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घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

९० / घट रामायण
उनचासवाँ मर्मों नाम का है-जिस स्थान पर पवन निरन्तर आकाश की ओर उठता रहता है।
पचासवें कोठे का नाम घूघर है और उस स्थान पर श्रीहरि का तेज निवास करता है॥
इक्यावनवाँ कोठे का नाम मजकूर है-उस स्थान पर सहस्रार कमल खिला हुआ है। बावनवे कोठे
का नाम जरा दे है-उस स्थान पर उच्च शिखा वाली अग्नि जलती रहती है॥
तिरपनवें कोठे का नाम तेराधर है, जहाँ धीर गम्भीर निवास किया करते हैं। चौवनवाँ कोठा सिसंदर
नाम का है-उस स्थान पर सत्य तथा सन्तोष निवास करते हैं॥
पचपनवें कोठे का नाम हिंडोला है, नवों नाड़ियाँ उस स्थान पर निवास करती हैं। छप्पनवें कोठे का
नाम निरधर है-जहाँ अठ्ठारहों भार निवास करते हैं॥
सत्तावनवें कोठे का नाम कफा दे है-जीव की मृत्यु वहाँ निवास करती है। अट्ठावनवें का नाम सुमेर
बल है-जहाँ मंगल नाम का पुरुष निरन्तर चरित्र गायन करता रहता है॥
उनसठवें कोठे का नाम 'छे सुन्दर' है-जहाँ स्वयं आलस्य निवास करता है। साठवाँ कोठा धौलासुर
है-तीनों लोकों की पृथ्वी वहाँ निवास करती है॥
इकंसठवें कोठे का नाम जैसुन्दर है-शक्तिशाली पुरुष वहाँ निवास करते हैं। बासठवाँ कोठा हीरापुर
नाम का है-वहाँ निरन्तर झर झर कर जल चूता रहता है॥
तिरसठवें कोठे का नाम कलाकर है-जिस स्थान पर चौदहों भुवन निवास करते रहते हैं। चौसठवाँ
कोठा तिल विक्रम कहलाता है, उस स्थान पर जल, स्थल तथा कुम्भ तीनों का निवास है॥
पैंसठवें कोठे का नाम सुरत सर है-जहाँ सभी जप, तप एवं यज्ञ करते हैं। छियाछठवाँ कोण
शिखरिकल है-जहाँ असंख्य योगी योग करते हैं॥
सरसठवाँ कोठा आनन्दी माँ का है-वहाँ काल निवास नहीं करने पाते। अड़सवें कोठे का नाम
'चिता दे' है-उस स्थान पर चित्त का चक्र निरन्तर घूमा करता है॥
उनहत्तरवें कोठे का नाम सनीता है, जहाँ ज्ञानी बुद्ध निवास किया करते हैं। सत्तरवाँ कोठा सलीका
नाम का है जहाँ शून्य की धुन निरन्तर उठती रहती है॥
इकहत्तरवाँ कोठा उदाधर नाम का है, जहाँ संसार के पालन कर्त्ता ईश्वर बैठे रहते हैं। बहत्तरवें
कोठे का नाम गंजधर है जिस स्थान पर मूल कर्म (करनी) बैठी रहती है॥
मैंने इस प्रकार, बहत्तर कोठों का बखान करके वर्णन किया है-जो पहचान में आए उसे हे
साधुजन! तू अपने घर में (भीतर) पहचान ले। इस घट को देख-देखकर इसके विषय में वही कह
सकता है-जिसने समझ-समझ कर साधुजन की रक्षा की है॥
इस प्रकार, मैंने घट रामायण कहकर समझाया है और उसे कह करके घट के भीतर दिखाया भी
है॥ काया में ही इन सबको खोजकर मुक्ति प्राप्त करो क्योंकि बिना खोज सब विनष्ट हो उठते ॥
शरीर (घट) के भीतर ही सबकी पूजा है-शिव-सनकादि बिना साधना एक सूझते नहीं (अतः
साधना करके) उन्हें समझो। उनको बाहर मानकर कहते-कहते सब भूल गए किन्तु काया के भीतर
उन्हें मूलतत्त्व (वस्तु) नहीं दिखा॥
हमने बहत्तर कोठों में उन्हें बताकर कह दिया है और किसी ने भी उन्हें शरीर के भीतर नहीं पहचाना
है। विद्वान अपने संस्कृत के शास्त्र ग्रंथों में गर्व से फूले रहते हैं, और ऋषि, मुनि तथा योगेश्वर भी
अहम्भाव में भूले हुए दिखते हैं॥
इसी कारण उन्होंने न अध्यात्म का मार्ग प्राप्त किया और न उसका कोई घाट तथा वे भवजल के
बीच कर्म के भ्रम तथा अहम् में बह गए॥
॥ दोहा ॥
सत्तनाम सुरति गहै सत गुरु सरन निवास।
तुलसी तरंग तरास ज्यों लखि पहुँचे तेहिं पास ॥

घट रामायण / ९१
अर्थ-सुरति समाधि द्वारा सत्य के नाम का ग्रहण करके जो सतगुरु की शरण में निवास करता है-
जैसे तरंगों की लहरें अन्ततः उसको देखती हुई। वह सभी समुद्र-ब्रह्म के पास पहुँच जाती हैं॥
॥ छन्द ॥
घट की गति गाई भाखि सुनाई। लखि पाई पद पार कही॥
जो जो परमाना घट मठ जाना। ठाम ठिकाना ठौर मई॥ १॥
तुलसी तस देखा घट बिच लेखा। पेखा तत मत पूर जही॥
आगे जस होई भाखौं सोई। जो जो सिद्ध समाधि लई॥ २॥
अर्थ-घट के ज्ञान को गाकर तथा कहकर सुना दिया और उसे मैं उस पार पाकर देखा और उसके
विषय में कहा। मैं घट के मठ का जो-जो प्रमाण, स्थान, ठिकाना ठौर जानता था (वर्णन किया) ॥ १॥
तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने इस पिंड के बीच जैसा देखा था, वैसा-वैसा पूरी तरह से बता दिया।
आगे उसका जो अन्य रूप होगा, उसका वैसा ही वर्णन करूँगा, जिन रूपों में सिद्धों ने समाधि में देखा
है (प्राप्त किया है)-उसको भी उसी रूप में वर्णित करूँगा॥ २॥
॥ सोरठा ॥
सिध चौरासी नाम, घट भीतर सब देखिया।
ता कर कहों बखान, जस जस ठीका नाम गुन॥
अर्थ-सिद्धों के चौरासी नाम (रूप) हैं-जिन्हें मैंने घट के भीतर देखा है। उनके नाम तथा गुण
जिस-जिस प्रकार से ठीक लगेंगे, मैं उनका इस प्रकार वर्णन करूँगा॥
॥ चौपाई ॥
सिध चौरासी घट में होई। ता को देखा सुरति बिलोई॥
ता कर ठौर ठिकाना भाखों। आदि अंत ठीक कर ताकों॥
सिद्ध सिद्ध के नाम बताओं। छानि भेद सूच्छम दरसाओं॥
अर्थ-चौरासी सिद्ध घट के भीतर हैं, जिनको मैंने सुरति समाधि में खोकर (निमग्न होकर) मैंने
देखा है अब उनके ठौर तथा ठिकानों का वर्णन कर रहा हूँ और आदि से अन्त तक उसे सुधार कर
भी॥
सिद्धों के सिद्ध नाम कहता हूँ, उनके भेदों को छानकर (निचोड़कर) उनके सूक्ष्म संदर्भों का भी
वर्णन कर रहा हूँ॥
॥ सिद्धों के नाम ॥
१. अजोनी सिद्ध १०. जैदेव "
२. अजर दया " ११. नलमोवर "
३. पवनगिरि " १२. परसोतम "
४. उचंद कँवल " १३. त्रिकुटीकमल "
५. उदद कँवल " १४. पुरुषोपत "
६. पेषनादार " १५. नलवोती "
७. नालीवर " १६. बाझभक्ष "
८. कोमार " १७. नाल पाजरी "
९. बालागिर " १८. पायापाल "

