्यान भीतर देखा जोड़ कै।
साधू करौ प्रमान भिन्न भिन्न तत मत कहा॥
अर्थ—इस प्रकार, शरीर और मन का ज्ञान मैंने घट के भीतर जाकर देखा और अब साधु जन इस
भिन्न-भिन्न शरीर की कथाओं के प्रमाण हैं॥
८६ / घट रामायण
॥ चौपाई ॥
अब उनके अस्थान बताऊँ। भिनि भिनि ग्रंथन में समझाऊँ ॥
अर्थ-अब उनका स्थान मैं बताता हूँ तथा यह भिन्न-भिन्न ग्रंथों से लेकर समझाता हूँ॥
॥ कोठों के नाम ॥
कोठा प्रथम उतेसुर नाईं। बैठे ब्रह्मा बेद पढ़ाई॥
दूसर धरम-गंध दरसाई। बैठे बिस्नू ज्ञान सुनाई॥
तीसर कोठा धुन-धर भाई। बैठे संकर जोग कराई॥
चौथा कोठा रक्तमनि गाई। बरुन बैठि जहँ राज कराई॥
हरि संग्रह पचम बतलाऊँ। आठ सुमेर बसैं तहि ठाऊँ॥
बिजै-धुंध षष्टम कहलाई। मन की कला फिरै तेहिं ठाईं॥
कोठा सतवाँ नगरा नाऊँ। अन्नदेव बैठे तेहि ठाऊँ॥
कोठा अठवाँ रुकमन ताला। जहाँ बैठे मदन गोपाला॥
नौवाँ कोठा गौड़ मन माली। दुरमति माया करै बिहाली॥
दसवाँ कोठा उघडू नावाँ। सहस कोटि ऊगैं तेहि ठावाँ ॥
करभौनी एकादस नाऊँ। तीनि लोक में जोति समाऊँ॥
द्वादस कोठा बिषमदे गावा। सुर नर मुनि जहँ ध्यान लगावा॥
कोठा त्रयोदस मलदू द्वारे। जोगिनि चौंसठ लाख निहारे॥
चौधा कोठा गगनधर नाऊँ। लच्छ अलच्छ बैठि तेहि ठाऊँ॥
हमसुन्दर पन्द्रा कर नावाँ। बास सुगंध बसै तेहि ठावाँ ॥
कोठा सोला अतिसुर नाऊँ। पाँच बजार बसै तेहि ठाऊँ॥
कोठा सत्रा सिषरचल नाऊँ। अठरा गंडा नदी तेहि ठाऊँ॥
अठरा कोठा कड़ेसुर नाऊँ। जीव को तेज बसै तेहि ठाऊँ॥
कोठा उनीस बंकचल नाऊँ। मुरली सुहावन बजै तेहि ठाऊँ॥
बिसवाँ कोठा कुलँग कहाई। सुकृत बाजा बजै सुहाई॥
इकइस कोठा भानसुर नाऊँ। अलख निरंजन है तेहि ठाऊँ॥
बाइस कोठा धुँधेसुर नाऊँ। मन को ध्यान बसै तेहि ठाऊँ॥
तेइस कोठा तरंगी ताला। बिछई जे जग में जमजाला॥
चौबिस कोठा कंठसुर नाऊँ। सुमति बिचार बसै तेहि ठाऊँ॥
पच्चिस कोठा प्रकृति१ नाऊँ। मल को पती बसै तेहि ठाऊँ॥
छब्बिस कोठा मुदापल नाऊँ। पवन प्रधान बसै तेहि ठाऊँ॥
१. मुं० दे० प्र० के पाठ में 'परकुटी' है।
घट रामायण / ८७
सताइस कोठा सुताचल नाऊँ। मन अलीप बैठे तेहि ठाऊँ॥
अठाइस कोठा धरनीधर नाऊँ। माया मोह बसै तेहि ठाऊँ॥
उंतिस कोठा कमची नाऊँ। बादल मेघ उठै तेहि ठाऊँ॥
तिसवाँ कोठा निरमल नामूँ। साहिब पलँग बिछा तेहि ठामूँ॥
इकतिस कोठा करोमल नामूँ। नवो नाथ बसते तेहि ठामूँ॥
