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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 78

घट रामायण / ८५
घट की थाह कोई नहीं जान पाया—इसी घट में पिंड तथा ब्रह्मांड समाये हुए हैं। इसी घट में ही
हाट-बाजार लगाया हुआ है-घट में ही वह दामिनि (विद्युत लेखा) है और यही मन अपने पति को प्राप्त
करता है॥
इस घट में अपार पर्वत तथा वृक्ष हैं और घट में ही विष्णु के दशावतार बैठे हुए हैं। इसी घट में
हाथी और घोड़े हैं और इसी में समस्त हिरण स्थित हैं॥
इसी घट में ऊँचे, नीचे, पर्वत, खोह (झल) और झाड़ियाँ (झाईं) हैं और यहीं रात-दिन झरने बहते
रहते हैं। इसी घट के अन्दर ही मगरमच्छ है-इसी घट में बस्तियाँ तथा उजाले हैं॥
घट में ही शुकदेव, व्यास, एवं मुनि नारद हैं-इसी घट में ऋषि, मुनि एवं सरस्वती देवी रहती है।
इसी घट में वरुण राजा (बरन) एवं कुबेर रहते हैं और इसी घट में आठों सुमेरु पर्वत सुशोभित
(मौडे-मण्डित) होते हैं॥
इस घट के विस्तार का कहाँ तक वर्णन करूँ। घट में अनेक प्रकार की रचनाएँ सजाई गई हैं। उन
सम्पूर्ण बातों का जो घट में स्थित है, मैं उल्लेख कर चुका हूँ। यह वर्णन इतना अधिक है कि उसके
निमित्त स्याही और कागज भी कम पड़ गए है॥
॥ दोहा ॥
घट भीतर जो देखिया सो भाखा विस्तार।
बेदी भेद जनाइया तुलसी देखि विचार॥
अर्थ—घट के भीतर जो देखा, उसका मैंने विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। तुलसी साहब कहते है कि
मैंने भेद का कारण एवं उसके अनेक भेदरूपों का अन्तर स्पष्ट कर दिया-उसे तुम देखो तथा विचार
करो॥
॥ छन्द ॥
सब ठीक बखाना घट परमाना। घट घट में सब ठाम ठई॥
बाहिर सोइ अंदर सब घट मन्दर। देखि हिये बस बास कही॥ १॥
बूझै कोई ज्ञानी अंतरजामी। मूरख मूढ़ न चेत भई॥
आगे पुनि गाऊँ बरनि सुनाऊँ। इन सब के अस्थान मई॥ २॥
तुलसी तन तारा खोलि किवारा। पैठि मँझारा सार लई॥
अर्थ—घट को प्रमाण के रूप में रखकर मैंने सारी बातें ठीक-ठीक कही हैं। घट में ही सभी के होने
के ठीक-ठीक स्थान हैं। जो बाहर है, वह सब घट रूपी मन्दिर के अन्दर है, हृदय के निवास को वहाँ
देखकर ये बातें कही हैं॥ १॥
इसे कोई अर्न्तयामी ज्ञानी ही बूझ सकते है-मूढ़ एवं मूर्ख के मन में इसका ख्याल नहीं आता। मैं
पुनः इस प्रसंग का आगे गान करके वर्णन करके सुनाता हूँ-जहाँ इनके स्थान हैं।
तुलसी साहब कहते हैं-इस शरीर के किवाड़ों के ताले को खोलो और सार तत्त्व को ग्रहण करके
इसी में बैठो॥ २॥
॥ सोरठा ॥
या विधि तन मन ग्यान भीतर देखा जोड़ कै।
साधू करौ प्रमान भिन्न भिन्न तत मत कहा॥
अर्थ—इस प्रकार, शरीर और मन का ज्ञान मैंने घट के भीतर जाकर देखा और अब साधु जन इस
भिन्न-भिन्न शरीर की कथाओं के प्रमाण हैं॥