९२ / घट रामायण
१९. जैपाल ” ५२. सुचलेन ”
२०. अजया काल ” ५३. मजा गुनी ”
२१. केदारली ” ५४. तानी गंभीर ”
२२. रतनागिरि ” ५५. जगपती ”
२३. मेलमहंत ” ५६. गंधर्व सूत ”
२४. उदया ” ५७. रतनागिरि ”
२५. झकझेला ” ५८. सरोज मल ”
२६. उषमजार ” ५९. कुल कुम्भ ”
२७. मनउतगिरि ” ६०. पिगोभ ”
२८. सरपसोष ” ६१. गौड़ आसन ”
२९. जंभीर नागर ” ६२. पक्ष पती ”
३०. हंस मोह ” ६३. भाठ नाद ”
३१. बिराज ” ६४. गोहप माल ”
३२. ललित दया ” ६५. नरदया ”
३३. करुनामय ” ६६. इंद्र मनी ”
३४. बाष जार ” ६७. हंभीर ”
३५. जीव भूषन ” ६८. कहूक्तितोहल ”
३६. उदीत साह ” ६९. जंभीर नाद ”
३७. जगतधार ” ७०. द्याल पती ”
३८. साह पाल ” ७१. नेनौगार ”
३९. परन पोष ” ७२. काल मुनी ”
४०. नौनागर ” ७३. प्रेम मुनी ”
४१. ज्ञानपती ” ७४. हंस करनाग ”
४२. साधगिरि ” ७५. मल मोद ”
४३. नलदेव ” ७६. कूर नाकर ”
४४. सहस अपढ़ ” ७७. सुधन सरीष ”
४५. सुकृत जीव ” ७८. सुरति लोक ”
४६. ऊँच माया ” ७९. साध बाच ”
४७. सिंह नाद ” ८०. सुख बाच ”
४८. सहज तेज ” ८१. नेह नाच ”
४९. बेरंग नाद ” ८२. बस करन ”
५०. फूल काज ” ८३. भय मेटन ”
५१. केदार कोठ ” ८४. सुच भाव ”
॥ चौपाई ॥
चौरासी सिधि कथि बतलाई। सिधि इतने घट भीतर छाई॥
साधू कोइ करै परमाना। जिन घट के अंदर पहिचाना॥
अर्थ—चौरासी सिद्धों का कथन करके बतला दिया, यही इतने ही सिद्ध घट के भीतर स्थित
(छाये) हैं। जिन्होंने घट के अन्दर पहचान कर ली है, ऐसा ही कोई साधु ही उनका प्रमाण देगा॥

घट रामायण / ९३
॥ सोरठा ॥
चौरासी सिधि देख, घट रामायन में कहे।
अंतर काया पेखि, भिन्न भिन्न दरसाइया॥
अर्थ-चौरासी सिद्धों को घट के भीतर देखकर मैं घट रामायण में उन्हें कहता हूँ। शरीर के अन्दर
इन सिद्धों को देखकर कोई अन्य इन्हें भिन्न-भिन्न ढंग से कह सकता है॥
॥ चौपाई ॥
प्रकृति पचीस कहौं अनुसारी। ये सब घट के माहिं बिचारी॥
काया भेद देखि हम चीन्हा। ता कर लच्छ भाखि सब दीन्हा॥
अर्थ-पच्चीस प्रकृति अपनी बुद्धि के अनुसार बताता हूँ। इन सभी को घट के बीच विचार करो।
इनके स्वरूप भेद को देखकर हमने पहचान लिया और उनका लक्षण भी हमने बतला दिया है।
॥ सोरठा ॥
प्रकृती भेद बिचार, नाम नीक सबकी कही।
तुलसी तनहिं निहार, मन इस्थिर जब होइ जेहि॥
अर्थ-प्रकृति भेद को विचार करके उनका ठीक-ठीक नाम भी मैंने बताया है जब जिस क्षण मन
स्थिर हो, उस समय उनकी ओर देखकर (उन्हें पहचानो)॥
॥ चौपाई ॥
कौन कौन प्रकृति रे भाई। ता कर घर मैं देंव बताई॥
अर्थ-हे भाई! कौन कौन प्रकृति हैं उनको तुम घट के भीतर आकर देखो॥
॥ प्रकृतियों के नाम ॥
१. भाव प्रकृति १३. चंचलराज "
२. क्रता " १४. मजा गुन "
३. देंहधर " १५. मजा नन्द "
४. उषमजार " १६. अभयानन्द "
५. इद्रजै " १७. चतुरदया "
६. मोहदधि " १८. कजाकोग "
७. सुषम जार " १९. उचालम्भ "
८. मोह धन " २०. दया भवन "
९. केदार खंड " २१. ईस भोग "
१०. सफाकन्द " २२. कामिनि जोग "
११. नलदया " २३. मोहजार "
१२. उदासमुद्र " २४. नौ जोग "
२५. भँवर सोग "

२४ / घट रामायण
प्रकृतियों के नाम
१. भाव प्रकृति १४. भजा गुन "
२. क्रता " १५. मजानन्द "
३. देंहधर " १६. अभयानन्द "
४. उषमजार " १७. चतुरदया "
५. इंद्रजै " १८. कजाकोग "
६. मोहदधि " १९. उचालम्भ "
७. सुषम जार " २०. दया भवन "
८. मोह धन " २१. ईस भोग "
९. केदार खण्ड " २२. कामिनि जोग "
१०. सफाकन्द " २३. मोहजार "
११. नलदया " २४. नौ जोग "
१२. उदासमुद " २५. भँवर सोग "
१३. चंचलराज "
॥ चौपाई ॥
प्रकृति पचीस यही हैं साधौ। सब जीवन को इन्हीं बाँधौ ॥
सत्य सत्य मैं भाखों भाई। इन कर भेद कहौं समझाई ॥
पच्चीसों का घर हम भाखा। सत्य सब्द हिरदे में राखा॥
प्रकृति पचीस कहौं समझाई। मूढ़ जीव ज्ञानी होइ जाई ॥
अर्थ-हे साधुजन! पच्चीस प्रकृतियाँ यही हैं-समस्त जीवों को इन्हीं से बाँधों। हे भाई! मैं पूर्णतः
सच-सच कह रहा हूँ। इनका भेद मैं समझा रहा हूँ॥
इन पच्चीसों के घट का हमने वर्णन किया है (इनके वर्णन के संदर्भ में) मैंने सत्य शब्द को हृदय
में रखा है-मैं इन पच्चीस प्रकृतियों को समझाकर कहता हूँ, इनसे मूढ़ जीव ज्ञानी हो उठेगा ॥
॥ प्रकृति के सुभाव ॥
१. भाव को सुभाव आलस निद्रा जम्हाई।
२. क्रता को " काम क्रोध बिकार।
३. देंहधर को " खावै पीवै सुख बिनोद।
४. उषमजार को " मोर तोर निंद्रा
५. इंद्रजै को " हँसै खेलै रोवै।
६. मोहदधि को " मान गुमान बड़ाई प्रभुता।
७. सुषमजार को " उच्चाट भय त्रास और दण्ड
८. मोह धन को " सिकार उदासी जारै बारै जीव
जन्त्र मन्त्र सेवा करै।
९. केदार खंड को " एक काम चित्त रहै कामिनि