बत्तिस कोठा बनासुर नामा। नौ कुत्ते बैठे तेहि ठामा॥
तेंतिस कोठा अनधू नामूँ। जम का तेज बसै तेहि ठामूँ॥
चौंतिस कोठा जमाउत नामा। जमुना नदी बसै तेहि ठामा॥
पैंतिस कोठा सकरदू१ सेता। कामदेव जहँ झरि झरि बहता॥
छत्तिस कोठा गनक नामूँ। क्रोध कलेस बसै तेहि ठामूँ॥
सैंतिस कोठा अवर धुर धुंधा। बैठ कृष्न जहँ डारै फंदा॥
अरतिस कोठा बँसबल नाऊँ। चौधा कामिनि हैं तेहि ठाऊँ॥
उन्तालिस करियाधर नाऊँ। बैठे दया धरम तेहि ठाऊँ॥
चालिस कोठा किरिकोता नामूँ। सात समुद्र बसै तेहि ठामूँ॥
इकतालीस भौरादे नामा। नवौ कुली नाग तेहि ठामा॥
बयालिस कुम्भेसुर नाऊँ। बारह कुम्भ बसैं तेहि ठाऊँ॥
तेंतालिस भगताधर नावाँ। भय और त्रास बसै तेहि ठावाँ॥
चवालिस कुसमाधर नाऊँ। चारों बेद बसै तेहि ठाऊँ॥
पैंतालिस मायारट नाऊँ। रोग अरु दोष बसै तेहि ठाऊँ॥
छेयालीस मलया गिरि नावाँ। हंस बिहंग बसै तेहि ठावाँ॥
सैंतालीस हलासुर२ नामा। तीरथ अरसठ हैं तेहि ठामा॥
अरतालिस कुकरंदर न्यारा। जहँ है सत्त सुकृत३ का द्वारा॥
कोठा उंचास मरमो नाऊँ। पवन अकास उठै तेहि ठाऊँ॥
कोठा पचास घूघर नामूँ। हरि को तेज बसै तेहि ठामूँ॥
कोठा इक्यावन मजकुर नामा। सहस कँवल फूला तेहि ठामा॥
बावन कोठा जरादे नामूँ। अगिनी जरै ऊँच तेहि ठामूँ॥
त्रेपन कोठा तेराधर नामूँ। धीर गंभीर बसै तेहि ठामूँ॥
चौवन कोठा सिसंधर नावाँ। सत संतोष बसै तेहि ठावाँ॥
१ एक लिपि में 'सरंदू' नाम लिखा है।
२. एक लिपि में 'कोलाहर' नाम दिया है।
३. मुं० दे० प्र० की पुस्तक 'सुकृत' की जगह "मुक्त" है।
८८ / घट रामायण
पचपन कोठा हिंडोला नामूँ। नारी नवो बसै तेहि ठामूँ॥
छप्पन कोठा निरधर नाऊँ। अठारा भार बसै तेहि ठाऊँ॥
सतावन कोठा कफादे नावाँ। जीव की मीच बसै तेहि ठावाँ ॥
अट्ठावन सुमेरबल नावाँ। मङ्गल पुरुष चरित्तर गावाँ ॥
उनसठ कोठा छैसुन्दर नाँमा। आतम रूप बसै तेहि ठामाँ ॥
साठ कोठा धौलाधर नाऊँ। तीनों लोक मही तेहि ठाऊँ ॥
इकसठ कोठा जैसुन्दर नामूँ। बलधर पुरुष बसै तेहि ठामूँ ॥
बासठ कोठा हीरापुर नामूँ। नीर चुवै झरि झरि तेहि ठामूँ ॥
त्रेसठ कोठा कलाकर नावाँ। चौंधा भवन बसै तेहि ठावाँ ॥
चौंसठ तिल बिक्रम कहलावै। जलथल कुम्भ बसै तेहि ठाँवै ॥
पैंसठ कोठा सुरतसर नामूँ। जप तप जज्ञ करै तेहि ठामूँ ॥
छासठ कोठा सिखरिचल नाऊँ। जोगी असंखन जोग कराऊँ ॥
सरसठ कोठा अनन्दी भाई। जहँवाँ काल बसन नहिं पाई ॥
