घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ / घट रामायण
सीता दसरथ राम कहाये। ये सब घट भीतर दरसाये॥
सरजू सुरति अवध दस द्वारा। ये घट भीतर देखि निहारा॥
रावन कुम्भ लंकपति राई। त्रिकुटी ब्रह्म बसे तेहि माहीं॥
रावन ब्रह्म कहा हम जोई। त्रिकुटी लंक ब्रह्म है सोई॥
मन्दोदरी भभीषन भाई। इन्द्रजीत सुत त्रिकुटी माहीं॥
ये संबाद कहा घट माहीं। रामायन घट माहिं बनाई॥
जो कोइ अंध जीव नहिं मानै। पुनि पुनि परै नरक की खानै॥
संतन की गति कोइ न जानै। पिंड माहिं ब्रह्मांड बखानै॥
उनकी गति मति कोइ कोइ जानै। बिन सतसंग नहीं पहिचानै॥
उनकी कृपा दृष्टि जब होइ। तब अदृष्ट को बूझै सोई॥
पिंड ब्रह्मांड सैल कोइ पावै। तब सतगुरु सत दया लखावै॥
अब ब्रह्माण्ड की कहौं लखाई। कोइ कोइ साधू बिरले पाई॥
जो कोइ भये अधर में लीना। जिन को आया संत अकीना॥
जिन जिन सुरति सैल घट कीन्हा। ता की गति मति बिरलै चीन्हा॥
अब मैं अपनी कहौं दृढ़ाई। सुरति सैल घट माहिं लखाई॥
रावन राम सकल परिवारा। ये घट भीतर चुनि चुनि मारा॥
और अनेक कहे बहु भाँती। ये सब माया की उतपाती॥
ये मत सत्त सत्त जिन माना। उनका आवागवन नसाना॥
या में कोई भर्म जो लावै। बार-बार चौरासी पावै॥
मैं अपने अस देख बखानी। संत कृपा से महुँ पुनि जानी॥
अब ब्रह्मांड पिंड कर लेखा। भाखा जोड़ निज नैनन देखा॥
अर्थ-अब मैं उस निष्कामी तथा अक्षर शून्य परम तत्त्व का वर्णन करता हूँ। अपनी सुरति ज्ञान से
जुड़े नाम का वर्णन करता हूँ। जिसको समझने या साधना करने से जीव माया से मुक्त हो कर इस
भवसागर से पार हो उठता है॥
संतों की कृपा से सत्संगति होती है और वह सतगुरु से मिलकर 'राम' नाम का स्नेही हो उठता है।
अब मैं उस आदि ब्रह्म की विलक्षण गति का वर्णन करता हूँ जो स्वयं पिंड देखकर (उसमें स्थित ब्रह्म
का) स्वयं विचार कर लेता हूँ॥
मैं जीव से सम्बद्ध सम्पूर्ण गतियों का भिन्न-भिन्न रूप से वर्णन कर रहा हूँ ताकि जीव उन्हें समझ
ले और उसकी भौतिक अभिलाषाएँ समाप्त हो उठें। अब मैं पिंड में स्थित ब्रह्मांड का वर्णन करता हूँ
और भिन्न-भिन्न रूप में उसे दिखाऊँगा॥
जो पिंड के बाहर है, वह पिंड के अन्तर्गत दिखाई पड़ता है, मैंने तो स्वयं समझकर सब कुछ पिंड
के अन्तर्गत देखा है। तुलसी साहब कहते हैं कि उसे पाकर पिंड में प्रविष्ट होकर (अनुभूति द्वारा उसे)
देखा है। इस पिंड के भीतर भिन्न-भिन्न अनेक सारे विवेक हैं॥
जैसे-जैसे संतों ने पिंड (घट) के विषय में जानकारी दी हैं, तुलसी साहब कहते हैं कि वैसा-वैसा