घट रामायण / ९५
सुख।
१०. सफाकन्द को " चोरी से राति बिराति आवै जावै।
११. नलदया को " होम बहुत करै और आसा
लगावै।
१२. उदासमुद्र को " चित चंचल छगुनिया टेढ़ा चलै
कर मोड़े
१३. चंचल राज को " खरा लेवै खरा देवै खरी बात
खरा रहे
१४. मजा गुन को " निडर निरभय निरमोह।
१५. मजा नन्द को " दया धर्म पुन्य षट कर्म।
१६. अभयानन्द को " तीरथ बरत मठ बनावै।
१७. चतुरदया को " बहुत गावै बतावै नाचै नैन उलारै।
१८. कजाकोग को " झूठ बोलै मीठा रहे स्वारथ रत।
१९. उचालंभ को " ज्ञान ध्यान गुरू सब्द कुछ न
रक्खै।
२०. दया-भवन को " नीके कपरा खाना बिछौना नीक
बसिवौ।
२१. ईस-भोग को सुझाव
देव पूजै " फूल पत्र चढ़ावै पीछे द्रव्य माँगे।
२२. कामिनि-जोग को " भले मनुष्यन में रहे ऊँचे संग बैठे
नीचे संग न करै अच्छी बात कहै
और प्रीति न तोरै।
२३. मोहजार को " कुबचन भाखै पहिले दे पीछे माँगे
माया तकै।
२४. नौजोग को " तरंग बाहिर मन भरमै शोक
में रहे।
२५. भँवर-जोग को " मीठा बोलै कौड़ी जाते
प्रान जाय।
॥ चौपाई ॥
देखौ संतौ प्रकृति सुभाऊ। ये सुभाव घट माहिं रहाऊ॥
अर्थ--हे सन्तों! प्रकृति के स्वभाव को देखें-ये समस्त स्वभाव घट के भीतर निवास करते हैं।

९६ / घट रामायण
॥ सोरठा ॥
यह सुभाव घट माइँ, भिन्न भिन्न करि भाखिया।
लेखा अजब बनाइ, चीन्हें सुरति सँवारि कै॥
अर्थ–ये स्वभाव घट के भीतर हैं–मैंने इनको भिन्न-भिन्न रूप में रखकर उनका वर्णन किया है–
मैंने इन्हें आश्चर्यजनक बनाकर रखा है–इन्हें सुरति समाधि में भलीभांति सँवार कर समझो॥
॥ चौपाई ॥
घट भीतर नौ नारी भाखी। सो तुलसी ने देखा आँखी॥
अर्थ–घट के भीतर मैंने नौ नाड़ियों का वर्णन किया है। उन्हें तुलसीदास ने सही-सही देखा है–
॥ नाड़ियन के नाम ॥
१. इड़ा नाड़ी 6. कर जाप नाड़ी
२. पिंगला " ७. हंस-बंदनी "
३. सुषमना " ८. हरि कामिनि "
४. भामिनी " ९. बरना "
५. रमना "
नाड़ियन के नाम
१. इड़ा नाड़ी 6. कर जाप नाड़ी
२. पिंगला " ७. हंस-बंदनी "
३. सुषमना " ८. हरि कामिनि "
४. भामिनी " ९. बरना "
५. रमना "
॥ पाँच इंद्रियन के नाम ॥
१. अपान इंद्री ४. उदान इंद्री
२. प्रान इंद्री ५. ब्यान "
३. समान "
इंद्रियों के नाम
१. अपान इंद्री ४. उदान इंद्री
२. प्रान इंद्री ५. ब्यान "
॥ इंद्रियन के बास ॥
१. अपान का बास – नाभी में है।
२. प्रान का बास – मान सरोवर तट वार है।
३. समान का बास – कलेजे में है।
४. उदान का बास – कंठ में है।
५. ब्यान का बास – सब शरीर में है।

घट रामायण / ९७
इंद्रियों के बास
१. अपान का बास—नाभी में है।
२. प्रान का बास—मान सरोवर तट वार है।
३. समान का बास—कलेजे में है।
४. उदान का बास—कंठ में है।
५. व्यान का बास—सब शरीर में है।
॥ सोरठा ॥
इंद्री अर्थ बिचार, नाम भेद सब भाखिया।
ठीका ठौर निहार, यह पुकार तुलसी कहा॥
अर्थ–इन्द्रियों के अर्थ पर विचार करते हुए उनके नाम और सभी भेदों का वर्णन कर दिया है।
उनके ठौर-ठिकाने को देखकर तुलसी ने यह सब पुकार कर बताया है॥
॥ सोरठा ॥
यह इंद्री का किया निषेदा। मन चीन्है सोई जाने भेदा॥
या की साखि सोत सब गाई। अब सुन्नन की कहौं लखाई॥
बाइस सुन्न सोध हम लीन्हा। ताकर भिन्न भिन्न कहूँ चीन्हा॥
अर्थ–यहाँ यह घट वर्णन इन्द्रियों का निषेध है–जिसने मन को पहचान लिया है, वही भेदों को भी
जानता है। इसकी साक्षी तथा उसके स्रोतों को मैंने गान किया। अब शून्य का वर्णन करता हूँ। मैंने शोध
करके बाईस सून्नों को समाया है और उनकी भिन्नताओं को मैंने भिन्न-भिन्न रूप में पहचाना है॥
॥ सुन्नन के नाम ॥
१. धुंधार सुन्न १२. नौखंड सुन्न
२. सब्दार '' १३. अलख ''
३. नौनार '' १४. पलक ''
४. अजसार '' १५. खलक ''
५. बिलंद '' १६. झलक ''
६. सुखनंद '' १७. सरवाट ''
७. अछरंद '' १८. दसघाट ''
८. सबसंध '' १९. खिरकाट ''
९. ब्रह्मांड '' २०. अजआठ ''
१०. सबअंड '' २१. सतलोक ''
११. भौभंड '' २२. परमोख ''
॥ शून्यों के नाम ॥
१. धुंधार शून्य १२. नौखंड शून्य
२. सब्दार '' १३. अलख ''
३. नौनार '' १४. पलक ''

१८ / घट रामायण
४. अजसार " १५. खलक "
५. बिलंद " १६. झलक "
६. सुखनंद " १७. सरवाट "
७. अछरंद " १८. दसघाट "
८. सबसंध " १९. खिरकाट "
९. ब्रह्मांड " २०. अजआठ "
१०. सबअंड ब्रह्मांड " २१. सतलोक "
११. भौंभंड " २२. परमोख "
॥ सोरठा ॥
बाइस सुन बर्तमान, जानि संत कोइ परखिहै।
गगन गगन परमान, सुन्न सुन्न भिनि भिनि लखै॥
अर्थ-इस बर्तमान बाईस शून्यों को समझ कर कोई सन्त परखेगा। शून्य के लिए आकाश ही प्रमाण
है और उसमें भिन्न-भिन्न रूपों में शून्य दिखाई पड़ता है॥
॥ चौपाई ॥
सुन्न बाइस कौ भाखौं लेखा। सो कोइ साधू करै बिबेका॥
भिन्न भिन्न ग्रंथन में गाई। बूझै वोही भेद जिन पाई॥
सुन्न सुन्न निज निरनै भाखा। तुलसी निरखि देखि निज आँखा॥
अर्थ-मैंने बाईस शून्य के सन्दर्भों का वर्णन किया-उसका कोई साधु ही विवेकपूर्वक उल्लेख
करेगा। यद्यपि भिन्न-भिन्न ग्रंथों में शून्य का गान किया गया है किन्तु उसे वही समझेगा-जिसने उसको
प्राप्त कर लिया है। मैंने शून्य का निर्णय कहा है-अपनी इस आँखों से भलीभाँति निरख करके॥
॥ सोरठा ॥
कह निरनै निरधार, सुन्न सुन्न बिधि यों कही।
सुरति उतर गई पार, सुन्न बाइस वर भाखिया॥
अर्थ-शून्य की शून्य विधि को इस प्रकार से निर्धारित करके मैंने बताया है। इस बाईस शून्य का
वर्णन सुनकर सुरति समाधि उस पार उतर गई अर्थात् उसने मुक्ति का अनुभव किया॥
॥ चौपाई ॥
बाइस सुन का कहौं बखाना। सुन्न सुन्न का ठौर ठिकाना॥
जो जेहि सुन्न जौन अस्थाना। भाखौं जोई सुन्न जेहि नामा॥
सत्तलोक सत के तहँ राजा। रामायन में भाख समाजा॥
सत्त केत सत नाम कहइया। ता से निरगुन ब्रह्म जो भइया॥
सोला निरगुन कहि कै भाखा। भिनि भिनि भेद कहौं मैं ताका॥
एक सुन्न इक निरगुन होई। निरगुन सुन्न एक है सोई॥
निरगुन चौधा चौधा सुन्नी। पद्मा धर्म सुन्न है भिन्नी॥
सोला सुन्न निरंजन नामा। रचा ताहि ब्रह्मांड समाना॥