अरसठ कोठा चितादे नाऊँ। चित का चक्र फिरै तेहि ठाऊँ ॥
उन्हत्तर कोठा सनीता नाऊँ। ज्ञानी बुद्ध बसै तेहि ठाऊँ ॥
सत्तर कोठा सलीका नाऊँ। सुन्न की धुन उठै तेहि ठाऊँ ॥
इखत्तर कोठा उदाधर नाईं। जहँ जग पालक बैठि रहाई ॥
बहत्तर कोठा गंजधर नाऊँ। करनी मूल बसै तेहि ठाऊँ ॥
कोठा बहत्तर कहेउ बखानी। ले लख भीतर जो पहिचानी ॥
यह घट देखि देखि सोइ भाखा। बूझि बूझि साधू मन राखा॥
रामायन घट कहि समझाई। काया भीतर कथि दरसाई ॥
काया खोज मुक्ति जब होई। बिन खोजे सब गये बिगोई ॥
काया भीतर सब की पूजा। सिव सनकादि आदि नहिं सूझा ॥
बाहिर कथि कथि रहे भुलाई। काया भीतर वस्तु न पाई ॥
कोठा बहत्तरि हम कहि दीन्हा। कोऊ न काया भीतर चीन्हा ॥
सास्तर संसकिरत में फूले। ऋषी मुनी जोगेसुर भूले ॥
या से राह घाट नहिं पाई। बहे कर्म भौजल के माई ॥
अर्थ-प्रथम कोठा उतेसुर के नाम का है-जहाँ ब्रह्मा बैठकर वेद पढ़ाते हैं। दूसरा कोठा धर्म गंध
है, जहाँ विष्णु बैठकर ज्ञानचर्चा सुनाते रहते हैं॥
तीसरा कोठा धनुधर है, जहाँ शंकर बैठ कर योग कराते रहते हैं। चौथा कोठा रक्तमणि कहा
गया है-जहाँ वरुण बैठकर राज्य करते रहते हैं ॥
पाँचवाँ कोठा 'हरिसंग्रह' है-उस स्थान पर आक सुमेर पर्वत हैं। 'विजय धुंध' छठाँ कोठा कहा
जाता है, मन की सम्पूर्ण कलाएँ उस स्थान की परिक्रमा करती रहती हैं॥
घट रामायण / ८९
सातवें कोठे का नाम नगरा है—वहाँ अन्नदेव निवास करते हैं। आठवाँ कोठा 'रुक्मनताल' है, जहाँ
मदन गोपाल बैठे हैं॥
नवाँ कोठा गौड़ मनमानी है—जहाँ यह दुर्गति से माया बेहाल किए हुए है। दसवें कोठे का उघडू
नाम है—जहाँ सहस्र कोटि प्रकाश उत्पन्न होता है॥
ग्यारहवें कोठे का नाम 'करमीनी है-जिसकी ज्योति तीनों लोकों में समाई रहती है। बारहवें कोठे
का नाम 'विषमदेव' है—जहाँ देवता एवं मुनि ध्यान लगाए रहते हैं॥
पन्द्रहवें कोठे का नाम 'हम सुन्दर' है-जिस स्थान पर सुगंध निवास करती रहती है। सोलहवाँ
कोठा। अति सुर नाम का है, जिस स्थान पर पाँच बाजारें लगती हैं॥
सत्रहवें कोठे का नाम 'सिखर जल' है—जिस स्थान पर अठरा गंडक नदी है। अट्ठारहवें कोठे का
नाम कड़ेसुर है-जिस स्थान पर जीव के तेज का निवास है॥
उन्नीसवें कोठे का नाम बंक चल है, जहाँ सुहावती मुरली (निरन्तर) बजा करती है। बीसवाँ कोठा
'कुलंग' कहा जाता है-जहाँ पुष्य का सुहावना बाज बजता रहता है॥
