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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 150 में से

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पृष्ठ 82

घट रामायण / ८९
सातवें कोठे का नाम नगरा है—वहाँ अन्नदेव निवास करते हैं। आठवाँ कोठा 'रुक्मनताल' है, जहाँ
मदन गोपाल बैठे हैं॥
नवाँ कोठा गौड़ मनमानी है—जहाँ यह दुर्गति से माया बेहाल किए हुए है। दसवें कोठे का उघडू
नाम है—जहाँ सहस्र कोटि प्रकाश उत्पन्न होता है॥
ग्यारहवें कोठे का नाम 'करमीनी है-जिसकी ज्योति तीनों लोकों में समाई रहती है। बारहवें कोठे
का नाम 'विषमदेव' है—जहाँ देवता एवं मुनि ध्यान लगाए रहते हैं॥
पन्द्रहवें कोठे का नाम 'हम सुन्दर' है-जिस स्थान पर सुगंध निवास करती रहती है। सोलहवाँ
कोठा। अति सुर नाम का है, जिस स्थान पर पाँच बाजारें लगती हैं॥
सत्रहवें कोठे का नाम 'सिखर जल' है—जिस स्थान पर अठरा गंडक नदी है। अट्ठारहवें कोठे का
नाम कड़ेसुर है-जिस स्थान पर जीव के तेज का निवास है॥
उन्नीसवें कोठे का नाम बंक चल है, जहाँ सुहावती मुरली (निरन्तर) बजा करती है। बीसवाँ कोठा
'कुलंग' कहा जाता है-जहाँ पुष्य का सुहावना बाज बजता रहता है॥
इक्कीसवें कोठा का नाम भानसुर है, उस स्थान पर अचल निरंजना है। बाइसवें कोठे का नाम
'धुंधेसर' है। इसी स्थान पर मन का ध्यान निवास करता है॥
तेईसवाँ कोठा तरंगी ताल है, जिसने इस संसार में यम का जाल फैला रखा है। चौबीसवें कोठे का
नाम कंठसुर है-जहाँ सुमति एवं सुविचार निवास करते हैं॥
पच्चीसवें कोठे का नाम प्रकृति है, वहाँ मल के पति का स्थान है। छब्बीसवें कोठे का नाम मुदापल
है और प्रधान पवन वहाँ निवास करते हैं॥
सत्ताइसवें कोठे का नाम सुताचल है—अलीप (अनिलिप्त-निर्मल मन उस स्थान पर बैठा है।
अट्ठाइसवें कोठे का नाम धरनीधर है—वहाँ माया मोह निवास करते हैं॥
उन्नीसवें कोठे का नाम कमची है, उस स्थान पर बादल मेघ उठा करते हैं। तीसवाँ कोठा निर्मल
नाम का है—उस स्थान पर साहब का पलंग बिछा हुआ है॥
एकतीसवें कोठे का नाम करोपल है—उस स्थान पर नवों नाथ निवास करते हैं।। बत्तीसवें कोठे का
नाम बकासुर है—उस स्थान पर नौ कुत्ते बैठे हैं॥
तैतीसवें कोठे का नाम अनधू है, उस स्थान पर यम के तेज का निवास है। चौंतीसवें कोठे का नाम
'जमाउत' है—उस स्थान पर यमुना नदी निवास करती है॥
पैंतीसवाँ कोठा सकरदू सेतु है, जहाँ कामदेव झर-धर कर निवास करते हैं। छत्तीसवाँ कोठे का
नाम गनकूं है, उस स्थान पर क्रोचन तथा क्लेश दोनों बहते हैं॥
सैंतीसवाँ कोठा, अवधधुर धुंध है, जहाँ श्रीकृष्ण बैठकर फंदे डालते रहते हैं। अड़त्तीसवें कोठे का
नाम बाँसबल है, उस स्थान पर चौदह कामिनियाँ हैं॥
उन्तालिसवाँ करियाघर नाम का कोठा है-जहाँ दया तथा धर्म दोनों बैठे हैं। चालसवें कोठे का नाम
किरिकोता है—और उस स्थान पर सात समुद्र बहते हैं॥
एकतालीसवें कोठे का नाम भौंरा दे है—जहाँ नवों कुलों के नाग निवास करते हैं। बयालिसवें का
नाम कुम्भेसुर है जिस स्थान पर बारह कुम्भ निवास करते हैं॥
तैंतालिसवा भगताधर नाम का कोठा है—वहाँ भय तथा त्रास दोनों का निवास स्थान है। चौवालिसवें
का नाम कुसमाधर है—जहाँ चारों वेद निवास करते हैं॥
पैंतालिसवें का नाम मायारट है—जहाँ रोग और दोष निवास करते हैं। छियालिसवें कोठे का नाम
मलयागिरि है—जहाँ हंस तथा बिहंग दोनों निवास करते हैं॥
सैंतालीसवें का नाम हलासुर है—जहाँ अड़सठ तीर्थों का स्थान है। अड़तालिसवें का नाम कुकरेदर
है—इस विलक्षण कोठ में सत्य एवं पुण्य निवास करते हैं॥