घट रामायण / ९१
सत्तनाम से उपजा सोई। ऐसे सोला निरगुन होई॥
यह सब पिंड ब्रह्मांड के माईं। सोला निरगुन सुन्न समाई॥
अर्थ-मैं बाइस शून्यों का वर्णन करता हूँ इस शून्य के शून्य स्थान का ठौर ठिकाना इस प्रकार है।
जो जहाँ है, और जिस शून्य का जो स्थान है और उस शून्य का वैसा नामकरण क्यों हुआ है-मैं उन
सबका वर्णन करता हूँ॥
सत्यलोक (एक शून्य है) में सत्यभाव के राजागण हैं-उस समाज का वर्णन रामायण में किया
गया है। उनकी ध्वजा सत्य की है, उनका नाम सत्यकेतु है-उन्हीं से निर्गुंण ब्रह्म उद्भूत हुआ है॥
सोलह निरगुणों को मैंने कहकर बताया है, उनके मैं भिन्न-भिन्न भेदों का वर्णन करता हूँ।
एक शून्य है, एक निर्गुण है, एक निर्गुण शून्य है। चौदह निर्गुण हैं और चौदह शून्य हैं-पन्द्रहवाँ
शून्य भिन्न-भिन्न धर्म रूप है।
सोलहवें शून्य का निरंजन नाम है-और उसको ब्रह्मांड की भाँति रचा गया है। वह सत्यनाम से ही
अवतरित हुआ है-सोलह निर्गुण इसी प्रकार के ही हैं॥
ये सभी पिंड तथा ब्रह्माण्ड के मध्य हैं इस प्रकार सोलह निर्गुंण शून्य में समाये हैं॥
॥ सोरठा ॥
छै सुन बाइस माँहि रहा भेद आगे कही॥
तुलसी निरखि निहार सुन बाइस चढ़ि देखिया॥
अर्थ-बाइस शून्य में इस प्रकार छः शून्य हैं, इनके भेदों को मैं आगे कहता हूँ। तुलसी साहब कहते हैं
कि इन्हें खूब समझ कर देखो। इन बाइस शून्यों के पर चढ़कर इन्हें देखा है॥
॥ मंगल ॥
सुन सुन री सखि, सैन बैन पिय के कहौं।
बोलै मधुरे बोल, चोल चित्त में सहौं॥ १॥
छिन छिन रहौं पिय, पास स्वाँस कहुँ ना रुचै।
जैसे जल बिन मीन, तलफ मन के बिचै॥ २॥
सुन सखि चैन चिनाव, भाव बिधि में मिली।
छूटी तन मन आस, पास पिय के चली॥ ३॥
चौथा भवन भौ पार, सार सुन में गई।
पुनि पंद्रा के पार, सोला सही॥ ४॥
सोला लोक मँझार, तार स्रुति से चखी।
निराकार जहाँ जोति, होत हिये में लखी॥ ५॥
सत्रा सुरति चलि चाल, ताल तट देखिया।
मान सरोवर घाट, हंस तहँ पेखिया॥ ६॥
एक हंस छबि तेज, कोटि रबि राजही।
सोभा भूमि अपार, सो हंस बिराजही॥ ७॥
करि हंसन सँग केल, सैल आगे चलो।

१०० / घट रामायण
आली अगम की साख, आँख हिये की खुली॥८॥
सुन अठरा के माहि, जाइ निर्ख देखिया।
आतम से परे भिन्न, परमातम पेखिया॥९॥
सुन्न उलट उन्नीस, चेति आगे चली।
खिरकी अजब अनूप, पुरुष ता में मिली॥१०॥
परे पुरुष पद चीन्ह, गई सुन बीस में।
सत्त पुरुष सुख धाम, सुन्न इक्कीस में॥११॥
गैब नगर पिय पार, सखी सतलोक ही।
चढ़ी अगमपुर धाइ, पाइ पति पै गई॥१२॥
सत्त पुरुष की पैज, सेज पति की लई।
गई भवन के माहिं, पाइ जस जो कही॥१३॥
बाइस सुन बर्तमान, जान कोइ लेइँगे।
कीनी जिन जिन सैल, संत सोइ कहिँगे॥१४॥
तुलसी निज तन तूल, मूल मन में बसी।
जिन बूझा नहिं भेद, बेद भौ में फँसी॥१५॥
अर्थ-हे सखी-सुन लो, सुन लो, मैं अपने पति (ब्रह्म) की वाणी एवं नेत्र भंगिमाओं के विषय
बताती है। वह बड़ी ही मधुरवाणी बोलता है और उसकी वियोग पीड़ा चित्त में सहती रहती हूँ॥१॥
क्षण-क्षण में प्रिय के पास रहती हूँ, अन्यत्र कहीं मेरी श्वासवृत्ति ही नहीं रुकती और मन के बीच
में होते हुए उसके लिए ऐसे तड़पती रहती हूँ-जैसे जल के बिना मछली॥२॥
हे सखी! सुनो, मेरे चित्त की शांति, चितवन एवं आत्मीय भाववृत्ति सभी को उनसे जुड़कर मिल
गई हूँ और अब तो मैं प्रिय के पास ही चल पड़ी, अतः इस शरीर एवं मन की आशा की छूट चली
है॥३॥
चौंधे भवन (संधि) को पार करके मैं मूल तत्त्व शून्य में जा पहुँची और पन्द्रहवें शून्य के उस पार
सोलहवें में आ गई॥४॥
इस सोलहवें शून्य के मध्य मैं श्रुति के द्वारा उसका आनन्द चखा और मैंने इसी हृदय में ही ज्योति
को निराकार होते देखा॥५॥
सत्तहवें शून्य में सुरति साधना के द्वारा चलकर मैंने उस सरोवर तट को जाकर देखा, यह मान
सरोवर का और वहाँ मैंने हंस (निर्मल आत्मा) को देखा॥६॥
अत्यन्त जेतवान एवं छविवान एक हंस करोड़ों सूर्य की भाँति शोभित था। उस स्थल का सौन्दर्य
अद्वितीय था और वह हंस वहीं विराजमान था॥७॥
मैं हंसों के साथ क्रीड़ा करके पर्वत शिखर के आगे चल पड़ी-हे सखी! उस अगम के साक्ष्य से
हृदय की आँखें खुल गई॥८॥
उस अट्ठारहवें शून्य के मध्य जाकर भलीभाँति देखा तो मुझे वहाँ आत्मा से भिन्न परमात्मा दिखलाई
पड़ा॥९॥
मैं उस अट्ठारहवें शून्य को उलटकर उन्नीसवें की ओर चली। वहाँ एक अनुपम एवं आश्चर्यजनक
खिड़की दिखाई पड़ी, जिसके अन्दर वह आदिपुरुष था॥१०॥