इक्कीसवें कोठा का नाम भानसुर है, उस स्थान पर अचल निरंजना है। बाइसवें कोठे का नाम
'धुंधेसर' है। इसी स्थान पर मन का ध्यान निवास करता है॥
तेईसवाँ कोठा तरंगी ताल है, जिसने इस संसार में यम का जाल फैला रखा है। चौबीसवें कोठे का
नाम कंठसुर है-जहाँ सुमति एवं सुविचार निवास करते हैं॥
पच्चीसवें कोठे का नाम प्रकृति है, वहाँ मल के पति का स्थान है। छब्बीसवें कोठे का नाम मुदापल
है और प्रधान पवन वहाँ निवास करते हैं॥
सत्ताइसवें कोठे का नाम सुताचल है—अलीप (अनिलिप्त-निर्मल मन उस स्थान पर बैठा है।
अट्ठाइसवें कोठे का नाम धरनीधर है—वहाँ माया मोह निवास करते हैं॥
उन्नीसवें कोठे का नाम कमची है, उस स्थान पर बादल मेघ उठा करते हैं। तीसवाँ कोठा निर्मल
नाम का है—उस स्थान पर साहब का पलंग बिछा हुआ है॥
एकतीसवें कोठे का नाम करोपल है—उस स्थान पर नवों नाथ निवास करते हैं।। बत्तीसवें कोठे का
नाम बकासुर है—उस स्थान पर नौ कुत्ते बैठे हैं॥
तैतीसवें कोठे का नाम अनधू है, उस स्थान पर यम के तेज का निवास है। चौंतीसवें कोठे का नाम
'जमाउत' है—उस स्थान पर यमुना नदी निवास करती है॥
पैंतीसवाँ कोठा सकरदू सेतु है, जहाँ कामदेव झर-धर कर निवास करते हैं। छत्तीसवाँ कोठे का
नाम गनकूं है, उस स्थान पर क्रोचन तथा क्लेश दोनों बहते हैं॥
सैंतीसवाँ कोठा, अवधधुर धुंध है, जहाँ श्रीकृष्ण बैठकर फंदे डालते रहते हैं। अड़त्तीसवें कोठे का
नाम बाँसबल है, उस स्थान पर चौदह कामिनियाँ हैं॥
उन्तालिसवाँ करियाघर नाम का कोठा है-जहाँ दया तथा धर्म दोनों बैठे हैं। चालसवें कोठे का नाम
किरिकोता है—और उस स्थान पर सात समुद्र बहते हैं॥
एकतालीसवें कोठे का नाम भौंरा दे है—जहाँ नवों कुलों के नाग निवास करते हैं। बयालिसवें का
नाम कुम्भेसुर है जिस स्थान पर बारह कुम्भ निवास करते हैं॥
तैंतालिसवा भगताधर नाम का कोठा है—वहाँ भय तथा त्रास दोनों का निवास स्थान है। चौवालिसवें
का नाम कुसमाधर है—जहाँ चारों वेद निवास करते हैं॥
पैंतालिसवें का नाम मायारट है—जहाँ रोग और दोष निवास करते हैं। छियालिसवें कोठे का नाम
मलयागिरि है—जहाँ हंस तथा बिहंग दोनों निवास करते हैं॥
सैंतालीसवें का नाम हलासुर है—जहाँ अड़सठ तीर्थों का स्थान है। अड़तालिसवें का नाम कुकरेदर
है—इस विलक्षण कोठ में सत्य एवं पुण्य निवास करते हैं॥