घट रामायण / १०१
उसके चरणों को पहचान कर मैं आगे बीसवें शून्य में पहुँची, और आगे इक्कीसवें शून्य में आनन्द
धाम सत्य पुरुष था॥ ११॥
हे सखी! उसके बाद सामने के प्रिय नगर को पारकर मैं 'सत्यलोक' पहुँची और अगमपुर पर दौड़े
कर चढ़ी तथा वहाँ पति को पाकर उस तक पहुँची॥ १२॥
सत्यपुरुष को पाने की, (इस प्रकार मेरी) मेरी प्रतिज्ञा पूरी हुई और पति की सेज प्राप्त की। उस
भवन के मध्य मैंने जो कुछ पाया, उसे वैसा ही बता दिया॥ १३॥
बाइसवाँ शून्य आगे है-उसे समझकर कोई प्राप्त करेंगे। जिन-जिन सन्तों ने यहाँ पर्वत शिखरों पर
विश्राम किया है, वही उसे बताएँगे॥ १४॥
तुलसी साहब कहते हैं कि यह शरीर रूई की भाँति नश्वर है, मूलात्मा तो चित्त में निवास करती है।
जिन्होंने इसके रहस्य को नहीं समझा है, वे वेद के भवजाल में फँसे है॥ १५॥
॥ सोरठा ॥
स्रुति पद परम निवास, चढ़ि अकास पति पै गई।
पिय पद सुरतिबिलास, सेज बास जल जस कही॥ १॥
पिय मोरे दीनदयाल, काटि जाल न्यारी करी।
अमर बुटी अज माल, सो पियाइ मो कौ दई॥ २॥
पिय पद पूर पियास, अमी पियाइ अमर करी।
सूरति अगम निवास, महल बास अपने करी॥ ३॥
अर्थ-वेद के परम स्थलस्वरूप उस परम निवास में स्थित शून्याकाश पर चढ़कर वह पति के पास
गई। प्रिय के उस निवास स्थल (पद) के सुरति विलास में जैसे-जैसे वर्णित है, तदनुसार उसने (प्रियतम
की) सेज पर रही॥ १॥
मेरा पति दीन दयाल है और उसने मेरी माया की जाल को काटकर मुझे उससे अलग किया और
अजपाजाप अभी माला की अमर बूटी मुझे पिला दी॥ २॥
प्रिय पद के साथ ही मेरी प्यास पूरी हुई और उसने अमृत पिलाकर अमर कर दिया। मेरा निवास
सुरति समाधि के अगम महल में हो गया और अपने साथ उस महल में रख लिया॥ ३॥
॥ दोहा ॥
पिय प्रभुता निज धाम, काम टहल मो कौ कही।
रही भवन के माहिं, अमल बास मो पै नहीं॥
अर्थ-उसकी प्रभुता उसके उस भवन में दिखी और उसने अपने भवन में टहल (भृत्य कर्म) के
लिए कहा। मैं इस तरह उसके भवन में रही-मुझ पर माया के नशे की गंध अब लेश मात्र भी नहीं रही॥
॥ सोरठा ॥
पृथ्वी पवन अकास, नीर नास सब होइँगे।
अगिन सूर अरु चंद, बँद बास पुनि पुनि नसै॥
अर्थ-पृथ्वी, आकाश, जल, वायु इन सबका विनाश होगा, अग्नि, सूर्य, चन्द्र ये सभी माया की
गंध के वश (बंद) में हैं, सब का बार-बार विनाश होगा॥

१०२ / घट रामायण
॥ चौपाई ॥
पिय सँग अजर अमर भया बासा। आदि अंत हमरा नहिं नासा।
अर्थ-मेरा निवास प्रिय (ब्रह्म) के साथ अजर-अमर हो उठा और अब हमारा विनाश नहीं होगा॥
॥ मंगल ॥
अमर बूटी मोरे यार, प्यार पिया ने दई।
काटी जम की जाल, काल डर ना रही॥ १॥
मैं पिय मोर अनूप, रूप पिय में गई।
दरसै एकै नूर, सूर स्रुति से भई॥ २॥
जुगजुग अमर अहवात, साथ पिय के सखी।
जावँ न आवों हाथ, साथ पिय के पकी॥ ३॥
नौतम निरखि निहारि, सार दसवें वही।
आगे अजब अजूब, खूब खुलि कै कही॥ ४॥
पिय मोरे दीन-दयाल, चाल चीन्हा सही।
सुख सागर सुख चौज, मौज मुख से दई॥ ५॥
अंड खंड ब्रह्मांड, कोई करता नहीं।
हमार सकल पसार, सार हम से भई॥ ६॥
धरती गगन अकास, नास सब होइँगे।
अगिनि पवन जल नास, हमीं हम रहेंगे॥ ७॥
ब्रह्मा बेद नसाय, बिस्नु सिव ना बचैं।
बचै नहीं बैराट, कहनि कहौं को पचै॥ ८॥
कोई न पावै अंत, संत हम को लखै।
तुलसी बिधि बेअंत, अंत कहि को सकै॥ ९॥
अर्थ-मेरे यार, मेरे प्रिय न प्यार की मुझे अमर बूटी दी है, उन्होंने यम के जाल को काट डाला
और अब काल का भी डर नहीं है॥ १॥
मेरा प्रिय और उसके साथ मैं भी अनुपम हो उठी औ पति के रूप में ही खो गई। वेद के प्रकाश में
हम दोनों का प्रकाश एकमेव हो उठा और एक तरह का दिखाई पड़ता है॥ २॥
हे सखी! मेरा सौभाग्य युग-युग तक प्रिय के साथ ही अमर हो उठा। मैं, अब गमनागमन (जाँव व
आँखों) के बन्धन से मुक्त हो उठी-प्रिय के साथ ही तन्मय होकर एक जैसी (परिपक्व) हो उठी
हूँ॥ ३॥
नवें तत्त्व (नवम द्वार) पूरी तरह से देख करके दसवें द्वार के सार तत्त्व को बताया है-उसके आगे
तो खूब आश्चर्यजनक है-मैंने खुल करके उसका अत्यधिक वर्णन किया है॥ ४॥
मेरे प्यारे दीन दयाल ब्रह्म ने मेरी गति (चाल) को भलीभाँति समझकर मुझे आनन्दमयी वस्तुओं से
मुक्त आनन्द स्वाद मेरे मुख को दिया है॥ ५॥

घट रामायण / १०३
हमारा सम्पूर्ण ज्ञान विस्तार हमसे ही हुआ है, संसार में सब कहने के लिए है-पिंड, उसके तत्त्व
एवं ब्रह्मांडादि किसी के विस्तार में कोई मदद नहीं करते ॥ ६ ॥
पृथ्वी, आकाश सभी का नाश होगा-अग्नि, वायु तथा जल भी नष्ट होने वाले हैं-केवल इस सृष्टि
में हम ही हम बचे रहेंगे ॥ ७ ॥
ब्रह्मा, वेद, विष्णु नष्ट हो जाएँगे तथा विष्णु, शिव भी नहीं बच पाएँगे-यह सम्पूर्ण विराट ( पृथ्वी,
जल, वायु, अग्नि-शून्यादि से सर्वत्र ब्रह्मांड रूप में व्याप्त) भी नहीं बचेगा और मैं किसी (किन सब की
बचै) बात कहूँ ॥ ८ ॥
हमारा अन्त कोई नहीं देख पाएगा और कोई सन्त ही हमें देखेगा। तुलसी साहब कहते हैं कि हमारी
आत्मिक सत्ता अन्तहीन (बेअंत) है-उसके अन्त (समाप्ति) के विषय में कौन कह सकता है ॥ ९॥
॥ दोहा ॥
बाइस सुनु बर्त्तमान, सुरति छान भिनि भिनि कही।
जानै संत सुजान, जिन चढ़ि देखा भेद सब ॥
अर्थ-सुनो, इसके बाईस रूप हैं-और इस सुरति के स्थानों को भिन्न-भिन्न रूपों में समझाया गया
है। इसके विषय में वही चतुर सन्तजन जानते हैं, जिन्होंने सुरति समाधि के शिखर पर चढ़कर इसके
भेदों को देखा है॥
॥ चौपाई ॥
तुलसी संत चरन बलिहारी। चढ़े अगम जिन सुरति सम्हारी॥
लख लख जस जस भेद सुनाई। साखी सब्द ग्रंथ में गाई॥
महुँ पुनि चरन लागि लख बोला। जस जस कृपा संत कर खोला॥
संत चरन सूरति भइ चेरी। मति उन सब बिधि भाँति निबेरी॥
मैं उनकी चरनन बलिहारी। मोहि सों अजान जान कियो लारी॥
सुन्न सुन्न बाइस कर लेखा। खुलि हिये नैन सुरति से देखा॥
और सुन्न का भाखौं लेखा। कोड़ निज संत सुरति से देखा॥
तुलसी बूझी मोर अबूझी। जो कोड़ संत सैल कर सूझी॥
मैं अपनी गति कस कस भाखी। कहैं संत जिन देखी आँखी॥
मैं किंकर उन पर निज दासा। जिन जिन देखा अगम तमासा॥
सोइ सोइ देखि देखि कै भाखी। नैन से देखि पेखि उर आँखी॥
छै सुन्न का पुनि भेद बताऊँ। न्यारा भिन्न भिन्न दरसाऊँ॥
कौन सुन्न में कौन निवासा। ता कर भेद कहौं परकासा॥
प्रथम सुन्न में है निःनामी। ता की गति मति संतन जानी॥
दूजी सुन्न का भाखौं लेखा। जहँवाँ सत्तनाम को देखा॥
तीजी सुन्न सब्द एक होई। सुरति सैल कोड़ संत बिलोई॥
चौथी सुन्न कहौं समझाई। पारब्रह्म तहँ रह्यो समाई॥
संत ताहि परमातम भाखी। सो पुनि देखा दिये की आँखी॥

१०४ / घट रामायण
पंचम सुन का भेद बताउँ। पूरन ब्रह्म जीव तेहि नाऊँ॥
ता को आतम बेद बखाना। जीव नाम आतम कर जाना॥
षटवीं सुनि मन तन के माईं। इन्द्री संग तास लिपटाई॥
परमहंस तेहि ब्रह्म बतावैं। नेतहि नेत बेद गोहरावै॥
सुन तेहि मन कौ ब्रह्म बखाना। ता को नाम निरंजन जाना॥
येही निरंजन जोति कहाई। ब्रह्मा बिस्नू सिव सुत है ताही॥
तिन पुनि रचा पिंड ब्रह्मांडा। सातौ दीप और नौखंडा॥
जोति निरंजन इनको जानी। ता को संतन काल बखानी॥
यह जम काल जाल जग डारा। ज्यों धीमर मछरी गहि मारा॥
दस औतार निरंजन काला। बाँधे जीव कर्म जग जाला॥
तीरथ बरत नेम अरु धरमा। कर्म भाव कहियत है रामा॥
ता की जगत जपै मन लाई। बार बार भरमै भव माहीं॥
जग सब अंद फंद नहिं बूझै। अंधा भया हिये नहिं सूझै॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैं उन सन्त चरणों की बलिहारी जाता हूँ-जो सुरति समाधि को
सम्हाल कर अगम पर्वत पर चढ़े हैं। उन्होंने उसे देख-देख कर जैसे-जैसे भेदों को बताया है, साखी एवं
'सबद' द्वारा इस ग्रंथ में गाया है॥ (यहाँ साखी का अर्थ सन्तों का साक्ष्य सब शब्द का अर्थ सन्तों का
वर्णन है, मेरा अपना कुछ नहीं है॥)
मैं भी उनके चरणों में लगकर और देखकर वर्णन किया है जैसे सन्तों की कृपा होती गई, रहस्य
खुलता गया। मेरी मति सन्त चरणों की दासी बन गई। मति ने ही उसी भाँति लिखकर शान्ति प्राप्त की॥
मैं उन सन्तों के चरणों की बलिहारी जाता हूँ-जिन्होंने मुझ जैसे अज्ञानी को ज्ञानी बनाकर प्रभु के
प्रति संसक्त बनाया। बाईस रूपों के शून्य का वर्णन करके जिन्होंने खुले नेत्रों से सुरति समाधि में देखा॥
और मैं शून्य के विषय में क्या कहूँ, किसी-किसी सन्त ने उसे अपनी सुरति समाधि में देखा है।
तुलसी साहब कहते हैं-जो मुझे कभी अबूझ थी, सन्तों की कृपा से उसे समझा। यह सन्तों की ही कृपा
थी कि उन्हें भी कभी दुर्नाम शिखर पर वह प्रतीत हुई होगी॥
सन्तों ने जिसे आँखों से देखकर बताया है, मैं अपनी उस गति का कैसे-कैसे वर्णन करूँ? मैं उन
सन्तों का सेवक तथा दास हूँ जिन्होंने अपनी प्रज्ञा से उस अगम तमाशे को देखा है॥
किस शून्य में किसका निवास है, उनके मदों को मैंने प्रगट रूप से कहा है। प्रथम शून्य में निःनामी
है-जिसका ज्ञान तथा जिसकी थाह सन्त ही जानते हैं॥
मैं दूसरे शून्य का वर्णन बता रहा हूँ जहाँ 'सत्य नाम' का अस्तित्व है। तीसरा शून्य एक शब्द मात्र
है-जहाँ कोई-कोई सन्त सुरति समाधि में विलीन रहते हैं॥
मैं चौथे शून्य को समझाकर कहता हूँ-जहाँ पार ब्रह्म समाया रहता है। सन्तगण उसे ही परमात्मा
कहते हैं-जिसको वे हृदय की आंख से देखते हैं॥
मैं पंचम शून्य का भेद बता रहा हूँ। उसका नाम पूर्णब्रह्म जीव है। वेदों ने उसे आत्मा तत्त्व कहा है-
और जीव का नाम ही आत्मा है॥
छठें शून्य के विषय में सुनो, वह मन तथा तन में निरन्तर है। उसी के साथ सम्पूर्ण इन्द्रियाँ संसक्त
हैं-परमहंस साधुगण उसे ही ब्रह्म कहते हैं और वेदादि उसे नेति नेति (जिसक अन्त नहीं है) कह कर
बुलाते रहते हैं॥

घट रामायण / १०५
सुनो! उसी मन को ब्रह्म कहा गया है और उसी का नाम निरंजन जाना जाता है। निरंजन की ज्योति
यही कही जाती है और ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव उसके पुत्र हैं॥
उसी ने ही पिंड एवं ब्रह्मांड की रचना कर रखी है-सातों द्वीप तथा नवों खण्ड की उसी के रचे हुए
हैं। इनको निरंजन रूप ज्योति समझो। सन्तों ने उन्हीं को 'काल' कहकर बखाना है॥
यम के सहायक इस काल ने संसार में (मृत्यु का) जाल डाल रखा है और जैसे निषाद या
मल्लाह जाल में मछली पकड़ कर मार डालते हैं, वैसे काल भी (सबका विनाश करता है) काल ही
निरंजन के दसों अवतार है और उसने जीव को सांसारिक कर्म जाल में बांध रखा है॥
तीर्थ, नियमाचरण, व्रत एवं ब्रह्म का कर्म भाव माना जाता है। जिस राम का यह संसार निरन्तर
जाप करता रहता है, वह बार-बार इस भवसागर में बार-बार भ्रमित होता है॥
सारा संसार अंधा (अंद-अंध) है, उसे यह भवसागर का बंधन (फंद) सूझता नहीं, सामने रहते
हुए भी उसे देख नहीं पा रहा है, वह अन्धा हो गया है॥
॥दोहा॥
आदि अंत का भेद कह तुलसी देखा सही।
लेखा अगम अलेख लखि अगाध अदबुद कहा॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने आदि अन्त का भेद सही-सही देखा है, उस अकथनीय और
अलक्ष्य को मैंने देखा है-और उसे देखकर ही मैं उसकी अगाध एवं अद्भुत कथा कह रहा हूँ॥
॥छन्द॥
तुलसी गति गाई अगम सुनाई। सुन्न सुन्न भिन्न भिन्न कही॥
जस जस जेहि लेखा निज निज देखा। आदि अन्त गति सार भई॥
संतन गति गाई महुँ पुनि पाई। जो उतपति सब आदि भई॥
जिनही जिन जानी सबहि बखानी। तुलसी उनके लार लई॥
अर्थ-तुलसी ने अगम्य तत्त्व के ज्ञान को गाकर सुनाया और शून्य के भिन्न-भिन्न रूपों का वर्णन
किया। अपने प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा जिसे-जिस-जिस रूप में देखा-मैंने आदि अन्त से युक्त उनके सार
तत्त्व का वर्णन किया॥
जो इनकी अनादिमयी उत्पत्ति है, उसकी गति का गान सन्तों ने किया। जिन-जिन्होंने इसे समाया,
उन्होंने इसका वर्णन किया है-तुलसीदास तो उनके प्रेम में डूबे हुए हैं॥
॥सोरठा॥
सब में कहा विचार सार पार गति पाइकै।
बूझै बूझनहार जिन में चाखा अगम रस॥१॥
तुलसी तिरन समान अगम भान घटि लखि परा।
सूझा निज घर धाम यह अनाम गति यों कही॥२॥
अर्थ-उस सार तत्त्व के उस पार उसके ज्ञान को प्राप्त करके, सबमें उसके प्रति क्या विचार हैं-
उसका वर्णन कोई बूझने वाला ही कर सकता है और विशेष कर वह जिसने उस अगम के रस के सार
तत्त्व को चख लिया है॥१॥
इस घट में वह अगम्य ज्ञान सूर्य तृण के समान दिखाई पड़ा है-उसी से यह आत्मगृह सुझाई पड़ा है,
उस (सन्त ही) ने उस अनाम की गति को इस प्रकार वर्णित कर सकता है॥२॥

१०६ / घट रामायण
॥ चौपाई ॥
नभ घट भूमी भान दिखाना। लखि लखि लखा भेद जिन जाना ॥
अर्थ-आकाश में, घट में तथा भूमि में सूर्य दिखाई पड़ा-जिन्होंने इसके भेदों को जाना है-उसे
बार-बार देखकर समझा है॥
॥ सोरठा ॥
घट भूमी बिच भान, जानि भेद भिन जिन कही।
सखि सुन देस बयान, रमक रीति उलटी लखी ॥
अर्थ-घटाकाश की भूमि के बीच में सूर्य है-जिनके भेदों को समझकर सन्तों ने भिन्न भिन्न रूपों में
कहा है। हे सखी! उस देश का वर्णन सुनों-वहाँ की व्यवस्था रीति (रमक रीति) उल्टी दिखाई पड़ती
हैं॥
॥ कहेरा ॥
सुन हो सखी इक दिसवा। भूमी ऊगै भान।
दिसवा की उलटी रीति। साधू पालै प्रीति॥ टेक ॥
मछरी गगन पर गाजा। चंदा चुनै नाम।
दिसवा उरध-मुख कुइया। गइया चुगै चाम ॥ १॥
गगन उठै धधकारी। धरै सूरति ध्यान।
खम्भा न महल अटारी। प्यारी पिव धाम॥ २॥
तारा अवर नहिं पानी। बानी उठै बिन तान।
खिरकी खुली बिन द्वारे। पारे परे ठाम ॥ ३ ॥
नइया कुटी भौ पारा। उतरै बिन दाम।
तुलसी अगम गम जानी। श्रुति पायो जिन नाम ॥ ४ ॥
अर्थ-हे सखी! उस एक देश (दिशा) बारे में सुनो, सूर्य पृथ्वी पर उगता है। उस देश (दिशा) की
उल्टी चलन है-सन्तजन प्रीति में फँसे रहते हैं॥
आकाश में मछलियाँ उछलती रहती हैं या शोर करती रहती है चन्द्रमा केवल (राम) नाम को
चुनता है। उस देश में कुएँ ऊर्ध्वमुखी (ऊपर की तरह मुँह वाले) होते हैं और गाएँ चमड़े को खाती रहती
हैं॥ १॥
गगन रह-रह कर धधक उठता है, और सुरति का ध्यान लगा रहता है। न खम्भा है, न महल है, न
अटारी है-बिना किसी आश्रय के प्रिया अपने पति के धाम पर निवास करती है॥ २ ॥
नीचे (अवर) कोई तालाब (तारा) तथा जल नहीं है, और वहाँ बिना तान के वाणी उठती रहती है।
बिना द्वार के खिड़की खुली हुई है और उसके आगे ही (रहने लायक) स्थान भी है॥ ३॥
सन्त नाव से उस कुटी के पार हो जाता है किन्तु कोई उतराई नहीं देनी पड़ती। तुलसी साहब कहते
हैं कि मैंने अगम्य को समझ लिया है और वेदों में (ज्ञान के प्रकाश में) अपना नाम प्राप्त कर
लिया है॥ ४ ॥

घट रामायण / १०७
॥ सोरठा।
साहिबै एक अनाम, अगम धाम संतन लखा।
भखा भेद जिन जान, तिन तिन बरनि सुनाइया॥
अर्थ-स्वामी (ब्रह्म) एक है और अनाम है, उसका धाम अगम्य है, ऐसा सन्तों ने देखा है-जिन्होंने
उसे जाना है-उसके स्वरूप भेद जो वर्णन किया है और बार-बार उसका वर्णन करके सुनाया भी है।
॥ चौपाई॥
अब अनाम इक साहिब न्यारा। सुन और महासुन्न के पारा॥
वो साहिब संतन कर प्यारा। सोइ घर संत करैं दरबारा॥
वा घर का कोई मरम न जाने। नानक दास कबीर बखाने॥
दादू और दरिया रैदासा। नाभा मीरा अगम बिलासा॥
और अनेक संत कहि गाये। जे जे अगम पंथ पद पाये॥
तुलसी मैं चरनन चित चेरा। उन रज चरनन कीन्ह निबेरा॥
अर्थ-मेरा एक साहब (पारमात्मा) अनाम और विलक्षण है वह शून्य तथा महाशून्य के भी पार
स्थित है। वह स्वामी सन्तों को प्रिय है और सन्तगण उसी के घर में दरबार लगाते हैं॥
उस घर का मर्म कोई नहीं जानता, ऐसा नानक एवं कबीरदास कहते हैं। सन्त दादू, दरियादास एवं
रैदास, नाभादास, मीराबाई आदि उसके अगम्य आनन्द विलास को जानते हैं॥
अनेक सन्तगण भी कह गए हैं कि जिन्होंने उसके अगम्य पद को प्राप्त कर लिया है, ऐसे अनेक
सन्तगण भी कह गए हैं। तुलसी साहब कहते हैं कि मैं उनके चरणों का मन से दास हूँ और उन्हीं के
चरण रजों से इस परमतत्त्व का विवेचन किया है।
॥ सोरठा॥
संत चरन निज दास, तुलसी ताहि बिचारिया।
पायौ जिन घर बास, आदि अनामी लखि कह्यौ॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैं सन्त चरणों का सेवक हूँ और मैंने उन्हें मैंने अच्छी तरह से
विचार कर रखा है उस आदि तथा अनादि ब्रह्म को देखकर कह रहा हूँ कि मैंने अपने आत्मस्वरूप गृह
में निवास प्राप्त कर लिया है।
बरनन चार गति बैराग
॥ चौपाई ॥
अब बैराग जोग गति गाऊँ। ज्ञान भक्ति भिनि भिनि दरसाऊँ॥
चारि गति बैराग बताऊँ। जोगी चारि गती गति गाऊँ॥
तीनि ज्ञान का भेद बताई। चौथा ज्ञान जगत जग माईं॥
तेरा भक्ति भेद बतलाऊँ। भिन्न भिन्न कर कहि समझाऊँ॥
न्यारा भेद भाव सब केरा। जो जस जिनका भया निबेरा॥
जो जिनकी करनी जस भाँती। सो सब संतन कही सनाथी॥
मैं रज पावन उन कर चेरा। निरनय कहौं छानि इन केरा॥

१०८ / घट रामायण
अर्थ-अब मैं वैराग्य तथा योग के ज्ञान का वर्णन करता हूँ। उसी के साथ ज्ञान तथा भक्ति को भी
भिन्न-भिन्न रूपों में बतलाऊँगा। वैराग्य की चार अवस्थाओं का वर्णन करूँगा और योगियों की चार
गतियों का भी गान करूँगा ॥
ज्ञान की तीन गतियों का भेद बतलाकर और चौथे ज्ञान को जो जगत में स्थित है-उसका वर्णन
करूँगा। भक्ति के तेरह भेदों का वर्णन करूँगा और भिन्न-भिन्न करके उनके विविध रूपों का वर्णन
करूँगा ॥
सभी भक्ति के भेद भाव न्यारे हैं-जिनसे उनके स्वरूप का स्पष्टीकरण (निबेरा) हो सके, उसका
वर्णन करूँगा। जिनका जैसा स्वरूप है और जैसा भेद है-उन सबको सन्तों ने विश्वास भाव (सनाथी)
से कहा है।
मैं उन सन्तों के चरणों की पवित्र धूलि का दास हूँ, और उन्हीं का मत समझकर मैं उनका वर्णन
करूँगा ॥
॥ सोरठा ॥
भक्ति ग्यान और जोग, भोग भाव सब विधि कहीं।
जो जेहिं गति जस भोग, सो तस करौं विचारि कै ॥
अर्थ-भक्ति ज्ञान तथा योग, भोग एवं अन्य भावों का हर प्रकार से वर्णन करूँगा। जो जिस गति
एवं जिस भोग में जीवन जी रहा है, उन सबका मैं विचारपूर्वक वर्णन कर रहा हूँ॥
॥ प्रथम बैराग ॥
॥ चौपाई ॥
अब बैराग तीनि गति गाऊँ। भाखों भेद भिन्न दरसाऊँ ॥
बेरक्ती बैराग सुनाऊँ। ता कर चिन्ह भिन्न बतलाऊँ ॥
माया मोह जगत नहिं भावै। काम रु क्रोध लोभ नहिं लावै ॥
और जगत सँग रहै उदासी। जग संसार करत सब हाँसी ॥
त्यागी अति संतोष समावा। भूख प्यास निद्रा न सतावा ॥
और अनेक भाँति रस त्यागी। बन बसि रहै नाम अनुरागी ॥
बिन सतगुरू धूरि सब जाना। संत सुरति बिन भरमै खाना ॥
जो कोइ त्याग लाग मन कीन्हा। संगल दीप भोग तेहि दीन्हा ॥
जो जेहि त्याग भाग जस पावा। सुरति सब्द बिन भौं में आवा ॥
अर्थ-अब वैराग्य की तीन गतियों का वर्णन कर रहा हूँ और उनके भिन्न-भिन्न भेदों को दिखला
रहा हूँ। 'विरक्ति' वैराग्य का वर्णन कर रहा हूँ तथा उसके भिन्न-भिन्न लक्षणों को बतला रहा हूँ॥
विरक्त सांयासी को इस संसार के माया-मोह भाते नहीं और कभी काम, क्रोध एवं लोभ के
वशीभूत नहीं होता। वह संसार की संसक्ति से उदासीन रहता है और सारा संसार उसकी हँसी करता
रहता है।
वह त्यागी है तथा उसमें सन्तोष भाव समाया हुआ है। उसे भूख प्यास एवं निद्रा पीड़ित नहीं करते।
उसने अनेक रूपों की संसक्तियों रस-वासनाओं का त्याग कर रखा है। वन में निवास करता हुआ
केवल परमात्मा के नाम में अनुरक्त रहता है॥
बिना सतगुरु (परमात्मा) के वह सम्पूर्ण जगत को धूलि की भाँति समझता है-सन्तों की सुरति योग
के बिना दर दर (खाना) भटकता रहता है।

घट रामायण / १०९
जिस किसी ने भी त्यागपूर्वक उस परमात्मा में मन लगा दिया वह सिंघल द्वीप (सिद्ध भूमि) में
निरन्तर आनन्द करता रहेगा ॥
॥ द्वितीय वैराग ॥
॥ चौपाई ॥
परम जोग बैराग बताऊँ। रहनी चाल ताहि दरसाऊँ॥
अष्ट कँवल उलटै हिये माई। उलटै कँवल तत्त मन लाई॥
निस दिन तत्त मती गति राखै। पाँचो तत्त गती सोइ भाखै॥
तब तन छूटे तत्त समाई। चारि तत्त जिव उपजै जाई॥
फिर तन छूटै खानि समाना। सो पुनि करै जो लेइ निदाना॥
अर्थ-परम जोग वैराग्य के विषय में बता रहा हूँ-उसकी दिनचर्या एवं आचरण (रहनी) का वर्णन
करता हूँ। उसने चित्त में स्थित अष्ट कमलदल को उल्टा कर दिया है और उस उल्टे कमल से जुड़े
तत्त्व में चित्त लगाए रहता है॥
रात-दिन वह मूल तत्त्व (ब्रह्म) की गति का वर्णन करता रहता है और पाँचों तत्त्वों की गति का
वह वर्णन करता रहता है॥
उसके बाद जब उसका शरीर विनष्ट होता है तो वह परमतत्त्व में विलीन हो जाता है और वह चार
तत्त्वों एवं जीव के साथ पुनः उत्पन्न होता है। इसके पश्चात् उसका चित्त भण्डार की तरह भर जाता है-
इसको वही कर सकता है-जो इसके फलों को धारण करने की आकांक्षा करता हो॥
॥ तृतीय बैराग ॥
॥ चौपाई ॥
त्याग बैराग कौ बरनि सुनाई। छूटै देह खानि गति पाई॥
जो जस त्याग भोग तन तैसा। खान पान तन पावै जैसा॥
अर्थ-त्याग वैराग्य का मैं वर्णन करके सुनाता हूँ-उसकी देह छूटने पर इसे सम्पन्नता की गति प्राप्त
होती है। उसका जैसा त्याग होगा, या जैसा भोग होगा-उसी प्रकार उसका शरीर होगा, वह अपने कर्म
के अनुसार ही खान-पान तथा शरीर प्राप्त करेगा॥
॥ चतुर्थ बैराग ॥
॥ चौपाई ॥
तन त्यागी बैरागी भाई। जो जेहि लिया देन सोइ जाई॥
बार बार छूटै तन जाइ। छूटै तन तहँ गर्भ समाई॥
वहि वहि देह खाइ पुनि जाई। ऐसे भर्म खानि भरमाई॥
बिना सुरति नहिं पावै पारा। भरमै भोग परै भौ धारा॥
अर्थ-त्वह बार-बार शरीर छोड़कर माता के गर्भ में जाता है-उसे देकर वह पुनः खाता हुआ अपना
जीवन व्यतीत करता है, ऐसे भ्रम की खानि में वह भटकता रहता है। बिना सुरति ज्ञान के वह भवसागर
से पार नहीं हो पाता-क्योंकि वह संसार सागर की योग धारा में बहता हुआ निगरन्तर भरमता रहता है॥